दिल्ली हाईकोर्ट की जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने गुरुवार को कथित शराब नीति मामले में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और संजय सिंह सहित आम आदमी पार्टी (AAP) के कई वरिष्ठ नेताओं के खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्रवाई शुरू की है। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि न्यायपालिका के खिलाफ “अपमानजनक और सुनियोजित अभियान” (calculated campaign of vilification) चलाया जा रहा है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू करने के साथ ही जस्टिस शर्मा ने यह भी स्पष्ट किया कि वह अब इस मामले में अरविंद केजरीवाल और अन्य की रिहाई के खिलाफ सीबीआई (CBI) द्वारा दायर पुनर्विचार याचिका पर सुनवाई नहीं करेंगी।
‘संस्था पर हमला’ — हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी
जस्टिस शर्मा ने आदेश सुनाते हुए कहा कि अरविंद केजरीवाल ने न्यायपालिका की छवि खराब करने के लिए एक सुनियोजित अभियान चलाया। कोर्ट के अनुसार, यह डिजिटल स्पेस में चलाया गया अभियान केवल एक व्यक्तिगत जज के खिलाफ नहीं, बल्कि पूरी न्यायपालिका और न्यायिक प्रक्रिया के खिलाफ था।
कोर्ट ने कहा, “प्रतिवादी नंबर 18, अरविंद केजरीवाल के बयान और आचरण दुर्भाग्यपूर्ण हैं और वे प्रथम दृष्टया ‘कंटेम्प्ट ऑफ कोर्ट्स एक्ट’ की धारा 2सी के तहत आपराधिक अवमानना के दायरे में आते हैं।”
इसी तरह, मनीष सिसोदिया और दुर्गेश पाठक द्वारा लिखे गए पत्रों और सोशल मीडिया पर पोस्ट की गई सामग्री को भी कोर्ट ने अवमाननापूर्ण पाया। जस्टिस शर्मा ने विशेष रूप से वाराणसी में दिए गए उनके एक लेक्चर के “एडिटेड” (छेड़छाड़ किए गए) वीडियो को सोशल मीडिया पर प्रसारित किए जाने पर भी कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा, “मेरे और इस कोर्ट के खिलाफ अत्यंत अपमानजनक और मानहानिकारक सामग्री पोस्ट की जा रही है, जिस पर मैं चुप नहीं रह सकती।”
न्यायिक गरिमा बनाम सार्वजनिक दबाव
जस्टिस शर्मा ने जोर देकर कहा कि यदि इस प्रकार के कृत्यों पर ध्यान नहीं दिया गया, तो समाज में यह संदेश जाएगा कि अदालतों को संगठित सार्वजनिक दबाव के माध्यम से प्रभावित किया जा सकता है।
यह मामला तब और गंभीर हो गया जब अरविंद केजरीवाल ने जस्टिस शर्मा को पत्र लिखकर कहा था कि उन्हें उनकी अदालत से “न्याय मिलने की उम्मीद नहीं है” और उन्होंने महात्मा गांधी के ‘सत्याग्रह’ के मार्ग पर चलने का निर्णय लिया है। इसके बाद सिसोदिया और पाठक ने भी अदालत को सूचित किया था कि वे इस बेंच के सामने अपना पक्ष नहीं रखेंगे।
इससे पहले, जस्टिस शर्मा ने मामले की सुनवाई से हटने (recuse) की अर्जी को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि पूर्वाग्रह के निराधार आरोप लगाना न केवल एक जज पर हमला है, बल्कि पूरी संस्था की ईमानदारी पर सवाल उठाना है।
कानूनी कार्यवाही पर असर
अवमानना की इस कार्रवाई के कारण आबकारी मामले में सीबीआई की याचिका पर सुनवाई फिलहाल रुक गई है। जस्टिस शर्मा ने कहा कि वह इन नेताओं का पक्ष रखने के लिए ‘एमिकस क्यूरी’ (Amicus Curiae) नियुक्त करने वाली थीं, लेकिन अपमानजनक सामग्री सामने आने के बाद उन्होंने अवमानना की कार्रवाई शुरू करने का निर्णय लिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि “अदालत अपनी और संस्था की गरिमा के लिए खड़ी होगी, चाहे वह कितना भी कठिन क्यों न हो।”

