‘डॉक्टरों को संवेदनशील बनाएं’: गर्भपात के मामले में अधूरी रिपोर्ट देने पर दिल्ली हाईकोर्ट ने RML अस्पताल को फटकारा

दिल्ली हाईकोर्ट ने राम मनोहर लोहिया (RML) अस्पताल को अपने मेडिकल स्टाफ को “संवेदनशील” बनाने का कड़ा निर्देश दिया है। अदालत ने यह टिप्पणी एक 29 वर्षीय गर्भवती महिला की याचिका पर सुनवाई के दौरान की, जहां अस्पताल की प्रक्रियात्मक चूक के कारण एक महत्वपूर्ण न्यायिक निर्णय में देरी हुई।

जस्टिस पुरुषइंद्र कुमार कौरव ने बुधवार को इस मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि मेडिकल बोर्ड की लापरवाही की वजह से कोर्ट को अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) से दूसरी राय लेने के लिए मजबूर होना पड़ा।

एक 29 वर्षीय विवाहित महिला ने अपनी 28 सप्ताह की गर्भावस्था को समाप्त करने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया था। भ्रूण में गंभीर विकृतियां थीं और गर्भ के अंदर ही उसकी मृत्यु का खतरा बना हुआ था। इस पर कोर्ट ने 6 मई को RML अस्पताल के मेडिकल बोर्ड से दो मुख्य बिंदुओं पर रिपोर्ट मांगी थी:

  1. क्या गर्भपात (MTP) करना संभव है?
  2. यदि गर्भपात किया जाता है, तो मां के स्वास्थ्य पर इसके क्या परिणाम होंगे?
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अदालत का कहना है कि अस्पताल के बोर्ड ने केवल गर्भ जारी रखने की सिफारिश की, लेकिन दूसरे बिंदु (जोखिमों) पर कोई स्पष्ट जानकारी नहीं दी।

सुनवाई के दौरान जस्टिस कौरव ने RML अस्पताल के निदेशक डॉ. एल. श्याम सिंह से कहा, “जब अदालत ने दो पहलुओं पर जानकारी मांगी थी, तो यह ‘सशर्त’ नहीं था। ऐसा नहीं था कि अगर गर्भपात संभव नहीं है, तो आप दूसरे सवाल का जवाब ही न दें।”

जज ने आगे स्पष्ट किया कि यदि बोर्ड ने पहले ही विस्तृत रिपोर्ट दी होती, तो कोर्ट याचिकाकर्ता को समय पर सही जानकारी दे पाता और एम्स को दोबारा वही कसरत करने की आवश्यकता नहीं पड़ती।

बाद में एम्स (AIIMS) के विशेषज्ञों ने भी गर्भपात के खिलाफ सलाह दी। रिपोर्ट में बताया गया कि इस चरण में गर्भपात करने से महिला के गर्भाशय के फटने का खतरा है। विशेषज्ञों ने यह भी नोट किया कि आने वाले कुछ हफ्तों में भ्रूण की गर्भ के अंदर ही मृत्यु हो सकती है, लेकिन फिलहाल मां की जान बचाना प्राथमिकता है।

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RML अस्पताल ने बुधवार को अपनी सफाई में कहा कि उन्होंने पहले संक्षिप्त रिपोर्ट इसलिए दी थी क्योंकि उनकी राय में गर्भपात व्यावहारिक नहीं था। अब उन्होंने एम्स की रिपोर्ट से सहमति जताते हुए विस्तार से बताया है कि इस स्तर पर गर्भपात से अत्यधिक रक्तस्राव (haemorrhage), सेप्सिस और मृत्यु तक का खतरा हो सकता है।

अदालत ने अस्पताल के निदेशक के उस आश्वासन को स्वीकार कर लिया, जिसमें उन्होंने कहा कि भविष्य में मेडिकल बोर्ड की बैठकों और रिपोर्टिंग में एमटीपी (MTP) अधिनियम और सरकारी दिशानिर्देशों का कड़ाई से पालन किया जाएगा।

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कोर्ट ने जोर देकर कहा कि मेडिकल बोर्ड की स्पष्ट रिपोर्ट न्यायपालिका के लिए समय पर और सटीक निर्णय लेने के लिए अनिवार्य है। दोनों प्रमुख संस्थानों की चिकित्सा राय एक समान होने के बाद, अदालत ने महिला की याचिका का निपटारा कर दिया।

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