सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में स्पष्ट किया है कि केवल डिजिटल रूप से हस्ताक्षरित और आधिकारिक तौर पर अपलोड किया गया आदेश ही कानून की दृष्टि में मान्य है। कोर्ट ने उन दावों को सिरे से खारिज कर दिया जिसमें खुली अदालत में दी गई डिक्टेशन या उसकी यूट्यूब (YouTube) ट्रांसक्रिप्ट को हस्ताक्षरित आदेश पर प्राथमिकता देने की मांग की गई थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कोर्ट-मास्टर को लिखवाई गई डिक्टेशन केवल एक ‘कच्चा मसौदा’ (rough draft) होती है, जिसे जज चैंबर में सुधारने और स्पष्ट करने का अधिकार रखते हैं।
जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर की पीठ ने न केवल इस विविध आवेदन (Miscellaneous Application) को खारिज किया, बल्कि अदालत का समय बर्बाद करने और गरिमा को कम करने के लिए आवेदकों पर ₹2,000 प्रति व्यक्ति का जुर्माना (costs) भी लगाया।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला सिविल अपील संख्या 536/2026 से संबंधित है, जो गुजरात के नवीनल गांव में ‘गौचर भूमि’ (चरागाह) की बहाली के लिए गुजरात हाईकोर्ट के एक अंतरिम आदेश के खिलाफ दायर की गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने 27 जनवरी, 2026 को इस अपील का निपटारा करते हुए हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया था, जिसे बिना सुनवाई के पारित किया गया था। कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया था कि वह सभी पक्षों को सुनकर नया आदेश पारित करे।
विविध आवेदन दायर करने वाले आवेदकों (मूल अपील में प्रतिवादी संख्या 7-10 और 12-17) का दावा था कि 27 जनवरी को कोर्ट में जो आदेश डिक्टेट (लिखवाया) किया गया था और 12 फरवरी को जो हस्ताक्षरित आदेश अपलोड हुआ, उनमें काफी अंतर है।
पक्षों की दलीलें
आवेदकों की ओर से सुश्री कामिनी जायसवाल ने तर्क दिया कि कोर्ट ने डिक्टेशन के दौरान ‘यथास्थिति’ (status quo) बनाए रखने का निर्देश दिया था और हाईकोर्ट को जनहित याचिका (PIL) में स्वतंत्र रूप से आगे बढ़ने को कहा था। उन्होंने अपने दावे के समर्थन में:
- यूट्यूब पर उपलब्ध कार्यवाही का वीडियो और उसकी ट्रांसक्रिप्ट।
- बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज को भेजी गई कंपनी की सूचना।
- विभिन्न मीडिया रिपोर्टों का हवाला दिया।
उन्होंने विनोद कुमार सिंह बनाम बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी (1988) मामले का संदर्भ देते हुए कहा कि खुली अदालत में दिया गया निर्णय ही अंतिम होता है और हस्ताक्षर केवल एक औपचारिकता है।
दूसरी ओर, अडानी पोर्ट्स की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने दलील दी कि यह आवेदन सुनवाई योग्य नहीं है। उन्होंने कुशलभाई रतनभाई रोहित बनाम गुजरात राज्य (2014) का हवाला देते हुए कहा कि जब तक निर्णय पर हस्ताक्षर और मुहर नहीं लग जाती, उसे किसी भी समय बदला जा सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि आवेदकों ने रजिस्ट्री के उस सर्कुलर का पालन नहीं किया है जो निपटाये गए मामलों में ऐसे आवेदनों पर पाबंदी लगाता है।
कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
कोर्ट ने यूट्यूब ट्रांसक्रिप्ट को साक्ष्य मानने से इनकार करते हुए कहा कि डिक्टेशन और हस्ताक्षरित आदेश के बीच का अंतर ‘सुधार और स्पष्टीकरण’ का परिणाम है। पीठ ने सुरेंद्र सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (1953) का हवाला देते हुए कहा:
“जज के पास अपना मन बदलने का अधिकार है… जब तक निर्णय औपचारिक रूप से सुनाया और हस्ताक्षरित नहीं हो जाता, वह केवल एक ड्राफ्ट रहता है। हस्ताक्षरित आदेश ही वह दस्तावेज है जो कोर्ट की अंतिम और अपरिवर्तनीय राय को दर्शाता है।”
अदालत ने जजों के भारी कार्यभार का जिक्र करते हुए कहा कि 27 जनवरी को 71 मामले सूचीबद्ध थे। ऐसे में तथ्यों को याद रखने के लिए एक ‘कंकाल नुमा ढांचा’ (skeletal framework) डिक्टेट किया जाता है। कोर्ट के अनुसार, चैंबर में इसे परिष्कृत करना आवश्यक है ताकि “न्यायिक समय का सर्वोत्तम उपयोग” किया जा सके। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ‘यथास्थिति’ का कोई निर्देश पहले कभी नहीं दिया गया था और उसे अंतिम आदेश में शामिल न करना कानून की दृष्टि में सही था।
अदालत ने आवेदकों की मंशा पर सवाल उठाते हुए कहा कि यह आवेदन कोर्ट की गरिमा को कम करने और अथॉरिटी पर दबाव बनाने का एक ‘गुमराह प्रयास’ है।
निर्णय
पीठ ने आवेदन को पूरी तरह से खारिज कर दिया और आवेदकों को निर्देश दिया कि वे चार सप्ताह के भीतर सुप्रीम कोर्ट लीगल सर्विसेज कमेटी में जुर्माना जमा करें। कोर्ट ने रजिस्ट्री के संबंधित रजिस्ट्रार से भी स्पष्टीकरण मांगा है कि नियमों का पालन न होने के बावजूद इस आवेदन को सुनवाई के लिए कैसे सूचीबद्ध किया गया।
केस विवरण:
- केस टाइटल: फकीर ममद सुलेमान समेजा और अन्य बनाम अडानी पोर्ट्स एंड स्पेशल इकोनॉमिक ज़ोन लिमिटेड और अन्य।
- केस नंबर: सिविल अपील संख्या 536/2026 में विविध आवेदन संख्या 1276/2026
- बेंच: जस्टिस जे.के. माहेश्वरी और जस्टिस अतुल एस. चांदुरकर
- तारीख: 12 मई, 2026

