उत्तराखंड हाईकोर्ट ने एक पति द्वारा अपनी पत्नी के ‘अवैध अलगाव’ और परिजनों द्वारा उसे बंधक बनाने के आरोपों पर कड़ा संज्ञान लिया है। कोर्ट ने हरिद्वार के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) को निर्देश दिया है कि वह आगामी 18 मई को संबंधित महिला को व्यक्तिगत रूप से अदालत के समक्ष पेश करना सुनिश्चित करें।
यह मामला वैभव गुप्ता नामक व्यक्ति द्वारा दायर ‘बंदी प्रत्यक्षीकरण’ (Habeas Corpus) याचिका से जुड़ा है। वैभव का आरोप है कि हरिद्वार में उनका वैवाहिक जीवन सुखमय चल रहा था, लेकिन अचानक उनकी पत्नी के मायके वालों ने दखल दिया और उसे जबरन अपने साथ ले गए। याचिका के अनुसार, महिला को फिलहाल उत्तर प्रदेश के अंबेडकर नगर जिले में उसकी इच्छा के विरुद्ध रखा गया है।
मंगलवार को न्यायमूर्ति मनोज कुमार तिवारी और न्यायमूर्ति पंकज पुरोहित की खंडपीठ ने इस मामले की सुनवाई की। सुनवाई के दौरान राज्य सरकार के वकील ने अदालत को बताया कि हरिद्वार के बहादराबाद थाना प्रभारी ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए महिला से बात की थी, जिसमें महिला ने खुद को सुरक्षित बताया था।
हालांकि, याचिकाकर्ता के वकील अजीत कुमार यादव ने इस डिजिटल बातचीत की वैधता को चुनौती दी। उन्होंने तर्क दिया कि महिला अपने माता-पिता के अत्यधिक दबाव और डर के साये में है। वकील ने जोर दिया कि वीडियो कॉल के दौरान वह अपनी बात स्वतंत्र रूप से नहीं रख सकती, इसलिए उसे अदालत में प्रत्यक्ष रूप से पेश किया जाना अनिवार्य है।
अदालत ने याचिकाकर्ता की दलीलों को गंभीरता से लेते हुए माना कि महिला की स्वतंत्र इच्छा जानने के लिए उसका कोर्ट में मौजूद होना जरूरी है। कोर्ट ने हरिद्वार SSP को उत्तर प्रदेश की अंबेडकर नगर पुलिस के साथ समन्वय स्थापित करने का आदेश दिया है ताकि महिला की उपस्थिति सुनिश्चित की जा सके।
अब इस मामले की अगली सुनवाई 18 मई को होगी। कोर्ट में महिला के बयान के आधार पर ही यह तय होगा कि वह अपनी मर्जी से मायके में रह रही है या वाकई उसे वहां कैद करके रखा गया है।

