इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यह स्पष्ट किया है कि चेक बाउंस होने की स्थिति में संयुक्त बैंक खाताधारक (Joint Account Holder) के खिलाफ तब तक मुकदमा नहीं चलाया जा सकता, जब तक कि उसने उस चेक पर हस्ताक्षर न किए हों। न्यायमूर्ति संदीप जैन ने स्पष्ट किया कि निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट्स (N.I.) एक्ट की धारा 141 के तहत ‘विकैरियस लायबिलिटी’ (प्रतिनिधिक दायित्व) का सिद्धांत केवल कंपनियों और साझेदारी फर्मों पर लागू होता है, व्यक्तियों पर नहीं।
हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी मधु सिंह द्वारा दायर धारा 482 Cr.P.C. के तहत एक आवेदन को स्वीकार करते हुए की। इस आवेदन में 8,00,000 रुपये के चेक बाउंस मामले में गाजियाबाद की निचली अदालत द्वारा जारी सम्मन आदेश और कार्यवाही को चुनौती दी गई थी।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद हरि ओम पाठक द्वारा राहुल थिंद और मधु सिंह के खिलाफ दर्ज कराई गई एक आपराधिक शिकायत से शुरू हुआ था। शिकायतकर्ता का आरोप था कि उन्होंने दिसंबर 2004 में व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए राहुल थिंद को 3,00,000 रुपये और 5,00,000 रुपये का ऋण दिया था।
इस ऋण के भुगतान के लिए राहुल थिंद ने एचडीएफसी बैंक, राज नगर, गाजियाबाद के दो चेक जारी किए। बैंक में प्रस्तुत करने पर दोनों चेक “खाता बंद” होने की टिप्पणी के साथ वापस आ गए। कानूनी नोटिस का जवाब न मिलने पर, एनआई एक्ट की धारा 138, 141 और आईपीसी की धारा 420 के तहत शिकायत दर्ज की गई। 3 जुलाई 2006 को निचली अदालत ने दोनों आरोपियों को धारा 138 के तहत मुकदमे का सामना करने के लिए तलब किया था।
पक्षकारों की दलीलें
आवेदक मधु सिंह के वकील ने तर्क दिया कि हालांकि चेक राहुल थिंद और मधु सिंह के संयुक्त खाते से जारी किए गए थे, लेकिन उन पर केवल राहुल थिंद के हस्ताक्षर थे। यह तर्क दिया गया कि चूंकि आवेदक चेक की हस्ताक्षरकर्ता नहीं थी, इसलिए उसके खिलाफ धारा 138 के तहत कोई अपराध नहीं बनता है।
आवेदक ने आगे कहा कि एनआई एक्ट की धारा 141 के तहत मिलने वाली जिम्मेदारी व्यक्तिगत मामलों में लागू नहीं होती। अपनी दलीलों के समर्थन में आवेदक ने सुप्रीम कोर्ट के महत्वपूर्ण फैसलों जैसे अपर्णा ए. शाह बनाम सेठ डेवलपर्स प्राइवेट लिमिटेड और अलका खांडू अवहाद बनाम अमर श्यामप्रसाद मिश्रा का हवाला दिया। नोटिस के बावजूद शिकायतकर्ता की ओर से कोई उपस्थित नहीं हुआ।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
न्यायमुर्ति संदीप जैन ने धारा 138 के अनिवार्य तत्वों की जांच की और उल्लेख किया कि प्राथमिक आवश्यकता यह है कि “चेक उस व्यक्ति द्वारा तैयार किया जाना चाहिए जिसका उस बैंक में खाता हो।”
कोर्ट ने जुगेश सहगल बनाम शमशेर सिंह गोगी (2009) मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का जिक्र करते हुए जोर दिया कि धारा 138 का अपराध मानने के लिए सभी निर्धारित शर्तों का पूरा होना जरूरी है। संयुक्त खातों के संबंध में कोर्ट ने अपर्णा ए. शाह (2013) के फैसले को उद्धृत किया:
“हम यह भी मानते हैं कि एनआई एक्ट की धारा 138 के तहत, संयुक्त खातों से चेक जारी होने की स्थिति में, संयुक्त खाताधारक के खिलाफ तब तक मुकदमा नहीं चलाया जा सकता जब तक कि चेक पर संयुक्त खाताधारक के रूप में प्रत्येक व्यक्ति द्वारा हस्ताक्षर न किए गए हों।”
हाईकोर्ट ने आगे स्पष्ट किया कि धारा 141 आपराधिक कानून के सामान्य नियम का एक अपवाद है और यह केवल कॉर्पोरेट संस्थाओं के लिए ही है। अलका खांडू अवहाद (2021) का संदर्भ देते हुए कोर्ट ने दोहराया कि “दो निजी व्यक्तियों को धारा 141 लागू करने के उद्देश्य से ‘व्यक्तियों का संघ’ (association of individuals) नहीं कहा जा सकता।”
वर्तमान मामले में कोर्ट ने पाया कि यह निर्विवाद है कि चेक पर केवल राहुल थिंद के हस्ताक्षर थे। कोर्ट ने देखा कि शिकायत में मुख्य आरोप राहुल थिंद के खिलाफ हैं और आवेदक मधु सिंह की कोई विशिष्ट भूमिका नहीं बताई गई है, सिवाय इसके कि वह ऋण चुकाने के लिए संयुक्त रूप से उत्तरदायी है।
कोर्ट का निर्णय
हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि निचली अदालत ने मधु सिंह को तलब करने में गलती की है। कोर्ट ने कहा कि सम्मन आदेश उस सीमा तक कानूनन टिकने योग्य नहीं है और इसे रद्द किया जाना चाहिए।
मधु सिंह के खिलाफ कार्यवाही को रद्द करते हुए हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि हस्ताक्षरकर्ता आरोपी राहुल थिंद के खिलाफ कार्यवाही कानून के अनुसार जारी रहेगी और निचली अदालत उसके खिलाफ आगे बढ़ने के लिए स्वतंत्र है।
केस विवरण:
- केस टाइटल: मधु सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य
- केस नंबर: आवेदन धारा 482 नंबर 19215/2007
- बेंच: न्यायमूर्ति संदीप जैन
- दिनांक: 6 मई, 2026

