प्रधानमंत्री आवास के पास स्थित झुग्गियों को हटाने पर दिल्ली हाईकोर्ट की रोक से इनकार; राष्ट्रीय सुरक्षा का दिया हवाला

दिल्ली हाईकोर्ट ने लोक कल्याण मार्ग स्थित प्रधानमंत्री के आधिकारिक आवास के पास मौजूद तीन झुग्गी बस्तियों को खाली करने के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया है। हाईकोर्ट ने एयरफोर्स स्टेशन की सुरक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा के हितों को सर्वोपरि बताते हुए निवासियों को 15 दिनों के भीतर परिसर खाली करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि शेष निवासियों को सरकार द्वारा आवंटित वैकल्पिक आवास में स्थानांतरित होना होगा।

इस मामले में मुख्य कानूनी सवाल यह था कि क्या भाई राम कैंप, डीआईडी कैंप और मस्जिद कैंप—जो प्रधानमंत्री आवास के बेहद करीब स्थित हैं—के निवासियों को वहां से हटाना उनके आश्रय और आजीविका के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। याचिकाकर्ताओं ने सावदा घेवरा में किए जा रहे पुनर्वास को यह कहते हुए चुनौती दी थी कि वह उनके कार्यस्थल और बच्चों के स्कूलों से काफी दूर है। न्यायमूर्ति पुरुषेंद्र कुमार कौरव ने याचिका को खारिज करते हुए कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा के मद्देनजर इन झुग्गियों को हटाना आवश्यक है और पुनर्वास की प्रक्रिया स्थापित नियमों के अनुसार की जा रही है।

ये झुग्गी बस्तियां एक अत्यंत संवेदनशील और उच्च सुरक्षा वाले क्षेत्र में स्थित हैं, जो सीधे एक चालू एयरफोर्स स्टेशन और प्रधानमंत्री आवास से सटी हुई हैं। अक्टूबर 2025 में, भूमि एवं विकास कार्यालय (L&DO) ने इन निवासियों को बेदखली का नोटिस जारी किया था। केंद्र सरकार का तर्क था कि रक्षा बुनियादी ढांचे को मजबूत करने और सुरक्षा उद्देश्यों के लिए इन अनधिकृत निर्माणों को हटाना अनिवार्य है।

पुनर्वास योजना के तहत कुल 717 निवासियों को सावदा घेवरा में स्थानांतरित किया जाना है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, 192 निवासी पहले ही आवंटन पत्र स्वीकार कर चुके हैं और 136 लोग अपने नए फ्लैटों में जा चुके हैं। बाकी निवासियों ने इस बेदखली को रोकने या उसी स्थान पर पुनर्वास (in-situ rehabilitation) की मांग को लेकर हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

निवासियों का तर्क था कि सावदा घेवरा उनके वर्तमान स्थान से बहुत दूर है, जिससे उनकी आजीविका पर संकट खड़ा हो जाएगा। साथ ही, उन्होंने दलील दी कि इतनी दूर जाने से उनके स्कूल जाने वाले बच्चों की शिक्षा पर भी बुरा असर पड़ेगा। उन्होंने मांग की कि या तो बेदखली पर रोक लगाई जाए या उन्हें पास में ही कोई विकल्प दिया जाए।

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सरकार ने स्पष्ट किया कि यह भूमि केंद्र सरकार की है और वर्तमान में भारतीय सेना व वायु सेना के कब्जे में है। सरकार के अनुसार, सुरक्षा कारणों और “संरक्षित क्षेत्र” की संवेदनशीलता की वजह से उसी स्थान पर पुनर्वास संभव नहीं है। यह निर्णय रक्षा ढांचे की सुरक्षा और अन्य महत्वपूर्ण सार्वजनिक उद्देश्यों के लिए लिया गया है।

न्यायमूर्ति कौरव ने गौर किया कि निवासियों को अक्टूबर 2025 में ही नोटिस दे दिए गए थे, जिससे उनके पास वैकल्पिक व्यवस्था करने के लिए पर्याप्त समय था। व्यक्तिगत अधिकारों और राज्य की सुरक्षा के बीच संतुलन बनाते हुए हाईकोर्ट ने कहा:

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“वर्तमान भू-राजनीतिक घटनाक्रम और राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी चिंताएं याचिकाकर्ताओं को हटाने के विशिष्ट कारण थे, और कोर्ट को ऐसे नीतिगत निर्णयों में हस्तक्षेप करने के लिए बहुत उत्सुक नहीं होना चाहिए।”

कोर्ट ने आगे स्पष्ट किया कि आश्रय का अधिकार पूर्ण (absolute) नहीं है। यदि नीति के अनुसार पुनर्वास प्रदान किया जाता है, तो इस अधिकार का सम्मान माना जाता है। फैसले में कहा गया कि दिल्ली धार्मिक शहरी आश्रय सुधार बोर्ड (DUSIB) की नीति के तहत निवासियों के हितों को सुरक्षित किया गया है, इसलिए यह मौलिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं है।

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पुनर्वास प्रक्रिया को रोकने की मांग पर कोर्ट ने टिप्पणी की कि ऐसा करना उन सैकड़ों निवासियों के हितों के खिलाफ होगा जो पहले ही आवंटन स्वीकार कर चुके हैं और वहां से स्थानांतरित हो चुके हैं।

हाईकोर्ट ने शेष याचिकाकर्ताओं को 15 दिनों के भीतर झुग्गियां खाली करने का आदेश दिया। जिन लोगों ने अभी तक वैकल्पिक आवंटन स्वीकार नहीं किया है, उन्हें निर्देश दिया गया है कि वे तुरंत अपने आवंटन पत्र प्राप्त करें और सावदा घेवरा स्थित फ्लैटों का कब्जा लें।

विस्थापन के प्रभाव को कम करने के लिए, कोर्ट ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे DUSIB प्रोटोकॉल का सख्ती से पालन करें और यह सुनिश्चित करें कि नए स्थान पर निम्नलिखित सुविधाएं उपलब्ध हों:

  • बच्चों की शिक्षा के लिए उचित व्यवस्था
  • पानी और स्वच्छता की सुविधा
  • परिवहन और यात्रा सहायता

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि यह पुनर्वास प्रक्रिया सुरक्षा आवश्यकताओं और नागरिकों के पुनर्वास के प्रति राज्य के दायित्व के बीच एक संतुलित दृष्टिकोण है।

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