इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक मृतक संपत्ति मालिक के कानूनी उत्तराधिकारियों द्वारा दायर प्रथम अपील को खारिज कर दिया है और ‘एग्रीमेंट टू सेल’ के विशिष्ट अनुपालन (Specific Performance) के पक्ष में निचली अदालत के आदेश को बरकरार रखा है। जस्टिस संदीप जैन की पीठ ने स्पष्ट किया कि वादी (शिवानी हॉस्पिटल प्राइवेट लिमिटेड) ने अनुबंध की शर्तों को पूरा करने के लिए निरंतर अपनी तत्परता और इच्छा (Ready and Willing) प्रदर्शित की थी, जबकि चूक विक्रेताओं की ओर से हुई थी, जो तय शर्तों के अनुसार संपत्ति को “फ्रीहोल्ड” कराने में विफल रहे।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद कानपुर के सर्वोदय नगर स्थित एक आवासीय भूखंड के लिए 22 अक्टूबर 2012 को हुए पंजीकृत ‘एग्रीमेंट टू सेल’ से शुरू हुआ था। इस संपत्ति के मालिक स्वर्गीय धर्म प्रकाश नांगिया थे, जिन्होंने इसे शिवानी हॉस्पिटल प्राइवेट लिमिटेड को 5.25 करोड़ रुपये में बेचने का समझौता किया था। समझौते के समय बयाने (earnest money) के रूप में 2 करोड़ रुपये का भुगतान किया गया था।
समझौते की एक मुख्य शर्त यह थी कि विक्रेता अपने खर्च पर दिसंबर 2014 तक संपत्ति को लीजहोल्ड से फ्रीहोल्ड में परिवर्तित कराएगा और उसके बाद सेल डीड (बिक्री विलेख) निष्पादित करेगा। वादी ने 2014 और 2015 के बीच इन खर्चों के लिए नांगिया को अतिरिक्त 41 लाख रुपये का भुगतान भी किया। हालांकि, फ्रीहोल्ड की प्रक्रिया पूरी होने से पहले ही 4 जुलाई 2015 को धर्म प्रकाश नांगिया का निधन हो गया। उनके निधन के बाद, उनकी बेटियों (अपीलकर्ताओं) ने सेल डीड लिखने से इनकार कर दिया, जिसके बाद वादी को 2017 में विशिष्ट अनुपालन के लिए मुकदमा दायर करना पड़ा।
पक्षों के तर्क
अपीलकर्ता (प्रतिवादी): वरिष्ठ अधिवक्ता श्री राहुल सहाय के माध्यम से अपीलकर्ताओं ने तर्क दिया कि:
- वादी समझौते की तारीख से डिक्री तक अपनी वित्तीय क्षमता (readiness) साबित करने में विफल रहा।
- शुरुआती 38 लाख रुपये का एक चेक बाउंस हो गया था, जो वित्तीय अक्षमता को दर्शाता है।
- यह समझौता “अनुचित प्रभाव” (Undue Influence) का परिणाम था क्योंकि अस्पताल के निदेशक मृतक के पारिवारिक डॉक्टर थे।
- समय विस्तार के लिए 21 दिसंबर 2014 का नोटरीकृत दस्तावेज वादी द्वारा फर्जी तरीके से तैयार किया गया था।
- रजिस्ट्रेशन एक्ट की धारा 32A के तहत सब-रजिस्ट्रार कार्यालय में वादी के प्रतिनिधि की उपस्थिति अनिवार्य थी, और उनकी कथित अनुपस्थिति से साबित होता है कि वे संपत्ति खरीदने के इच्छुक नहीं थे।
उत्तरदाता (वादी): वरिष्ठ अधिवक्ता श्री मनीष गोयल के माध्यम से वादी ने तर्क दिया कि:
- वे हमेशा तत्पर और तैयार थे, और पहले ही 2.41 करोड़ रुपये का भुगतान कर चुके थे।
- देरी का एकमात्र कारण विक्रेता द्वारा फ्रीहोल्ड अनुमति प्राप्त करने में विफलता थी, जो एक अनिवार्य शर्त थी।
- 38 लाख रुपये का चेक बाद में भुना लिया गया था, जिसे प्रतिवादियों ने भी स्वीकार किया है।
- संपत्ति को सर्किल रेट से अधिक दर पर खरीदा गया था, जो “अनुचित प्रभाव” या “कम कीमत” के आरोपों को खारिज करता है।
- शेष 2.84 करोड़ रुपये की राशि पहले ही ट्रायल कोर्ट में जमा की जा चुकी है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
1. तत्परता और इच्छा (Readiness and Willingness): हाईकोर्ट ने पाया कि वादी ने कुल राशि का लगभग आधा हिस्सा (2.41 करोड़ रुपये) भुगतान कर दिया था और कानूनी नोटिस के माध्यम से लगातार संपर्क में था। नाथू लाल बनाम फूल चंद (1969) मामले का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि यदि अनुबंध की शर्तें एक क्रम में पूरी होनी हैं, तो एक पक्ष दूसरे पक्ष से तब तक शर्तों के पालन की मांग नहीं कर सकता जब तक कि वह स्वयं अपनी प्राथमिकता वाली शर्तों (इस मामले में फ्रीहोल्ड कराना) को पूरा न कर दे।
2. वित्तीय क्षमता: चेक बाउंस होने के मुद्दे पर हाईकोर्ट ने नोट किया कि चेक बाद में क्लियर हो गया था और विक्रेता ने कभी भी समझौता रद्द करने की कार्रवाई शुरू नहीं की। जस्टिस जैन ने कहा, “प्रतिवादी को भुगतान की जाने वाली राशि की उपलब्धता… समझौते के निष्पादन की तारीख से डिक्री की तारीख तक साबित होनी चाहिए।” कोर्ट ने पाया कि वादी की बैलेंस शीट और अंततः ट्रायल कोर्ट में जमा की गई धनराशि उनकी मजबूत वित्तीय स्थिति को प्रमाणित करती है।
3. धोखाधड़ी और अनुचित प्रभाव के आरोप: हाईकोर्ट ने “अनुचित प्रभाव” के दावे को खारिज कर दिया, क्योंकि डॉक्टर-मरीज के संबंधों का कोई दस्तावेजी सबूत नहीं था और समझौता विक्रेताओं के एक रिश्तेदार की उपस्थिति में हुआ था। विवादित नोटरीकृत दस्तावेज (पेपर नंबर 130-C) के संबंध में कोर्ट ने कहा कि यदि वादी इसे साबित करने में विफल भी रहा, तब भी मुकदमा समय सीमा (limitation period) के भीतर ही दायर किया गया था।
4. रजिस्ट्रेशन एक्ट की धारा 32A: हाईकोर्ट ने रजिस्ट्री के दौरान खरीदार (vendee) की उपस्थिति की कानूनी स्थिति स्पष्ट की। कोर्ट ने कहा कि उत्तर प्रदेश में लागू रजिस्ट्रेशन एक्ट की धारा 32A का स्वरूप केंद्रीय संशोधन से भिन्न है। अलोका बोस बनाम परमात्मा देवी (2009) और रतन सिंह बनाम निर्मल गिल (2021) का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने कहा:
“यह स्पष्ट है कि उत्तर प्रदेश राज्य में प्रचलित रजिस्ट्रेशन एक्ट की धारा 32A के प्रावधानों के अनुसार, सेल डीड के पंजीकरण के समय खरीदार की उपस्थिति अनिवार्य नहीं थी।”
कोर्ट का निर्णय
हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि ट्रायल कोर्ट के फैसले में कोई कानूनी त्रुटि (perversity) नहीं थी। डिक्री को बरकरार रखते हुए कोर्ट ने कहा कि मुकदमेबाजी के दौरान संपत्ति की कीमतों में अत्यधिक वृद्धि ‘विशिष्ट अनुपालन’ की डिक्री देने से इनकार करने का आधार नहीं हो सकती।
अपील को खर्च के साथ खारिज कर दिया गया। प्रतिवादियों को निर्देश दिया गया कि वे एक महीने के भीतर वादी के पक्ष में सेल डीड निष्पादित करें, ऐसा न करने पर वादी अदालत के माध्यम से इसे लागू कराने के लिए स्वतंत्र होगा।
केस विवरण ब्लॉक:
- केस शीर्षक: मीमांसा नांगिया और 2 अन्य बनाम शिवानी हॉस्पिटल प्राइवेट लिमिटेड
- केस संख्या: फर्स्ट अपील संख्या 485 ऑफ 2025
- पीठ: जस्टिस संदीप जैन
- दिनांक: 06.05.2026

