सोहराबुद्दीन शेख मामला: बॉम्बे हाई कोर्ट ने बरकरार रखा 22 आरोपियों को बरी करने का फैसला, भाइयों की याचिका खारिज

लगभग दो दशक पुराने चर्चित सोहराबुद्दीन शेख कथित फर्जी मुठभेड़ मामले में बॉम्बे हाई कोर्ट ने गुरुवार को एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। अदालत ने इस मामले के सभी 22 आरोपियों को बरी करने के निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा है। मुख्य न्यायाधीश श्री चंद्रशेखर और न्यायमूर्ति गौतम अंखाद की खंडपीठ ने सोहराबुद्दीन के भाइयों, रुबाबुद्दीन और नयाबुद्दीन द्वारा दायर उन अपीलों को खारिज कर दिया, जिसमें 2018 के फैसले को चुनौती दी गई थी।

हाई कोर्ट ने विशेष सीबीआई अदालत के दिसंबर 2018 के उस फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया, जिसमें साक्ष्यों के अभाव में सभी आरोपियों को दोषमुक्त कर दिया गया था। बरी किए गए 22 लोगों में गुजरात और राजस्थान पुलिस के 21 कनिष्ठ अधिकारी और एक फार्महाउस का मालिक शामिल है।

अदालत ने माना कि अभियोजन पक्ष (Prosecution) यह साबित करने में विफल रहा कि सोहराबुद्दीन, उसकी पत्नी कौसर बी और सहयोगी तुलसीराम प्रजापति की हत्या के पीछे कोई सोची-समझी साजिश थी। इससे पहले विशेष अदालत ने भी अपनी टिप्पणी में कहा था कि जांच एजेंसी आरोपियों की विशिष्ट भूमिका को साबित करने के लिए ठोस सबूत पेश नहीं कर सकी।

इस मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) को सौंपी गई थी। हालांकि, पिछले साल सीबीआई ने हाई कोर्ट को सूचित किया था कि उसने 2018 के फैसले को स्वीकार कर लिया है और वह इसके खिलाफ कोई अपील दायर नहीं करेगी।

यह मामला नवंबर 2005 का है, जब सोहराबुद्दीन शेख, उसकी पत्नी कौसर बी और तुलसीराम प्रजापति हैदराबाद से महाराष्ट्र के सांगली जा रहे थे। रास्ते में एक पुलिस टीम ने उन्हें बस से उतार लिया।

  • 26 नवंबर 2005: गुजरात पुलिस ने दावा किया कि सोहराबुद्दीन अहमदाबाद के पास एक मुठभेड़ में मारा गया।
  • कौसर बी की मौत: जांच एजेंसी के अनुसार, सोहराबुद्दीन की पत्नी की हत्या उसके कुछ दिनों बाद कर दी गई।
  • दिसंबर 2006: मामले के मुख्य चश्मदीद गवाह तुलसीराम प्रजापति की भी गुजरात-राजस्थान सीमा के पास एक अन्य मुठभेड़ में मौत हो गई।
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निष्पक्ष सुनवाई सुनिश्चित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को गुजरात से मुंबई स्थानांतरित कर दिया था। सोहराबुद्दीन के भाइयों ने अपनी अपील में तर्क दिया था कि मूल सुनवाई त्रुटिपूर्ण थी और गवाहों के बयानों को सही ढंग से दर्ज नहीं किया गया था। उन्होंने मामले में दोबारा सुनवाई (Retrial) की मांग की थी।

विशेष अदालत ने अपने मूल फैसले में यह भी उल्लेख किया था कि सीबीआई इन पुलिस अधिकारियों और स्थानीय राजनेताओं के बीच किसी भी प्रकार के ‘नेक्सस’ (गठजोड़) को साबित नहीं कर पाई। मामले में नामजद कुछ वरिष्ठ राजनेताओं को ट्रायल शुरू होने से पहले ही आरोपमुक्त कर दिया गया था।

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आज के फैसले के साथ ही इन 22 आरोपियों को मिली कानूनी राहत अब पुख्ता हो गई है। हाई कोर्ट इस मामले में विस्तृत फैसला बाद में जारी करेगा।2 आरोपियों को मिली कानूनी राहत अब पुख्ता हो गई है। हाई कोर्ट इस मामले में विस्तृत फैसला बाद में जारी करेगा।

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