एआई तकनीक में गरीबों के प्रति ‘अंतर्निहित भेदभाव’, सामाजिक न्याय ही मानवीय समाज की बुनियाद: सीजेआई सूर्यकांत

भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने समाज में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के बढ़ते दखल पर चिंता जताते हुए आगाह किया है कि यह तकनीक आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के प्रति ‘पक्षपाती’ रुख अपना रही है। बुधवार को एक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि एआई के बढ़ते प्रभाव के बावजूद, एक मानवीय और समतावादी समाज के निर्माण के लिए ‘सामाजिक न्याय’ ही सबसे महत्वपूर्ण आधार बना रहना चाहिए।

एनजीओ ‘रिस्पेक्ट इंडिया’ द्वारा आयोजित 8वें दिनकर स्मृति व्याख्यान “रश्मिरथी: सामाजिक न्याय का महाकाव्य” में बोलते हुए सीजेआई ने कहा कि ऐसी खबरें आने लगी हैं कि एआई तकनीक भेदभाव करती है और कभी-कभी यह पूर्वाग्रहों से ग्रसित होती है।

‘राष्ट्रकवि’ रामधारी सिंह दिनकर को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए सीजेआई सूर्यकांत ने कहा कि समानता और मानवीय गरिमा के जिन आदर्शों को भारतीय संविधान में शामिल किया गया, उनकी गूंज बहुत पहले ही दिनकर की रचनाओं में सुनाई दे चुकी थी।

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हिंदी में दिए अपने संबोधन के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने अपने बचपन के दिनों को याद किया। उन्होंने बताया कि उनके परिवार ने उन्हें दिनकर के साथ-साथ मुंशी प्रेमचंद, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’, हरिवंश राय बच्चन और महादेवी वर्मा जैसे महान लेखकों को पढ़ने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने रेखांकित किया कि जिस तरह इन कवियों की लेखनी ने स्वतंत्रता संग्राम के दौरान लोगों को मरहम लगाने और क्रांति का संचार करने का काम किया, उसी तरह कानून को भी आम जनता को संबल और राहत प्रदान करनी चाहिए।

सीजेआई ने कहा, “साहित्यकारों ने हमेशा समाज को प्रेरित किया है। कानून में हम ‘पोएटिक जस्टिस’ (काव्यात्मक न्याय) की बात करते हैं, यह अवधारणा भी इन्हीं महान कवियों से आई है। दिनकर की कविताएं सामाजिक न्याय पर केंद्रित हैं, ठीक उसी तरह जैसे कानून भी समाज में सामाजिक समानता और सद्भाव पर जोर देता है।”

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दिनकर के महाकाव्य ‘रश्मिरथी’ के पाठों का उल्लेख करते हुए सीजेआई ने इस बात पर चिंता जताई कि इस कालजयी रचना के लिखे जाने के सात दशक बाद भी समाज में असमानताएं बनी हुई हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि केवल कानून बना देना ही पर्याप्त नहीं है।

मुख्य न्यायाधीश ने कहा, “लोकतंत्र में समानता, गरिमा और सामाजिक सद्भाव अनिवार्य हैं। सिर्फ कानून पारित करना तब तक पर्याप्त नहीं है जब तक कि हर व्यक्ति के साथ सम्मान और गरिमापूर्ण व्यवहार न किया जाए।” उन्होंने याद दिलाया कि महात्मा गांधी ने दिनकर को ‘राष्ट्रकवि’ की उपाधि इसलिए दी थी क्योंकि उनके लेखन में देश की आत्मा, उसकी आकांक्षाएं, पीड़ा और संघर्ष प्रतिबिंबित होते थे।

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इस कार्यक्रम में कानून और राजनीति जगत की कई प्रमुख हस्तियां शामिल हुईं। सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) के अध्यक्ष विकास सिंह ने कहा कि दिनकर का लेखन हमारी सभ्यता के मूल्यों में निहित न्याय के बुनियादी सिद्धांतों को दर्शाता है। कार्यक्रम के दौरान लोकसभा सांसद मनोज तिवारी को ‘दिनकर संस्कृति सम्मान’ से नवाजा गया।

एनजीओ ‘रिस्पेक्ट इंडिया’ के संस्थापक मनीष कुमार चौधरी और दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर रामेश्वर राय ने भी दिनकर की प्रासंगिकता पर विचार साझा किए। इस अवसर पर सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश न्यायमूर्ति पी.बी. वराले सहित कई वरिष्ठ वकील और विभिन्न विश्वविद्यालयों के छात्र उपस्थित रहे।

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