अनुच्छेद 21 के तहत त्वरित सुनवाई का अधिकार सर्वोपरि, हत्या के मामले में भी जमानत का आधार: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने हत्या के एक मामले में आरोपी को जमानत देते हुए यह महत्वपूर्ण टिप्पणी की है कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदत्त ‘त्वरित सुनवाई’ (Speedy Trial) के अधिकार का उल्लंघन होने पर, अपराध की गंभीरता चाहे जो भी हो, जमानत की अर्जी पर उचित विचार किया जाना चाहिए।

जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने 4 मई, 2026 को यह आदेश पारित करते हुए बॉम्बे हाईकोर्ट (कोल्हापुर बेंच) द्वारा जमानत याचिका खारिज करने के फैसले को रद्द कर दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता साहिल मनोज मचारे को 1 नवंबर 2022 को कोल्हापुर जिले के शाहपुर पुलिस स्टेशन में दर्ज अपराध संख्या 322/2022 के सिलसिले में गिरफ्तार किया गया था। उन पर भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302 और धारा 34 के तहत हत्या का आरोप था।

याचिकाकर्ता पिछले लगभग चार वर्षों से न्यायिक हिरासत में था। ट्रायल कोर्ट ने वर्ष 2024 में आरोप (Charges) तय कर दिए थे, लेकिन इसके बावजूद अभियोजन पक्ष अब तक एक भी गवाह का परीक्षण करने में विफल रहा।

पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील श्री रिजवी मोहम्मद ने आरोपी के लंबे समय से जेल में होने और मुकदमे में कोई प्रगति न होने का मुद्दा उठाया। वहीं, महाराष्ट्र राज्य की ओर से पेश वकील श्री भरत बगला ने याचिका का विरोध किया और संभवतः धारा 302 के तहत आरोपों की गंभीरता का हवाला दिया।

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कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

सुप्रीम कोर्ट ने मुकदमे की सुस्त रफ्तार पर कड़ा संज्ञान लिया। कोर्ट ने पाया कि पर्याप्त समय बीतने और दो साल पहले आरोप तय होने के बावजूद मामला गवाहों के परीक्षण के स्तर तक भी नहीं पहुंच पाया है।

त्वरित सुनवाई के संवैधानिक अधिकार पर कोर्ट ने कहा:

“ऊपर संदर्भित परिस्थितियों में, हमारे पास यह कहने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत निहित आरोपी के त्वरित सुनवाई के अधिकार का उल्लंघन हुआ कहा जा सकता है।”

अपराध की गंभीरता और संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन पर पीठ ने स्पष्ट किया कि अत्यधिक देरी होने पर अपराध की प्रकृति अधिकारों को दरकिनार नहीं कर सकती। कोर्ट ने टिप्पणी की:

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“हम इस तथ्य से अवगत हैं कि याचिकाकर्ता पर हत्या के अपराध का आरोप है, लेकिन हमने बार-बार कहा है कि अपराध चाहे कितना भी गंभीर क्यों न हो, यदि त्वरित सुनवाई के अधिकार का उल्लंघन होता है, तो कोर्ट को जमानत की याचिका पर उचित रूप से विचार करना चाहिए।”

कोर्ट ने अपने निर्णय के लिए मुख्य कारक के रूप में याचिकाकर्ता की चार साल की कैद और एक भी गवाह के बयान दर्ज न होने को आधार बनाया।

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कोर्ट का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने विशेष अनुमति याचिका (SLP) को स्वीकार करते हुए याचिकाकर्ता को तत्काल जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया। यह रिहाई ट्रायल कोर्ट द्वारा निर्धारित नियमों और शर्तों के अधीन होगी। कोर्ट ने निर्देश दिया कि यदि याचिकाकर्ता किसी अन्य मामले में वांछित नहीं है, तो उसे तुरंत रिहा किया जाए।

केस विवरण

  • केस टाइटल: साहिल मनोज मचारे बनाम महाराष्ट्र राज्य
  • केस नंबर: स्पेशल लीव टू अपील (Crl.) नंबर 7502/2026
  • पीठ: जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस विजय बिश्नोई
  • तारीख: 4 मई, 2026

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