मथुरा में भीड़ नियंत्रण और अवैध निर्माण पर इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त, प्रशासन से मांगा ‘क्राइसिस मैनेजमेंट’ प्लान

मथुरा में त्योहारों के दौरान उमड़ने वाली भारी भीड़ और उससे पैदा होने वाले खतरों को देखते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने जिला प्रशासन से शहर में भीड़ प्रबंधन (Crowd Management) और आपदा प्रबंधन के लिए एक व्यापक योजना (Comprehensive Plan) की मांग की है। साथ ही, कोर्ट ने उन अवैध निर्माणों पर भी जवाब मांगा है जो आपातकालीन स्थिति में राहत कार्यों में बाधा डालते हैं।

यह आदेश जस्टिस विनोद दिवाकर ने स्वामी शिव स्वरूपानंद जी महाराज द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। हालांकि याचिका शुरुआत में मथुरा-वृंदावन विकास प्राधिकरण (MVDA) द्वारा की जा रही “चुनिंदा” ध्वस्तीकरण की कार्रवाई के खिलाफ थी, लेकिन हाईकोर्ट ने जन सुरक्षा के व्यापक हित को देखते हुए इसके दायरे को बढ़ा दिया। कोर्ट ने 2022 में बांके बिहारी मंदिर में जन्माष्टमी के दौरान हुई भगदड़ का भी उल्लेख किया, जिसमें दो श्रद्धालुओं की जान चली गई थी।

हाईकोर्ट ने इस बात पर गंभीर चिंता व्यक्त की कि मथुरा के ऐतिहासिक स्थलों पर त्योहारों के समय श्रद्धालुओं की भारी संख्या के कारण स्थिति खतरनाक हो जाती है। कोर्ट ने गौर किया कि शहर में बेतरतीब और अवैध निर्माण इस समस्या को और गंभीर बना देते हैं, क्योंकि ये आपातकालीन वाहनों और रेस्क्यू टीमों का रास्ता रोकते हैं।

जस्टिस दिवाकर ने मथुरा के जिलाधिकारी (DM) को यह स्पष्ट करने का निर्देश दिया है कि क्या जिले में भीड़ के व्यवहार का अध्ययन करने के लिए कोई विशेषज्ञ निकाय (Expert Body) मौजूद है। कोर्ट ने प्रशासन से निम्नलिखित बिंदुओं पर विवरण मांगा है:

  • विभिन्न विभागों के बीच समन्वय के लिए क्या तंत्र है?
  • भीड़ नियंत्रण के लिए किन वैज्ञानिक पद्धतियों का उपयोग किया जा रहा है?
  • क्या पिछली भगदड़ जैसी घटनाओं से सीख लेते हुए कोई शैक्षणिक या संस्थागत शोध किया गया है?
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याचिकाकर्ता स्वामी शिव स्वरूपानंद जी महाराज ने आरोप लगाया है कि MVDA की कार्रवाई भेदभावपूर्ण है। याचिका के अनुसार, प्राधिकरण ने 23 संपत्तियों को अवैध घोषित कर ध्वस्तीकरण के आदेश दिए थे, लेकिन कार्रवाई केवल याचिकाकर्ता और कुछ चुनिंदा लोगों के खिलाफ ही की गई।

इस पर संज्ञान लेते हुए हाईकोर्ट ने MVDA को एक विस्तृत हलफनामा दाखिल करने का अंतिम अवसर दिया है। प्राधिकरण को उन सभी 23 संपत्तियों की वर्तमान स्थिति और पिछले पांच वर्षों में दर्ज किए गए अवैध निर्माणों का पूरा ब्यौरा पेश करना होगा।

हाईकोर्ट ने मथुरा के नगर आयुक्त और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) को भी निर्देश दिया है कि वे शहर को सुरक्षित और रहने योग्य बनाने के लिए उठाए गए कदमों की जानकारी दें। कोर्ट ने यह भी पूछा है कि अवैध निर्माणों को रोकने और शहरी विकास को विनियमित करने के लिए वर्तमान में कौन से मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) और प्रशासनिक तंत्र लागू हैं।

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इस मामले की अगली सुनवाई 19 मई को होगी, जिसमें प्रशासन को अपनी कार्ययोजना और संस्थागत क्षमता बढ़ाने के प्रयासों की पूरी जानकारी कोर्ट के समक्ष रखनी होगी।

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