धार भोजशाला मामला: हाईकोर्ट ने मुस्लिम पक्ष को सर्वे की वीडियोग्राफी देखने के लिए सुविधाएं देने के निर्देश दिए

मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर बेंच ने भोजशाला-कमल मौला मस्जिद परिसर के वैज्ञानिक सर्वे से जुड़ी वीडियोग्राफी को लेकर बड़ा निर्देश दिया है। कोर्ट ने सोमवार को हाईकोर्ट के आईटी विभाग को आदेश दिया कि वह मुस्लिम पक्ष के वकील को सर्वे की वीडियोग्राफी देखने के लिए आवश्यक तकनीकी इंतजाम उपलब्ध कराए। यह कदम तब उठाया गया जब मुस्लिम पक्ष ने डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से इन फाइलों तक पहुँचने में तकनीकी दिक्कतों की बात कही।

जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की डिवीजन बेंच ने मौलाना कमालुद्दीन वेलफेयर सोसाइटी को निर्देश दिया है कि वे इस वीडियोग्राफी पर अपनी लिखित आपत्तियां 7 मई तक प्रस्तुत करें।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) ने हाल ही में धार स्थित 11वीं सदी के इस स्मारक का वैज्ञानिक सर्वे पूरा किया है। हिंदू समुदाय इस स्थान को वाग्देवी (देवी सरस्वती) का मंदिर मानता है, जबकि मुस्लिम पक्ष इसे कमल मौला मस्जिद के रूप में पहचानता है। वर्तमान में यह परिसर एएसआई के संरक्षण में है।

मामले की सुनवाई के दौरान धार स्थित मौलाना कमालुद्दीन वेलफेयर सोसाइटी के वकील तौसीफ वारसी ने बेंच को बताया कि उन्हें एएसआई सर्वे की वीडियोग्राफी एक्सेस करने में “तकनीकी समस्याओं” का सामना करना पड़ रहा है। इसके जवाब में एएसआई के वकील ने स्पष्ट किया कि कोर्ट के निर्देशानुसार फुटेज को गूगल ड्राइव पर अपलोड कर दिया गया था और सोसाइटी के वकील को इसका एक्सेस भी दिया जा चुका था।

पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए बेंच ने हाईकोर्ट के आईटी विभाग को सोमवार को ही वकील के लिए वीडियोग्राफी देखने की व्यवस्था करने को कहा। साथ ही, वरिष्ठ अधिवक्ता सलमान खुर्शीद को भी उनकी ईमेल आईडी के जरिए वीडियोग्राफी का एक्सेस साझा करने का निर्देश दिया गया।

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तकनीकी मुद्दों के अलावा, कोर्ट ने परिसर की ऐतिहासिक और नियामक स्थिति पर भी विस्तृत दलीलें सुनीं। एएसआई की ओर से पेश हुए एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) सुनील कुमार जैन ने स्मारक के संरक्षण का इतिहास बताते हुए कहा कि यह स्थल 1904 से ही एएसआई के नियामक नियंत्रण में है।

सुनवाई में एक महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब मुस्लिम पक्ष ने दावा किया कि 1935 में तत्कालीन धार रियासत की अदालत ने इस 11वीं सदी के स्मारक को मस्जिद घोषित किया था। हालांकि, एएसआई की ओर से एएसजी जैन ने इस दावे का खंडन किया। उन्होंने दलील दी कि एएसआई-संरक्षित स्मारकों से संबंधित मौजूदा प्रावधानों के कारण 1935 की उस घोषणा की अब कोई कानूनी वैधता नहीं रह गई है।

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हाईकोर्ट 6 अप्रैल से इस विवाद से जुड़ी चार याचिकाओं और एक रिट अपील पर नियमित सुनवाई कर रहा है। इन याचिकाओं के माध्यम से भोजशाला-कमल मौला मस्जिद परिसर की धार्मिक प्रकृति तय करने की मांग की गई है। एएसजी जैन की दलीलें 5 मई को भी जारी रहेंगी।

मौलाना कमालुद्दीन वेलफेयर सोसाइटी के पास अब वीडियोग्राफी की समीक्षा करने और 7 मई तक अपनी आपत्तियां दर्ज कराने के लिए तीन दिनों का समय है।

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