जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने संपत्ति विवाद में एक वाद पत्र (plaint) को खारिज करने वाले निचली अदालत के आदेश को रद्द कर दिया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी भी दीवानी मुकदमे के वाद पत्र को आंशिक रूप से खारिज नहीं किया जा सकता और निजी विभाजन (private partition) का अस्तित्व एक तथ्यात्मक मामला है जिसके लिए ट्रायल की आवश्यकता होती है। जस्टिस संजय धर ने कहा कि भले ही प्रतिकूल कब्जे (adverse possession) का दावा शुरुआती स्तर पर विफल हो जाए, लेकिन कब्जे के आधार पर स्थायी निषेधाज्ञा (permanent prohibitory injunction) की मांग करने का वादियों का अधिकार ट्रायल की मांग करता है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद श्रीनगर के नंदपोरा, निगीन में स्थित लगभग 47 कनाल भूमि से संबंधित है, जो मूल रूप से स्वर्गीय हाजी मोहम्मद जमाल मीर की थी। 3 जुलाई, 1971 को एक मध्यस्थता निर्णय (arbitral award) पारित किया गया था, जिसे बाद में ‘रूल ऑफ द कोर्ट’ बनाया गया। इस निर्णय में संपत्ति के विभाजन की व्यवस्था दी गई थी।
अपीलकर्ताओं (वादियों) ने घोषणा और निषेधाज्ञा के लिए एक मुकदमा दायर किया था। उनका दावा था कि 1971 के फैसले के बाद, 1982 में एक निजी विभाजन हुआ था। उन्होंने तर्क दिया कि उन्होंने अपने हिस्से पर कब्जा कर लिया और बाद में उसके साथ लगती लगभग 11 कनाल भूमि पर भी कब्जा कर लिया जो प्रतिवादियों के हिस्से में आई थी। वादियों का दावा था कि 1985-86 से इस अतिरिक्त भूमि पर उनका “निरंतर, निर्बाध और शांतिपूर्ण कब्जा” रहा है, जो 1994 में प्रतिकूल कब्जे के आधार पर मालिकाना हक में बदल गया।
प्रतिवादियों ने सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के आदेश VII नियम 11 के तहत आवेदन दायर कर वाद पत्र को खारिज करने की मांग की थी। ट्रायल कोर्ट (प्रथम अतिरिक्त जिला न्यायाधीश, श्रीनगर) ने 31 जुलाई, 2024 को इस आवेदन को स्वीकार करते हुए वाद पत्र खारिज कर दिया था। निचली अदालत का मानना था कि पक्षकार सह-मालिक (co-owners) हैं और वादी प्रतिकूल कब्जे के लिए आवश्यक ‘बेदखली’ (ouster) साबित करने में विफल रहे हैं।
पक्षकारों के तर्क
प्रतिवादियों का तर्क था कि विवादित भूमि अभी भी संयुक्त जोत (joint holding) है। उन्होंने 1971 के मध्यस्थता निर्णय का हवाला दिया, जिसमें सुझाव दिया गया था कि विभाजन राजस्व अधिकारियों द्वारा किया जाना चाहिए। उनका तर्क था कि चूंकि कोई औपचारिक विभाजन नहीं हुआ, इसलिए कानून की नजर में एक सह-मालिक का कब्जा सभी सह-मालिकों का कब्जा माना जाता है, जिससे प्रतिकूल कब्जे का दावा स्वतः ही समाप्त हो जाता है।
इसके विपरीत, अपीलकर्ताओं ने तर्क दिया कि ट्रायल कोर्ट ने “निजी विभाजन” से संबंधित उनकी विशिष्ट दलीलों को नजरअंदाज कर दिया। उन्होंने कहा कि मध्यस्थता निर्णय निजी विभाजन को नहीं रोकता था और यह एक तथ्य का प्रश्न है जिसे केवल ट्रायल के माध्यम से ही निर्धारित किया जा सकता है।
हाईकोर्ट का विश्लेषण
जस्टिस संजय धर ने गौर किया कि CPC के आदेश VII नियम 11(a) के उद्देश्य के लिए, अदालत को केवल वाद पत्र में किए गए दावों और उसके साथ संलग्न दस्तावेजों पर विचार करना चाहिए और उन्हें उनके अंकित मूल्य पर सत्य मानना चाहिए।
निजी विभाजन पर: हाईकोर्ट ने नोट किया कि वादियों ने स्पष्ट रूप से कहा था कि मध्यस्थता निर्णय के बाद भूमि का “निजी तौर पर विभाजन हुआ था”। कोर्ट ने कहा:
“यह मुद्दा कि क्या पक्षकारों ने राजस्व अधिकारियों की मदद के बिना संपत्ति का निजी तौर पर विभाजन किया था, प्रकृति में तथ्यात्मक है… एक बार जब संपत्ति की स्थिति (चाहे वह संयुक्त थी या विभाजित) एक विचारणीय मुद्दा बन जाती है, तो वाद पत्र को आदेश VII नियम 11 के तहत खारिज नहीं किया जा सकता था।”
प्रतिकूल कब्जे और निषेधाज्ञा पर: कोर्ट ने पाया कि वादियों ने प्रतिकूल कब्जे के आवश्यक तत्वों का उल्लेख किया था, जिसमें कब्जे की अवधि और प्रकृति (1985-86 में भूमि की घेराबंदी) शामिल थी। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि कोर्ट ने रेखांकित किया कि भले ही प्रतिकूल कब्जे के दावे को हटा दिया जाए, फिर भी निषेधाज्ञा (injunction) के लिए मुकदमा बना रहता है।
वाद पत्र को आंशिक रूप से खारिज करने पर: हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण कानूनी सिद्धांत पर जोर देते हुए कहा:
“यह स्थापित कानून है कि वाद पत्र को आंशिक रूप से खारिज नहीं किया जा सकता है। इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट के कु. गीता बनाम नंजुंदास्वामी और अन्य (2024) 14 SCC 390 के फैसले का हवाला दिया जा सकता है… जिसमें यह निर्धारित किया गया कि वाद पत्र को आंशिक रूप से खारिज नहीं किया जा सकता।”
हाईकोर्ट ने कहा कि चूंकि वादी स्वीकार्य रूप से कब्जे में हैं, इसलिए वे प्रतिवादियों के खिलाफ स्थायी निषेधाज्ञा के माध्यम से उस कब्जे की सुरक्षा की मांग करने के हकदार हैं, चाहे प्रतिकूल कब्जे के माध्यम से उनका मालिकाना हक का दावा सफल हो या न हो।
अदालत का निर्णय
हाईकोर्ट ने अपील स्वीकार कर ली और ट्रायल कोर्ट के 31 जुलाई, 2024 के आदेश को रद्द कर दिया। मामले को वापस ट्रायल कोर्ट भेज दिया गया है और निर्देश दिया गया है कि पक्षकारों की दलीलों के आधार पर मुद्दे (issues) तय किए जाएं और कानून के अनुसार ट्रायल की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जाए।
केस विवरण
- केस का शीर्षक: नजीर अहमद मीर और अन्य बनाम इशफाक अहमद मीर और अन्य
- केस संख्या: RFA संख्या 60/2024
- पीठ: जस्टिस संजय धर
- दिनांक: 30 अप्रैल, 2026

