‘अदालत के साथ आंख-मिचौली’: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने वकील की PIL ₹25 हजार लागत के साथ खारिज की

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दौराला शुगर मिल, मेरठ के खिलाफ दायर एक जनहित याचिका को खारिज करते हुए कहा कि यह याचिका न्यायिक प्रक्रिया का “घोर दुरुपयोग और कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग” है। कोर्ट ने याचिकाकर्ता अधिवक्ता पर ₹25,000 की लागत लगाई और उन्हें चेतावनी दी कि वह ऐसे कृत्यों में शामिल न हों, जिनसे भविष्य में कोर्ट को और कठोर कार्रवाई करनी पड़े।

मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली और जस्टिस क्षितिज शैलेंद्र की खंडपीठ ने यह आदेश रविंद्र अहलावत @ रविंद्र कुमार बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और 4 अन्य मामले में पारित किया।

मामला क्या था?

याचिकाकर्ता रविंद्र अहलावत @ रविंद्र कुमार ने हाईकोर्ट में जनहित याचिका दाखिल कर दौराला शुगर मिल, मेरठ पर दौराला लोअर राजवाहा के दोनों ओर की सड़क/रास्ते पर कथित अवैध अतिक्रमण का आरोप लगाया था।

याचिका में कार्यपालक अभियंता, मेरठ खंड, गंगा नहर/सिंचाई विभाग, मेरठ और जिलाधिकारी, मेरठ को कथित अतिक्रमण हटाने का निर्देश देने की मांग की गई थी।

याचिकाकर्ता का कहना था कि दौराला लोअर राजवाहा, जो एक मिनी नहर है, तहसील सरधना, जिला मेरठ में मिल के पास से गुजरती है। उसके दोनों ओर का रास्ता कई गांवों को जोड़ता है। याचिकाकर्ता ने दावा किया कि मिल द्वारा किए गए कथित अतिक्रमण से ग्रामीणों को भारी असुविधा हो रही है।

याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि उसने समय-समय पर अधिकारियों को आवेदन देकर अतिक्रमण हटाने की मांग की, लेकिन कोई प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई। उसके अनुसार, 5 दिसंबर 2022 को गंगा नहर, मेरठ के सहायक अभियंता ने अतिक्रमण हटाने के लिए जिलेदार को निर्देश जारी करने की बात कही थी, लेकिन उसके बाद भी कुछ नहीं हुआ।

मिल ने याचिकाकर्ता की साख और मंशा पर सवाल उठाए

जब मामला 9 फरवरी 2026 को पहली बार सुनवाई के लिए आया, तो दौराला शुगर मिल की ओर से दस्तावेजों का एक संकलन दाखिल किया गया और याचिकाकर्ता के खिलाफ गंभीर आरोप लगाए गए। इसके बाद याचिकाकर्ता को निर्देश लेने के लिए समय दिया गया और उसने 16 मार्च 2026 को सप्लीमेंट्री एफिडेविट दाखिल किया। मामले की अंतिम सुनवाई 28 अप्रैल 2026 को हुई।

दौराला शुगर मिल की ओर से कहा गया कि याचिकाकर्ता पहले गन्ना विकास परिषद का चेयरमैन रह चुका है और वह ऐसी कई गतिविधियों में शामिल रहा है, जिनके कारण उसके खिलाफ विभिन्न एफआईआर दर्ज हुईं।

मिल ने कोर्ट को बताया कि किसानों के कल्याण के नाम पर की गई उसकी गतिविधियों को लेकर जांच हुई थी, जिसमें उसे दोषी पाया गया। इसके बाद 12 अप्रैल 2018 को उसका प्राधिकार वापस ले लिया गया। उस आदेश को चुनौती देने वाली उसकी रिट याचिका Writ-C No. 39738 of 2019 को हाईकोर्ट ने 9 दिसंबर 2019 को खारिज कर दिया था।

मिल ने याचिकाकर्ता के खिलाफ दर्ज तीन आपराधिक मामलों का भी उल्लेख किया:

  1. FIR No. 1022 of 2017, धारा 504, 307 और 506 IPC, थाना सरधना, जिला मेरठ।
  2. FIR No. 0294 of 2019, धारा 506, 323 और 386 IPC, थाना दौराला, जिला मेरठ।
  3. FIR No. 0412 of 2019, धारा 504, 307 और 323 IPC, थाना दौराला, जिला मेरठ।
READ ALSO  15 साल की लड़की को अपने कृत्य की थी पूरी जानकारी: बॉम्बे हाई कोर्ट ने POCSO आरोपी को जमानत दी

मिल की ओर से दलील दी गई कि यह PIL जनहित में नहीं, बल्कि मिल के अधिकारियों से निजी हिसाब बराबर करने के लिए दुर्भावनापूर्ण तरीके से दाखिल की गई है।

अतिक्रमण के आरोप पर मिल का पक्ष

अतिक्रमण के आरोप पर दौराला शुगर मिल ने कहा कि 25 जून 2018 को मुख्य अभियंता, सिंचाई विभाग ने लोकहित में राजवाहा की भूमि की पट्टी का उपयोग करने की अनुमति दी थी। यह अनुमति कार्यालय ज्ञापन में दी गई शर्तों के अधीन थी और मिल ने उन शर्तों का कभी उल्लंघन नहीं किया।

मिल ने यह भी कहा कि 26 दिसंबर 2024 को निरीक्षण किया गया था, जिसमें कोई अतिक्रमण नहीं पाया गया। 10 जनवरी 2025 को कार्यपालक अभियंता द्वारा जारी पत्र में भी कहा गया कि किसानों के वाहन राजवाहा से सुविधाजनक रूप से गुजर रहे हैं।

मिल ने यह भी दलील दी कि वह वर्ष 1932 से संचालित है और 90 वर्षों से अधिक समय में किसी ने भी कथित अतिक्रमण या असुविधा को लेकर कोई आपत्ति नहीं उठाई। मिल के अनुसार, याचिकाकर्ता गन्ना विकास परिषद के चेयरमैन पद से हटने के बाद मिल प्रबंधन को परेशान कर रहा है।

याचिकाकर्ता ने क्या सफाई दी?

याचिकाकर्ता की ओर से कहा गया कि उसके खिलाफ दर्ज सभी आपराधिक मामलों में जांच एजेंसी ने फाइनल रिपोर्ट दाखिल कर दी है, इसलिए कोई आपराधिक मामला लंबित नहीं है।

हालांकि, दौराला शुगर मिल की ओर से इस दावे का विरोध किया गया। मिल ने कहा कि मामले अभी भी आपराधिक अदालतों के समक्ष लंबित हैं, चाहे फाइनल रिपोर्ट की स्वीकृति/अस्वीकृति के चरण में हों या अन्य रूप में।

मिल ने Crime Nos. 412 of 2019 और 1022 of 2017 से संबंधित स्टेटस रिपोर्ट कोर्ट के सामने रखीं, जिनसे यह दिखा कि मामले सक्षम आपराधिक अदालत में लंबित हैं और उनमें लगातार तारीखें लग रही हैं।

हाईकोर्ट ने कहा: याचिकाकर्ता साफ हाथों से कोर्ट नहीं आया

हाईकोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता ने अपनी PIL में अपने बारे में केवल इतना बताया था कि वह अधिवक्ता है और विवादित रास्ते से गुजरने वाला व्यक्ति है।

कोर्ट ने कहा कि जब 9 फरवरी 2026 को मिल ने दस्तावेजों के जरिए उसकी साख पर सवाल उठाए, तभी याचिकाकर्ता ने 16 मार्च 2026 को सप्लीमेंट्री एफिडेविट दाखिल कर यह स्वीकार किया कि वह जून 2016 से 2021 तक गन्ना विकास परिषद का चेयरमैन रहा था।

आपराधिक मामलों पर कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ता ने दावा किया कि सभी एफआईआर में फाइनल रिपोर्ट दाखिल होकर स्वीकार हो चुकी है। लेकिन उसने केवल Crime No. 412 of 2019 में 13 दिसंबर 2021 को पारित आदेश की प्रति लगाई, जिसमें एसीजेएम कोर्ट नंबर 3, मेरठ ने फाइनल रिपोर्ट स्वीकार की थी।

कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता ने यह तथ्य नहीं बताया कि बाकी मामलों में फाइनल रिपोर्ट स्वीकार या अस्वीकार करने का प्रश्न अभी अदालतों के सामने लंबित है।

इस पर हाईकोर्ट ने टिप्पणी की:

“प्रतिवादी संख्या 5 की ओर से यह तथ्य अदालत के संज्ञान में लाए जाने से याचिकाकर्ता की मंशा स्पष्ट हो जाती है कि वह अदालत के साथ आंख-मिचौली खेल रहा है।”

कोर्ट ने आगे कहा:

“कोर्ट की राय में, याचिकाकर्ता साफ हाथों से इस कोर्ट के समक्ष नहीं आया है। शुरुआत में गन्ना विकास परिषद के चेयरमैन के रूप में अपनी स्थिति छिपाना और अपनी साख केवल एक अधिवक्ता तथा विवादित रास्ते/राजवाहा से गुजरने वाले व्यक्ति के रूप में बताना अपने आप में यह दर्शाता है कि उसकी मंशा निष्पक्ष नहीं थी।”

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता ने आपराधिक मामलों के संबंध में “झूठा और अधूरा खुलासा” किया।

कोर्ट ने अतिक्रमण का आरोप स्वीकार नहीं किया

हाईकोर्ट ने दौराला शुगर मिल पर लगाए गए अतिक्रमण के आरोप को भी स्वीकार करने से इनकार कर दिया।

READ ALSO  केवल विशेष लोक अभियोजक के बदलने के आधार पर गवाहों को दोबारा नहीं बुलाया जा सकता: कर्नाटक हाईकोर्ट

कोर्ट ने कहा कि मिल की ओर से रिकॉर्ड पर लाए गए दस्तावेजों के आधार पर यह सामने आया कि निरीक्षण और जांच में कोई अतिक्रमण नहीं पाया गया। यह भी स्वीकार किया गया कि किसानों को कोई असुविधा नहीं हो रही है और वे रास्ते का सुविधाजनक रूप से उपयोग कर रहे हैं।

PIL के दुरुपयोग पर कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला दिया

हाईकोर्ट ने State of Uttaranchal v. Balwant Singh Chaufal, 2010 AIR SCW 1029 का हवाला दिया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने PIL की पवित्रता बनाए रखने के लिए दिशा-निर्देश जारी किए थे।

हाईकोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने अदालतों को वास्तविक और bona fide PIL को प्रोत्साहित करने तथा बाहरी कारणों से दायर PIL को हतोत्साहित करने को कहा है। अदालतों को PIL स्वीकार करने से पहले याचिकाकर्ता की साख, याचिका की सामग्री की सत्यता, वास्तविक जनहित और किसी निजी लाभ, निजी उद्देश्य या परोक्ष मंशा की अनुपस्थिति की जांच करनी चाहिए।

हाईकोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट रूल्स के Chapter XXII के Rule 1(3-A) का भी उल्लेख किया। इस नियम के अनुसार, PIL दाखिल करने वाले व्यक्ति को अपने शपथपत्र में अपनी साख, वह किस सार्वजनिक कारण को आगे बढ़ा रहा है, मामले में उसका कोई निजी या व्यक्तिगत हित नहीं है, और मुकदमे के परिणाम से उसे या उससे जुड़े किसी व्यक्ति को कोई अनुचित लाभ नहीं होगा, यह स्पष्ट रूप से बताना होता है।

कोर्ट ने कहा कि यह नियम PIL याचिकाकर्ता के लिए अपनी साख का स्पष्ट खुलासा करना अनिवार्य बनाता है। यदि यह आवश्यकता पूरी नहीं होती है, तो हाईकोर्ट को यह देखना होगा कि कहीं न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग तो नहीं हो रहा।

‘PIL निजी हित का मुखौटा नहीं बन सकती’

हाईकोर्ट ने Janata Dal v. H.S. Chowdhary, (1992) 4 SCC 305 का हवाला देते हुए कहा कि PIL में केवल वही व्यक्ति अदालत आ सकता है जो bona fide हो और जिसके पास पर्याप्त जनहित हो। निजी लाभ, निजी मुनाफे, राजनीतिक उद्देश्य या किसी परोक्ष मंशा से दायर याचिका स्वीकार नहीं की जा सकती।

कोर्ट ने Dr. B. Singh v. Union of India and others, (2004) 3 SCC 363 का भी उल्लेख किया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अदालतों को निराधार PIL को छांटकर लागत के साथ खारिज करना चाहिए, ताकि यह संदेश जाए कि परोक्ष मंशा से दाखिल याचिकाओं को अदालतों की मंजूरी नहीं है।

हाईकोर्ट ने Buddhi Kota Subbarai (Dr.) v. K. Parasaran, (1996) 5 SCC 530 का उल्लेख करते हुए कहा कि न्याय तक आसान पहुंच का दुरुपयोग गलत या निराधार याचिकाएं दाखिल करने के लाइसेंस के रूप में नहीं किया जा सकता।

READ ALSO  हाईकोर्ट ने बंगाल सरकार को भाजपा विधायकों के खिलाफ कार्यवाही पर रोक के खिलाफ अपील करने की अनुमति दी

कोर्ट ने Prestige Lights Limited v. State Bank of India, (2007) 8 SCC 449 का भी हवाला दिया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि writ jurisdiction का इस्तेमाल करते समय अदालत याचिकाकर्ता के आचरण को ध्यान में रखती है। यदि कोई पक्ष पूरे तथ्य नहीं बताता, प्रासंगिक सामग्री छिपाता है या अदालत को गुमराह करता है, तो कोर्ट मामले के गुण-दोष में गए बिना याचिका खारिज कर सकती है।

हाईकोर्ट ने K.D. Sharma v. Steel Authority of India Limited and others, (2008) 12 SCC 481 का भी उल्लेख किया, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि कोई भी वादी अदालतों के साथ “आंख-मिचौली” नहीं खेल सकता या “चुनिंदा तथ्यों” का तरीका नहीं अपना सकता। उसे पूरे, सही और स्पष्ट तथ्यों के साथ अदालत के सामने आना चाहिए।

हाईकोर्ट ने PIL को न्यायिक प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग बताया

रिकॉर्ड और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों को देखते हुए हाईकोर्ट ने कहा:

“उपरोक्त चर्चा के मद्देनजर, हम संतुष्ट हैं कि वर्तमान याचिका कानून की प्रक्रिया का घोर दुरुपयोग है और लागत के साथ खारिज किए जाने योग्य है, ताकि यह उन बेईमान व्यक्तियों को रोकने के लिए एक निवारक उदाहरण बन सके जो PIL के मुखौटे में अपने निहित स्वार्थों के लिए writ jurisdiction का इस्तेमाल करना चाहते हैं।”

इसके साथ ही हाईकोर्ट ने याचिका को ₹25,000 लागत के साथ खारिज कर दिया।

कोर्ट ने याचिकाकर्ता को आदेश दिया कि वह आदेश की तारीख से तीन सप्ताह के भीतर यह राशि हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल के समक्ष जमा करे।

कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि याचिकाकर्ता लागत जमा नहीं करता है, तो प्रतिवादी संख्या 5 रजिस्ट्रार जनरल के समक्ष आवेदन कर सकता है। इसके बाद रजिस्ट्रार जनरल आदेश की प्रति और अपना पत्र कलेक्टर, मेरठ को भेजेंगे, ताकि याचिकाकर्ता से यह राशि भू-राजस्व के बकाये की तरह वसूल की जा सके।

अंत में कोर्ट ने याचिकाकर्ता को चेतावनी देते हुए कहा:

“चूंकि याचिकाकर्ता अधिवक्ता है और वह आपराधिक मामलों में भी शामिल रहा है, जिन आरोपों को हम इस आदेश में दर्ज नहीं करना चाहते, इसलिए हम उसे सुझाव देते हैं और चेतावनी भी देते हैं कि वह ऐसे कृत्यों में शामिल न हो, जिनसे इस कोर्ट को कठोर कार्रवाई करनी पड़े।”

केस डिटेल्स

केस टाइटल: रविंद्र अहलावत @ रविंद्र कुमार बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और 4 अन्य
केस नंबर: Public Interest Litigation (PIL) No. 331 of 2026
कोर्ट: इलाहाबाद हाईकोर्ट
पीठ: मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली और जस्टिस क्षितिज शैलेंद्र
आदेश दिनांक: 28 अप्रैल 2026
याचिकाकर्ता के वकील: शांतनु, राज कुमार धामा
प्रतिवादियों के वकील: दीप्तिमान सिंह, सीमा अग्रवाल, स्थायी अधिवक्ता

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles