बिना स्पष्ट अधिकार के जीपीए धारक को एससी/एसटी अत्याचार की शिकायत दर्ज करने का अधिकार नहीं: बॉम्बे हाईकोर्ट

बॉम्बे हाईकोर्ट की औरंगाबाद बेंच ने अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत दर्ज एक मामले में विशेष अदालत द्वारा जारी प्रक्रिया (process) को रद्द कर दिया है। न्यायमूर्ति वाई. जी. खोबरागड़े ने स्पष्ट किया कि यदि वास्तविक पीड़ित व्यक्ति स्वयं शिकायत दर्ज कराने के लिए आगे नहीं आता है, तो एक जनरल पावर ऑफ अटॉर्नी (जीपीए) धारक, जो स्वयं अनुसूचित जनजाति का सदस्य नहीं है, के पास ऐसी शिकायत दर्ज करने का कानूनी अधिकार (locus standi) नहीं है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह कानूनी विवाद लक्ष्मीनारायण छोटेलाल राठौड़ (प्रतिवादी नंबर 2) द्वारा दर्ज की गई एक शिकायत (क्रिमिनल एम.ए. नंबर 179/2024) से शुरू हुआ था। राठौड़ ने दावा किया था कि वह फकीरी किसान गंगावे के जीपीए धारक हैं, जो अनुसूचित जनजाति समुदाय से संबंधित हैं। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि आरोपियों (अपीलकर्ताओं) ने राजस्व अधिकारियों के साथ मिलकर ग्राम वालुज में गंगावे की 25 एकड़ और 25 गुंठा भूमि को अवैध रूप से हस्तांतरित करने की साजिश रची।

राठौड़ का आरोप था कि आरोपियों ने फर्जी सेल डीड तैयार की और महाराष्ट्र लैंड रेवेन्यू कोड (MLRC) की धारा 36 के तहत कलेक्टर की अनिवार्य अनुमति के बिना भूमि पर कब्जा कर लिया। इसके बाद, औरंगाबाद की विशेष अदालत (एससी और एसटी अधिनियम) ने 16 मई, 2025 को अपीलकर्ताओं के खिलाफ अधिनियम की धारा 3(1)(f) और 3(1)(g) के तहत मामला चलाने का आदेश दिया था।

पक्षों के तर्क

अपीलकर्ताओं ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए तर्क दिया कि शिकायतकर्ता स्वयं अनुसूचित जनजाति समुदाय से नहीं है। उन्होंने कहा कि जीपीए ने राठौड़ को आपराधिक कार्यवाही शुरू करने के लिए अधिकृत नहीं किया था और मूल मालिक, गंगावे ने कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई थी। इसके अलावा, उन्होंने सब-रजिस्ट्रार की एक रिपोर्ट का हवाला दिया जिसमें कहा गया था कि संबंधित भूमि “क्लास-1” भूमि थी और इसकी बिक्री के लिए कलेक्टर की अनुमति की आवश्यकता नहीं थी।

इसके विपरीत, प्रतिवादी नंबर 2 के वकील ने तर्क दिया कि आदिवासी व्यक्ति की भूमि को बिना पूर्व अनुमति के हस्तांतरित किया गया था, जो आदिवासी मालिक को सार्वजनिक रूप से डराने के इरादे से किया गया था। उन्होंने दावा किया कि आरोपियों ने जानबूझकर कानून का उल्लंघन किया, इसलिए धारा 3(1)(f) और 3(1)(g) के तहत अपराध बनता है।

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हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियाँ

हाईकोर्ट ने एससी/एसटी अधिनियम के संदर्भ में जीपीए धारक के कानूनी अधिकार की जांच की। न्यायमूर्ति खोबरागड़े ने पाया कि हालांकि मुखबिर ने जीपीए धारक होने का दावा किया, लेकिन पावर ऑफ अटॉर्नी से यह स्पष्ट नहीं हुआ कि उसे आदिवासी समुदाय के सदस्य की ओर से आपराधिक शिकायत दर्ज करने का अधिकार दिया गया था।

कानूनी प्रतिनिधित्व में इस्तेमाल होने वाली शब्दावली पर टिप्पणी करते हुए हाईकोर्ट ने कहा:

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“शब्दों ‘की ओर से’ (on behalf of) का अर्थ है कि एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति या समुदाय के प्रतिनिधि के रूप में कार्य कर रहा है। यह एक एजेंसी संबंध को दर्शाता है।”

हाईकोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि पीड़ित ने स्वयं शिकायत दर्ज नहीं कराई थी:

“हालांकि, अनुसूचित जनजाति के उक्त सदस्य ने शिकायत दर्ज कराने के लिए स्वयं पहल नहीं की। इसलिए, यह स्वयं शिकायत दर्ज करने के लिए वर्तमान प्रतिवादी नंबर 2 (शिकायतकर्ता) के अधिकार (locus) पर सवाल खड़ा करता है।”

इसके अलावा, हाईकोर्ट ने आरोपों के गुण-दोष पर भी विचार किया। जांच अधिकारी और सब-रजिस्ट्रार की रिपोर्ट का हवाला देते हुए हाईकोर्ट ने पाया कि अपीलकर्ता के नाम पर दर्ज भूमि राजस्व अभिलेखों ($7/12$ एक्सट्रैक्ट) में आदिवासी भूमि के रूप में दर्ज नहीं थी।

हाईकोर्ट ने कहा कि यदि MLRC की धारा 36 और 36A का कोई उल्लंघन हुआ है, तो राजस्व प्राधिकरण के रूप में कलेक्टर के पास उचित कार्यवाही शुरू करने की शक्ति है। हालांकि, शिकायतकर्ता यह दिखाने के लिए कोई ठोस सामग्री पेश नहीं कर सका कि भूमि का हस्तांतरण कानूनन प्रतिबंधित था।

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला:

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“इसलिए, मेरे विचार में, धारा 3(1)(f) और 3(1)(g) के तहत अपराध सिद्ध नहीं होता है। हालांकि, विद्वान ट्रायल कोर्ट ने कानून के प्रावधानों के साथ-साथ शिकायत की विषय-वस्तु की अनदेखी की और वह आदेश पारित किया जो कानून की दृष्टि में टिकने योग्य नहीं है।”

हाईकोर्ट का निर्णय

हाईकोर्ट ने अपील स्वीकार कर ली और विशेष न्यायाधीश, औरंगाबाद द्वारा 16 मई, 2025 को पारित आदेश को रद्द कर दिया। इसके साथ ही, उक्त शिकायत (क्रिमिनल एम.ए. नंबर 179/2024) को पूरी तरह से खारिज कर दिया गया।

केस विवरण:

केस शीर्षक: निजामुद्दीन मोहम्मद खान और अन्य बनाम महाराष्ट्र राज्य और अन्य

केस संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 872 ऑफ 2025

पीठ: न्यायमूर्ति वाई. जी. खोबरागड़े

दिनांक: 20 अप्रैल, 2026

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