कर्नाटक हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 311 के तहत गवाहों को दोबारा बुलाने की विवेकाधीन शक्ति का उपयोग केवल इसलिए नहीं किया जा सकता क्योंकि नए नियुक्त विशेष लोक अभियोजक (Special Public Prosecutor) साक्ष्यों पर अलग दृष्टिकोण रखते हैं। हाईकोर्ट ने एक आपराधिक याचिका को खारिज करते हुए कहा कि जांच अधिकारियों (IOs) को मुकदमे के अंतिम चरण में केवल उन्हें ‘होस्टाइल’ (पक्षद्रोही) घोषित करने के लिए वापस बुलाना, जबकि उन्होंने पहले ही चार्जशीट के अनुरूप गवाही दी है, आरोपियों के साथ गंभीर अन्याय होगा और यह कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला वर्ष 2010 में भद्रावती के पेपर टाउन पुलिस स्टेशन में आईपीसी की धाराओं 120B, 147 और 307 के तहत दर्ज किया गया था। चार्जशीट दाखिल होने और मुख्य साक्ष्यों की रिकॉर्डिंग पूरी होने के बाद, अभियोजन पक्ष ने 1 फरवरी 2025 को CrPC की धारा 311 के तहत दो आवेदन दायर किए।
पहला आवेदन पीड़िता (PW-2) को वीडियो सीडी के लिए धारा 65B का प्रमाण पत्र प्रस्तुत करने हेतु दोबारा बुलाने के लिए था। दूसरा आवेदन चार जांच अधिकारियों (PW-15, PW-17, PW-18 और PW-19) को दोबारा बुलाकर उनसे जिरह करने के लिए था ताकि उन्हें होस्टाइल सिद्ध किया जा सके। ये आवेदन नए विशेष लोक अभियोजक की नियुक्ति के बाद दिए गए थे। ट्रायल कोर्ट ने 29 मार्च 2025 को इन आवेदनों को खारिज कर दिया, जिसे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी।
पक्षों की दलीलें
याचिकाकर्ता (शिकायतकर्ता) की ओर से: याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि जांच के दौरान एक वीडियो सीडी प्राप्त हुई थी जिसमें पीड़िता का बयान था। अब चूंकि धारा 65B का प्रमाण पत्र तैयार है, इसलिए PW-2 को इसे रिकॉर्ड पर लाने के लिए बुलाना आवश्यक है। जांच अधिकारियों के संबंध में यह कहा गया कि नए अभियोजक के अनुसार उनकी गवाही अभियोजन पक्ष के दस्तावेजों के “विपरीत” थी, इसलिए सच्चाई सामने लाने के लिए उनसे जिरह करना जरूरी है।
प्रतिवादी (आरोपी) की ओर से: प्रतिवादियों ने तर्क दिया कि पीड़िता न तो उस वीडियो की लेखक थी और न ही उस उपकरण की कस्टोडियन, इसलिए वह धारा 65B प्रमाण पत्र देने के लिए अधिकृत नहीं है। जांच अधिकारियों के बारे में उन्होंने कहा कि गवाहों ने अपनी ही चार्जशीट का पालन किया है। उन्होंने जोर देकर कहा कि “केवल विशेष लोक अभियोजक के बदलने मात्र से गवाहों को दोबारा बुलाने का आधार नहीं बन जाता।”
हाईकोर्ट का विश्लेषण
जस्टिस एस. सुनील दत्त यादव ने इस बात का विश्लेषण किया कि क्या गवाहों को दोबारा बुलाना “मामले के उचित निर्णय के लिए आवश्यक” है।
पीड़िता (PW-2) को दोबारा बुलाने पर: कोर्ट ने गौर किया कि PW-2 की गवाही 2022 में ही समाप्त हो गई थी और आरोपियों के बयान (धारा 313) भी दर्ज हो चुके थे। वीडियो रिकॉर्ड करने वाले उपकरण या व्यक्ति के बारे में कोई विवरण नहीं दिया गया था। कोर्ट ने कहा:
“इस बारे में कोई विवरण उपलब्ध नहीं है कि रिकॉर्डिंग करने वाला उपकरण PW-2 के नियंत्रण में था या नहीं। इसके अलावा, आवेदन में वीडियो क्लिप की प्रासंगिकता के संबंध में कारण बताना भी आवश्यक है, जो कि नहीं बताया गया।”
जांच अधिकारियों को दोबारा बुलाने पर: हाईकोर्ट ने पाया कि अधिकारियों ने 14 साल पहले दाखिल की गई अपनी ‘फाइनल रिपोर्ट’ के अनुसार ही गवाही दी थी। अभियोजन पक्ष का उन्हें होस्टाइल घोषित करने का प्रयास चार्जशीट के विपरीत एक नई कहानी पेश करने की कोशिश थी।
कोर्ट ने कहा कि यह कदम पूरी तरह से नए वकील की रणनीति का हिस्सा था:
“इससे आरोपियों के हितों को गंभीर नुकसान होगा और इसकी अनुमति केवल इस कारण से नहीं दी जा सकती कि नवनियुक्त विशेष लोक अभियोजक ने मामले पर एक अलग दृष्टिकोण अपनाया है।”
कोर्ट ने यह भी नोट किया कि इससे पहले भी इन अधिकारियों से जिरह करने या उन्हें कोर्ट गवाह बनाने के अभियोजन के प्रयासों को ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट द्वारा खारिज किया जा चुका था।
निर्णय
हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि चूंकि अधिकारियों ने फाइनल रिपोर्ट के अनुरूप गवाही दी थी, इसलिए मुकदमे के अंतिम चरण में उन्हें होस्टाइल गवाह मानने का कोई कानूनी आधार नहीं है। 15 साल की देरी पर टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने कहा:
“इस समय कार्यवाही को लंबा खींचने का कोई भी प्रयास अदालत की प्रक्रिया का दुरुपयोग माना जाएगा।”
इन्हीं आधारों पर अदालत ने याचिका खारिज कर दी।
मामले का विवरण:
- मामले का शीर्षक: सी. महेशकुमार बनाम कर्नाटक राज्य व अन्य
- केस नंबर: क्रिमिनल पिटीशन नंबर 4788 ऑफ 2025
- पीठ: जस्टिस एस. सुनील दत्त यादव
- दिनांक: 16 अप्रैल, 2026

