9 साल की जेल के बाद बेल देने से इनकार पर सुप्रीम कोर्ट ने जताई नाराजगी; ‘त्वरित सुनवाई के अधिकार’ पर दिया जोर

सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले की कड़ी आलोचना की है, जिसमें 9 साल से जेल में बंद एक विचाराधीन कैदी (under-trial) की नियमित जमानत याचिका खारिज कर दी गई थी। कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश को “चौंकाने वाला” और “बेहद निराशाजनक” बताते हुए कहा कि यह संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्राप्त ‘त्वरित सुनवाई के अधिकार’ (Right to Speedy Trial) का सीधा उल्लंघन है।

कानूनी मुद्दा

इस मामले में मुख्य कानूनी सवाल यह था कि क्या किसी आरोपी को सुनवाई पूरी हुए बिना लगभग एक दशक तक अनिश्चितकालीन न्यायिक हिरासत में रखा जा सकता है। साथ ही, क्या हाईकोर्ट कानूनी नज़ीरों का गलत अर्थ निकालकर जमानत देने से मना कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश को रद्द करते हुए याचिकाकर्ता को तत्काल जमानत पर रिहा करने का निर्देश दिया।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता वैभव सिंह को 7 मार्च 2017 को गोरखपुर के थाना कैंट में दर्ज केस अपराध संख्या 116/2017 के सिलसिले में गिरफ्तार किया गया था। उन पर आईपीसी की धारा 147, 148, 149, 120-बी और 302 के तहत आरोप लगाए गए थे। जांच पूरी होने के बाद चार्जशीट दाखिल की गई और मामला सेशन ट्रायल (सत्र परीक्षण संख्या 331/2017) तक पहुंचा, जो वर्तमान में विशेष न्यायाधीश, ई.सी. एक्ट की अदालत में लंबित है।

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 28 जनवरी 2026 को याचिकाकर्ता की जमानत अर्जी खारिज कर दी थी, जिसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई।

इलाहाबाद हाईकोर्ट का तर्क

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश के पैरा 8 का विशेष रूप से संज्ञान लिया। हाईकोर्ट ने एक्स बनाम राजस्थान राज्य एवं अन्य (2024 INSC 909) के मामले का हवाला देते हुए टिप्पणी की थी:

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“सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि एक बार ट्रायल शुरू होने के बाद इसे अपने अंतिम निष्कर्ष तक पहुंचने दिया जाना चाहिए… आरोप तय (charge frame) होने के बाद सामान्यतः आरोपी को जमानत नहीं दी जानी चाहिए।”

सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणी

जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने हाईकोर्ट के इस दृष्टिकोण पर गहरी चिंता व्यक्त की। कोर्ट ने टिप्पणी की:

“आज सुबह हमारे सामने एक बहुत ही चौंकाने वाला मामला आया है जिसका आक्षेपित आदेश (impugned order) बेहद निराशाजनक है।”

पीठ ने स्पष्ट रूप से कहा कि हाईकोर्ट इस अदालत के पिछले फैसलों के सही अर्थ और अनुपात (ratio) को समझने में विफल रहा है। कोर्ट ने कहा:

“ऐसा प्रतीत होता है कि हाईकोर्ट इस अदालत के फैसले के वास्तविक अर्थ को नहीं समझ पाया है। हाईकोर्ट को केवल इस तथ्य पर विचार करना चाहिए था कि याचिकाकर्ता पिछले नौ वर्षों से विचाराधीन कैदी के रूप में जेल में सड़ रहा है।”

कोर्ट ने आगे कहा कि अपराध चाहे कितना भी गंभीर क्यों न हो, अनुच्छेद 21 के तहत त्वरित सुनवाई का अधिकार सर्वोपरि है। बेंच ने नोट किया:

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“हमने अपने कई फैसलों में बार-बार कहा है कि अपराध चाहे कितना भी गंभीर हो, यदि आरोपी को त्वरित सुनवाई के अधिकार से वंचित किया जाता है और वह बिना किसी गलती के सालों तक जेल में रहता है, तो उसे अनिश्चित काल तक जेल में नहीं रखा जा सकता।”

कोर्ट ने इसे मौलिक अधिकारों के हनन का एक “गंभीर मामला” (gross case) करार दिया।

अंतिम निर्णय

याचिकाकर्ता के अधिकारों का उल्लंघन मानते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने राज्य का पक्ष सुनने तक का इंतजार करना भी जरूरी नहीं समझा। कोर्ट ने निर्देश दिया:

  1. यदि याचिकाकर्ता किसी अन्य मामले में वांछित नहीं है, तो उसे तुरंत जमानत पर रिहा किया जाए।
  2. रिहाई की शर्तें ट्रायल कोर्ट द्वारा तय की जाएंगी।
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इसी के साथ विशेष अनुमति याचिका (SLP) और सभी लंबित आवेदनों का निपटारा कर दिया गया।

मामले का विवरण:

  • केस का शीर्षक: वैभव सिंह बनाम उत्तर प्रदेश राज्य
  • केस संख्या: स्पेशल लीव पिटीशन (क्रिमिनल) नंबर 7416/2026
  • पीठ: जस्टिस जे.बी. पारदीवाला, जस्टिस उज्ज्वल भुइयां
  • तारीख: 29 अप्रैल, 2026

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