सुप्रीम कोर्ट ने 2013 के एक अपहरण और हत्या के मामले में दो व्यक्तियों, आनंद जक्कप्पा पुजारी और महादेव सिदराम हुल्लोल्ली की सजा को रद्द कर दिया है। जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने कहा कि अभियोजन पक्ष संदेह से परे अपना मामला साबित करने में विफल रहा। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब “बरामदगी” (Discovery) के साक्ष्य भारतीय साक्ष्य अधिनियम की कानूनी आवश्यकताओं को पूरा नहीं करते हैं, तो केवल “अंतिम बार साथ देखे जाने” (Last Seen Together) की थ्योरी सजा का एकमात्र आधार नहीं हो सकती।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 25 मार्च, 2013 को शुरू हुआ था, जब बासनगौड़ा (PW-1) ने अपनी मां बेबक्का की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई थी। आरोप था कि बेबक्का के बड़े भाई कलप्पा (आरोपी संख्या 1) का उनके साथ ₹20 लाख के कर्ज और 30 ग्राम सोने को लेकर आर्थिक विवाद था। 27 मार्च, 2013 को मुल्लूर के जंगल में जले हुए कंकाल के अवशेष मिले। बाद में डीएनए प्रोफाइलिंग से पुष्टि हुई कि ये अवशेष मृतक बेबक्का के ही थे।
अभियोजन पक्ष का आरोप था कि कलप्पा ने अपीलकर्ताओं (आरोपी संख्या 2 और 4) और एक अन्य सह-आरोपी की मदद से बेबक्का का मारुति 800 कार में अपहरण किया, प्लास्टिक के तार से गला घोंटकर उनकी हत्या की और सबूत मिटाने के लिए पेट्रोल का उपयोग करके उनके शरीर को जला दिया। ट्रायल कोर्ट और कर्नाटक हाईकोर्ट ने पूर्व में आरोपियों को आईपीसी की धारा 302 (हत्या), 364 (अपहरण), 404 (संपत्ति का गबन) और 201 (सबूत नष्ट करना) के तहत दोषी ठहराया था।
पक्षों की दलीलें
अपीलकर्ताओं ने दलील दी कि उन्हें अपराध से जोड़ने के लिए कोई ठोस सबूत नहीं है। उन्होंने तर्क दिया कि भले ही कलप्पा का कोई मकसद रहा हो, लेकिन अपीलकर्ताओं की मृतक के साथ कोई व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं थी। उन्होंने हथियार और सोने के गहनों की “बरामदगी” को भी चुनौती देते हुए कहा कि ये कलप्पा के कहने पर बरामद किए गए थे न कि अपीलकर्ताओं के। इसके अलावा, गवाह PW-7 द्वारा पहचान के लिए ‘टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड’ (TIP) न कराए जाने पर भी सवाल उठाए गए।
कर्नाटक राज्य की ओर से पेश अतिरिक्त महाधिवक्ता ने तर्क दिया कि परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की कड़ी पूरी थी। राज्य ने PW-7 की “लास्ट सीन” गवाही पर भरोसा किया, जिसने कथित तौर पर अपीलकर्ताओं को मृतक और कलप्पा के साथ कार में बैठते देखा था। राज्य ने उस स्थान की “संयुक्त बरामदगी” का भी हवाला दिया जहां हत्या की गई थी और जहां शव जलाया गया था।
कोर्ट का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने निचली अदालतों द्वारा भरोसा की गई दो प्रमुख परिस्थितियों — “लास्ट सीन टुगेदर” थ्योरी और साक्ष्य अधिनियम की धारा 27 के तहत “तथ्यों की बरामदगी” — की गहन समीक्षा की।
1. ‘लास्ट सीन टुगेदर’ पर टिप्पणी
कोर्ट ने संज्ञान लिया कि PW-7 ने घटना के दिन शाम करीब 5:30 बजे रन्ना सर्कल पर अपीलकर्ताओं को कार में सवार होते देखने का दावा किया था। हालांकि, पीठ ने कहा:
“अंतिम बार साथ देखे जाने की परिस्थिति अपने आप में अनिवार्य रूप से इस निष्कर्ष की ओर नहीं ले जाती कि आरोपी ने ही अपराध किया है। आरोपी और अपराध के बीच संबंध स्थापित करने के लिए कुछ और साक्ष्य होने चाहिए।”
पीठ ने जोर दिया कि हत्या जैसे गंभीर मामले में सजा की पुष्टि के लिए केवल इस परिस्थिति पर भरोसा करना “अत्यधिक जोखिम भरा” होगा।
2. बरामदगी और साक्ष्य अधिनियम की धारा 27
अदालत ने बरामदगी दर्ज करने के तरीके में गंभीर प्रक्रियात्मक कमियां पाईं। कोर्ट ने गौर किया कि जांच अधिकारी ने “इकबालिया बयान” दर्ज किए थे जो साक्ष्य अधिनियम की धारा 25 के दायरे में आते हैं। “संयुक्त बरामदगी” (Joint Discovery) पंचनामे के संबंध में कोर्ट ने पाया कि मुख्य रूप से आरोपी संख्या 1 (कलप्पा) ही पुलिस को उन स्थानों पर ले गया था।
नवजोत संधू (2005) मामले का हवाला देते हुए कोर्ट ने एक साथ किए गए खुलासों पर स्थिति स्पष्ट की:
“संयुक्त या एक साथ किया गया खुलासा एक कल्पना (myth) है, क्योंकि दो या दो से अधिक आरोपी एक साथ कोरस में जानकारीपूर्ण शब्द नहीं बोल सकते… दो आरोपियों द्वारा दी गई जानकारी के संबंध में दी गई गवाही विश्वसनीयता और बरामदगी के साथ इसके संबंध के दृष्टिकोण से आलोचना के घेरे में आ सकती है।”
अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष अपीलकर्ताओं के लिए “छिपाने के उत्तरदायित्व” (authorship of concealment) को साबित करने में विफल रहा। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पंचनामे की सामग्री स्वतंत्र साक्ष्य नहीं होती; बल्कि गवाह अदालत में क्या बयान देते हैं, वही महत्वपूर्ण है। इस मामले में, पंच गवाह (PW-4) ने अपीलकर्ताओं द्वारा बोले गए सटीक शब्दों का उल्लेख नहीं किया था।
निष्कर्ष और निर्णय
कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि दोषपूर्ण बरामदगी साक्ष्यों को हटाने के बाद, केवल “लास्ट सीन” की परिस्थिति बचती है, जो संदेह से परे अपराध साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है।
सबूत के मानक पर टिप्पणी करते हुए कोर्ट ने स्थापित कानूनी सिद्धांत को उद्धृत किया:
“अभियोजन का मामला ‘सच्चा हो सकता है’ (may be true), लेकिन यह ‘सच्चा होना ही चाहिए’ (must be true) की श्रेणी में नहीं आता है, और ‘हो सकता है’ एवं ‘होना ही चाहिए’ के बीच का सफर बहुत लंबा है।”
सुप्रीम कोर्ट ने अपीलों को स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया और अपीलकर्ताओं को सभी आरोपों से बरी कर दिया। उन्हें तत्काल रिहा करने का आदेश दिया गया है।
मामले का विवरण:
- मामले का शीर्षक: आनंद जक्कप्पा पुजारी @गद्दादर बनाम कर्नाटक राज्य (संबद्ध अपील के साथ)
- केस संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 1864, 2024
- पीठ: जस्टिस जे.बी. पारदीवाला, जस्टिस के.वी. विश्वनाथन
- दिनांक: 27 अप्रैल, 2026

