पति का नैतिक और कानूनी दायित्व सर्वोपरि, व्यापार में घाटा भरण-पोषण से बचने का आधार नहीं: गुजरात हाईकोर्ट

गुजरात हाईकोर्ट ने एक पति द्वारा भरण-पोषण (maintenance) के आदेश को चुनौती देने वाली आपराधिक पुनरीक्षण याचिका (criminal revision application) को खारिज कर दिया है। हाईकोर्ट ने जोर देकर कहा कि एक “हृष्ट-पुष्ट” (able-bodied) पति कानूनी और नैतिक रूप से अपनी पत्नी का साथ देने के लिए बाध्य है, खासकर तब जब वह कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जूझ रही हो। कोर्ट ने फैमिली कोर्ट द्वारा निर्धारित 50,000 रुपये प्रति माह के भुगतान के निर्देश को बरकरार रखते हुए कहा कि आय में कमी या व्यवसाय बंद होना पति को दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 125 के तहत उसके ‘पवित्र कर्तव्य’ से मुक्त नहीं करता है।

मामले की पृष्ठभूमि

आवेदक (पति) और प्रतिवादी नंबर 2 (पत्नी) का विवाह जून 1995 में हुआ था। पत्नी ने मार्च 2019 में धारा 125 CrPC के तहत भरण-पोषण के लिए आवेदन किया, जिसमें मानसिक और शारीरिक शोषण और दैनिक खर्चों के लिए नियमित वित्तीय सहायता की कमी का आरोप लगाया गया। पत्नी का तर्क था कि पति कैनन (Canon) का एक सफल डिस्ट्रीब्यूटर होने और कई संपत्तियों का मालिक होने के बावजूद उसकी अनदेखी कर रहा है। कानूनी कार्यवाही के दौरान, पत्नी को कैंसर होने का पता चला, जिसके कारण भारी चिकित्सा खर्च की आवश्यकता थी।

फैमिली कोर्ट, आणंद ने 10 दिसंबर, 2021 को पति को आवेदन की तारीख से 50,000 रुपये प्रति माह भुगतान करने का निर्देश दिया था। पति ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए तर्क दिया कि यह राशि “अत्यधिक” है और कोविड-19 के बाद उसके व्यवसाय को भारी नुकसान हुआ है।

पक्षों के तर्क

आवेदक-पति की ओर से पेश वकील आशीष एम. डगली ने दलील दी कि फैमिली कोर्ट का आदेश “धारणाओं और अनुमानों” पर आधारित था। उन्होंने तर्क दिया कि आवेदन दाखिल करने के समय पत्नी उनके साथ रह रही थी और वह पहले से ही अपने बेटे के शैक्षिक खर्चों को वहन कर रहे हैं, जो विदेश में पढ़ रहा है। उन्होंने आगे कहा कि उनके आयकर रिटर्न (ITR) में वार्षिक आय केवल लगभग 2.12 लाख से 2.23 लाख रुपये दिखाई गई है और उनकी डिस्ट्रीब्यूटरशिप बंद हो चुकी है।

दूसरी ओर, पत्नी की ओर से पेश वकील दर्शित ब्रह्मभट्ट ने पति के “अड़ियल रवैये” की ओर इशारा किया। उन्होंने बताया कि पति एक शानदार जीवन जी रहा था और अक्सर दुबई, जापान, ऑस्ट्रेलिया और बैंकॉक की यात्रा करता था। उन्होंने तर्क दिया कि पति ‘ऋतुम एंटरप्राइज’ (Rutumn Enterprise) का मालिक है जिसका टर्नओवर करोड़ों में है और उसने जानबूझकर अपनी आय को कम दिखाने के लिए आयकर दस्तावेजों (विशेष रूप से लाभ और हानि खातों) को छुपाया। उन्होंने यह भी बताया कि पति को पत्नी के इलाज के लिए मेडिकल इंश्योरेंस क्लेम प्राप्त हुआ था, लेकिन उसने वह राशि पत्नी को नहीं दी।

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कोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियाँ

मामले की सुनवाई कर रहे जस्टिस हसमुख डी. सुथार ने पाया कि पति-पत्नी का रिश्ता और पत्नी की बीमारी निर्विवाद है। कोर्ट ने गौर किया कि पति यह साबित करने के लिए कोई सबूत पेश नहीं कर सका कि उसका व्यवसाय वास्तव में बंद हो गया है या उसकी कमाई की क्षमता खत्म हो गई है।

कम आय दिखाने के लिए आयकर रिटर्न (ITR) पर पति की निर्भरता के संबंध में, कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के किरण तोमर बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले का हवाला देते हुए कहा:

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“आयकर रिटर्न जरूरी नहीं कि वास्तविक आय का सटीक विवरण प्रदान करें… विशेष रूप से तब जब पक्ष वैवाहिक संघर्ष में लगे हों और भरण-पोषण के दायित्व से बचने के लिए आय को कम दिखाने की प्रवृत्ति होती है।”

कोर्ट ने अंजू गर्ग बनाम दीपक कुमार गर्ग मामले का संदर्भ देते हुए “हृष्ट-पुष्ट” (able-bodied) सिद्धांत लागू किया:

“पत्नी को वित्तीय सहायता प्रदान करना पति का पवित्र कर्तव्य है… यदि पति हृष्ट-पुष्ट है, तो उसे शारीरिक श्रम करके भी पैसा कमाना चाहिए और वह अपने इस दायित्व से बच नहीं सकता।”

कोर्ट ने पत्नी की शैक्षणिक योग्यता (B.Sc. होम साइंस और फैशन डिजाइनिंग) पर भी टिप्पणी की और कहा कि “कमाने में सक्षम होना” भरण-पोषण से इनकार करने का आधार नहीं है। चतुर्भुज बनाम सीता बाई मामले का जिक्र करते हुए कोर्ट ने कहा कि परीक्षण यह है कि क्या पत्नी उसी जीवन स्तर को बनाए रख सकती है जिसकी वह अपने ससुराल में आदी थी।

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जस्टिस सुथार ने पति के आचरण पर कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि उसने भरण-पोषण देने के बजाय अन्य कार्यवाहियों के सिलसिले में जेल जाना पसंद किया। कोर्ट ने जोर दिया कि “बढ़ती मुद्रास्फीति और जीवन निर्वाह की उच्च लागत” के साथ-साथ पत्नी की “कैंसर की बीमारी” को देखते हुए 50,000 रुपये का पुरस्कार “न्यायसंगत और उचित” है।

फैसला

फैमिली कोर्ट के फैसले में कोई भी दोष या अवैधता न पाते हुए, हाईकोर्ट ने अपने पुनरीक्षण क्षेत्राधिकार का उपयोग करते हुए आदेश की पुष्टि की।

“फैमिली कोर्ट ने भरण-पोषण का आदेश देते समय सुव्यवस्थित कारण बताए हैं… और ऐसे निष्कर्ष साक्ष्यों पर आधारित हैं… इस कोर्ट द्वारा पुनरीक्षण क्षेत्राधिकार के प्रयोग में किसी हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।”

हाईकोर्ट ने आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को खारिज कर दिया और सभी अंतरिम रोक हटाते हुए पति को भरण-पोषण आदेश का पालन करने का निर्देश दिया।

केस विवरण :

  • केस का शीर्षक: वसंतभाई प्रेमजीभाई वेकारिया बनाम गुजरात राज्य एवं अन्य
  • केस संख्या: R/Criminal Revision Application No. 175 of 2022
  • पीठ: जस्टिस हसमुख डी. सुथार
  • दिनांक: 24 अप्रैल, 2026

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