महिला वकील पर जानलेवा हमले का सुप्रीम कोर्ट ने लिया स्वत: संज्ञान; अस्पतालों द्वारा इलाज से इनकार पर जांच के आदेश

सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में एक महिला वकील पर उनके पति द्वारा किए गए क्रूर हमले के मामले में स्वत: संज्ञान (Suo Motu) लिया है। भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस जोयमाल्या बागची की पीठ ने इस हमले की उच्च स्तरीय जांच के निर्देश दिए हैं। इसके साथ ही, कोर्ट ने उन अस्पतालों की भूमिका की भी जांच करने को कहा है जिन्होंने गंभीर रूप से घायल पीड़िता को आपातकालीन उपचार देने से कथित तौर पर मना कर दिया था।

मामले की पृष्ठभूमि

यह घटना रविवार रात की है, जब दिल्ली में प्रैक्टिस करने वाली एक महिला वकील पर उनके पति के कार्यालय में तलवार से हमला किया गया। इस हमले में पीड़िता के महत्वपूर्ण अंगों पर गंभीर चोटें आईं और उनकी स्थिति बेहद नाजुक हो गई। सुनवाई के दौरान यह आरोप लगाया गया कि हमले के बाद पीड़िता ने पीसीआर कॉल की और मदद मांगी, लेकिन जीटीबी, आरके और कैलाश अस्पतालों ने उन्हें भर्ती करने से इनकार कर दिया। अंततः उन्हें एम्स (AIIMS) ट्रॉमा सेंटर में उपचार मिल सका।

मुख्य न्यायाधीश ने बताया कि रविवार को इस घटना के संबंध में एक पत्र मिलने के बाद उन्होंने तुरंत स्वत: संज्ञान लिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह मामला न केवल एक आपराधिक हमला है, बल्कि आपातकालीन चिकित्सा सेवा में हुई लापरवाही का भी एक गंभीर उदाहरण है।

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कोर्ट की टिप्पणियां और दलीलें

पीड़िता की ओर से पेश वकील ने कोर्ट को हमले की भयावहता के बारे में बताया। उन्होंने कहा कि गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद महिला वकील ने किसी तरह आपातकालीन कॉल की, लेकिन कई अस्पतालों ने उन्हें जीवन रक्षक उपचार प्रदान करने में संवेदनशीलता नहीं दिखाई।

अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (एएसजी) ऐश्वर्या भाटी ने पीठ को सूचित किया कि आरोपी पति को गिरफ्तार कर लिया गया है और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 109(1) के तहत प्राथमिकी (FIR) दर्ज की गई है। पीड़िता को अब एम्स से एक निजी अस्पताल में स्थानांतरित कर दिया गया है जहाँ उनका उपचार जारी है।

पीठ ने पीड़िता की चोटों की प्रकृति पर गहरी चिंता व्यक्त की और सवाल किया कि प्रारंभिक अस्पतालों ने आपातकालीन उपचार देने से क्यों मना किया। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि मुख्य आरोपी हिरासत में है, लेकिन परिवार के अन्य सदस्य, जिन पर आरोप लगाए गए हैं, वे अभी फरार हैं।

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने पीड़िता को न्याय और सहायता सुनिश्चित करने के लिए कई अंतरिम निर्देश जारी किए हैं:

  1. वरिष्ठ स्तरीय जांच: दिल्ली पुलिस कमिश्नर को इस मामले की जांच के लिए एक वरिष्ठ अधिकारी नियुक्त करने का निर्देश दिया गया है। कोर्ट ने प्राथमिकता दी है कि यह जांच पुलिस अधीक्षक (SP) या डिप्टी SP रैंक की किसी महिला अधिकारी द्वारा की जाए।
  2. अस्पतालों की जवाबदेही: जीटीबी, आरके और कैलाश अस्पतालों द्वारा आपात स्थिति में पीड़िता को भर्ती न करने के मामले में औपचारिक जांच के आदेश दिए गए हैं।
  3. वित्तीय सहायता: कोर्ट ने राष्ट्रीय कानूनी सेवा प्राधिकरण (NALSA) को निर्देश दिया है कि वह पीड़िता के चिकित्सा खर्चों और उनकी तीन नाबालिग बेटियों की देखभाल के लिए तुरंत वित्तीय सहायता प्रदान करे।
  4. बच्चों का संरक्षण: घटना के बाद पिता द्वारा बच्चों को छोड़ दिए जाने का संज्ञान लेते हुए कोर्ट ने निर्देश दिया कि बच्चों की कस्टडी फिलहाल उनके नाना-नानी के पास रहेगी।
  5. स्टेटस रिपोर्ट: पुलिस को अगली सुनवाई तक जांच की प्रगति और फरार रिश्तेदारों का पता लगाने के प्रयासों पर एक विस्तृत स्टेटस रिपोर्ट पेश करनी होगी।

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