सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि अग्रिम जमानत याचिका खारिज करने के बाद हाईकोर्ट के पास यह निर्देश देने का अधिकार नहीं है कि याचिकाकर्ता निचली अदालत के सामने आत्मसमर्पण (सरेंडर) करे और नियमित जमानत मांगे। जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस उज्जल भुयान की पीठ ने कहा कि इस तरह के निर्देश “पूरी तरह से क्षेत्राधिकार के बिना” (wholly without jurisdiction) हैं। अदालत ने बिहार और झारखंड राज्यों में निजी शिकायतों के मामलों में अग्रिम जमानत के निपटारे के तरीके पर “गंभीर समस्या” होने की बात कही।
मामले की पृष्ठभूमि
याचिकाकर्ता ओम प्रकाश छावनिका ने झारखंड हाईकोर्ट के 4 जुलाई, 2025 के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने भूमि विवाद से संबंधित एक निजी शिकायत मामले में याचिकाकर्ता की अग्रिम जमानत याचिका खारिज कर दी थी। याचिकाकर्ता पर भारतीय दंड संहिता, 1860 की धारा 323, 420, 467, 468, 471 और 120B/34 के तहत आरोप लगाए गए थे। हाईकोर्ट ने याचिका को इस आधार पर खारिज किया था कि पहली याचिका (A.B.A. No. 8063 of 2022) के निपटारे के बाद से कोई नया आधार नहीं मिला है।
हाईकोर्ट का पिछला आदेश और कानूनी मुद्दा
हाईकोर्ट ने अपने पहले के आदेश में याचिकाकर्ता को निर्देश दिया था कि वह “निचली अदालत के सामने सरेंडर करे और नियमित जमानत मांगे।” अदालत ने यह भी कहा था कि इस आवेदन पर सतिंदर कुमार अंतिल बनाम केंद्रीय जांच ब्यूरो (2021) मामले में निर्धारित दिशानिर्देशों के अनुसार विचार किया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने इसी सरेंडर के निर्देश की वैधता पर सवाल उठाए।
सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के निर्देशों की प्रक्रियात्मक शुद्धता पर ध्यान केंद्रित करते हुए दो प्रमुख कानूनी बिंदुओं पर चर्चा की:
1. निजी शिकायतों में पुलिस की गिरफ्तारी की शक्ति पीठ ने सवाल किया कि निजी शिकायत वाले मामलों में, जहाँ अदालत पहले ही समन जारी कर चुकी है, अग्रिम जमानत याचिकाएं क्यों दायर की जा रही हैं। दंड प्रक्रिया संहिता (Cr.PC) की धारा 87 का उल्लेख करते हुए अदालत ने कहा:
“एक बार जब अदालत संज्ञान ले लेती है और समन जारी कर देती है, तो आरोपी को केवल उस अदालत के सामने पेश होना और कार्यवाही में शामिल होना होता है… जब तक उस अदालत द्वारा समन के साथ गैर-जमानती वारंट जारी न किया गया हो, तब तक पुलिस के पास निजी शिकायत मामले में आरोपी को गिरफ्तार करने की कोई शक्ति नहीं है।”
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि धारा 202 के तहत मजिस्ट्रेट जांच के दौरान भी पुलिस आरोपी को गिरफ्तार नहीं कर सकती।
2. सरेंडर के निर्देश पर क्षेत्राधिकार हाईकोर्ट द्वारा आरोपी को सरेंडर करने के आदेश पर कड़ी आपत्ति जताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा:
“हम हाईकोर्ट को याद दिलाते हैं कि याचिकाकर्ता को अदालत के सामने सरेंडर करने और नियमित जमानत मांगने का निर्देश देना पूरी तरह से क्षेत्राधिकार के बिना था। यदि अदालत अग्रिम जमानत खारिज करना चाहती है, तो वह ऐसा कर सकती है, लेकिन अदालत के पास यह कहने का अधिकार नहीं है कि याचिकाकर्ता को अब सरेंडर करना चाहिए।”
सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी की कि ऐसी अनावश्यक प्रक्रियाओं के कारण मुकदमेबाजों को प्रक्रियात्मक गलतफहमियों की वजह से देश की सर्वोच्च अदालत तक यात्रा करनी पड़ती है।
अदालत का निर्णय
चूंकि मामले में ट्रायल जारी है, इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि इस विशिष्ट मामले में आगे किसी हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है। हालांकि, भविष्य में प्रक्रियात्मक सुधार सुनिश्चित करने के लिए निम्नलिखित निर्देश दिए गए:
- रजिस्ट्री को इस आदेश की एक प्रति बिहार और झारखंड हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को भेजने का निर्देश दिया गया।
- संबंधित हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीशों के समक्ष इस आदेश को रखने का निर्देश दिया गया।
- राज्य के वकील को इस मुद्दे पर गौर करने और राज्य को तदनुसार निर्देशित करने के लिए कहा गया।
सुप्रीम कोर्ट ने इन्हीं टिप्पणियों के साथ विशेष अनुमति याचिका (SLP) का निपटारा कर दिया।
मामले का विवरण:
मामले का शीर्षक: ओम प्रकाश छावनिका @ ओम प्रकाश छाबनीका @ ओम प्रकाश छावनीका बनाम झारखंड राज्य एवं अन्य
केस संख्या: SLP(Crl.) No.16221/2025
पीठ: जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस उज्जल भुयान
दिनांक: 23-04-2026

