बिना न्यायिक विवेक के प्रिंटेड प्रोफार्मा पर सम्मन जारी करना अवैध: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने SC/ST एक्ट की कार्यवाही रद्द की

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कन्नौज के विशेष न्यायाधीश (SC/ST एक्ट) द्वारा जारी एक सम्मन आदेश को रद्द कर दिया है। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि यह आदेश बिना न्यायिक विवेक (Judicial Mind) का प्रयोग किए, यांत्रिक तरीके से एक प्रिंटेड प्रोफार्मा पर पारित किया गया था। जस्टिस मदन पाल सिंह ने अपील स्वीकार करते हुए इस बात पर जोर दिया कि किसी आरोपी को सम्मन करना एक “गंभीर मामला” है और न्यायिक आदेशों में तथ्यों एवं कानून दोनों का प्रतिबिंब दिखना चाहिए।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की धारा 14A(1) के तहत दायर एक आपराधिक अपील से जुड़ा है। अपीलकर्ता राजा उर्फ मोहम्मद आलम और एक अन्य ने 22 मई, 2022 की चार्जशीट और 23 नवंबर, 2022 के संज्ञान/सम्मन आदेश को चुनौती दी थी। यह कार्यवाही कन्नौज की विशेष अदालत में लंबित सत्र मामला संख्या 963/2022 (राज्य बनाम राजा व अन्य) से संबंधित थी, जिसमें आईपीसी की धारा 323, 504, 506 और SC/ST एक्ट की धारा 3(1)(da) के तहत आरोप लगाए गए थे।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ताओं के वकील श्री सर्वेश कुमार दुबे ने तर्क दिया कि विशेष न्यायाधीश ने आदेश पारित करते समय न्यायिक विवेक का उपयोग नहीं किया, क्योंकि आदेश एक “प्रिंटेड प्रोफार्मा” पर तैयार किया गया था। इस प्रोफार्मा में आरोपी के नाम, केस क्राइम नंबर और धाराओं जैसे विवरण केवल हाथ से भरे गए थे। वकील ने अंकित बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य (JIC 2010 (1) 432) के मामले में इस हाईकोर्ट द्वारा दिए गए फैसले का हवाला देते हुए कहा कि ऐसे आदेश कानूनन टिकने योग्य नहीं हैं और इन्हें केवल इसी आधार पर रद्द किया जाना चाहिए।

राज्य की ओर से पेश अपर सरकारी अधिवक्ता (A.G.A.) ने प्रार्थना का विरोध तो किया, लेकिन यह स्वीकार किया कि विवादित आदेश वास्तव में एक प्रिंटेड प्रोफार्मा पर ही पारित किया गया था।

हाईकोर्ट का विश्लेषण और महत्वपूर्ण टिप्पणियां

सम्मन आदेश की प्रमाणित प्रति का अवलोकन करने के बाद, हाईकोर्ट ने पाया कि यह एक “टाइप्ड प्रोफार्मा था जिसमें रिक्त स्थान (blanks) विशेष न्यायाधीश द्वारा हाथ से भरे गए थे।” हाईकोर्ट ने कहा कि इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि आदेश यांत्रिक तरीके से पारित किया गया।

READ ALSO  बॉम्बे हाईकोर्ट ने मंत्री कोकाटे की सजा पर रोक हटाने से किया इनकार

हाईकोर्ट ने अंकित बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के फैसले का विस्तार से उल्लेख किया, जिसमें रिक्त स्थान भरने वाले न्यायिक आदेशों की कड़ी आलोचना की गई थी। हाईकोर्ट ने दोहराया:

“न्यायिक आदेश पारित करने का यह तरीका पूरी तरह से अवैध है। यदि तर्क के लिए यह मान भी लिया जाए कि प्रिंटेड प्रोफार्मा पर रिक्त स्थान स्वयं विद्वान मजिस्ट्रेट की लिखावट में भरे गए थे, तब भी विवादित आदेश अवैध और अमान्य होगा, क्योंकि संज्ञान लेने का आदेश या कोई अन्य न्यायिक आदेश प्रिंटेड प्रोफार्मा पर रिक्त स्थान भरकर पारित नहीं किया जा सकता।”

हाईकोर्ट ने आगे स्पष्ट किया कि हालांकि संज्ञान लेने के चरण में विस्तृत और सकारण आदेश अनिवार्य नहीं है, लेकिन फिर भी अदालत को अपने न्यायिक विवेक का प्रयोग करना आवश्यक है। हाईकोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि इस संबंध में हाईकोर्ट द्वारा पहले ही सर्कुलर लेटर संख्या 28/Admin. ‘G-II’ (2021) और सर्कुलर संख्या 8159/Admin. G-II (2025) जारी किए जा चुके हैं, जो “प्री-प्रिंटेड रबर स्टैम्प” या “प्री-टाइप्ड प्रोफार्मा” के उपयोग को स्पष्ट रूप से प्रतिबंधित करते हैं।

न्यायाधीश ने अपनी नाराजगी व्यक्त करते हुए कहा:

READ ALSO  सुप्रीम कोर्ट ने स्पाइसजेट-मारन मध्यस्थता मामले में दिल्ली हाईकोर्ट के जज के व्यवहार की आलोचना की

“सुप्रीम कोर्ट और इस हाईकोर्ट द्वारा प्रिंटेड प्रोफार्मा पर आदेश पारित करने की प्रथा को अस्वीकार करने वाले कई फैसलों के बावजूद, यह नोट करना दुखद और दुर्भाग्यपूर्ण है कि वर्तमान मामले में अपीलकर्ता को ऐसे आदेश द्वारा सम्मन किया गया है… बिना न्यायिक विवेक लगाए रिक्त स्थान भरकर प्रिंटेड प्रोफार्मा पर आदेश पारित करने वाले संबंधित न्यायिक अधिकारियों का आचरण आपत्तिजनक है और इसकी निंदा की जानी चाहिए।”

हाईकोर्ट का निर्णय

हाईकोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए 23 नवंबर, 2022 के संज्ञान/सम्मन आदेश को रद्द कर दिया। संबंधित अदालत को निर्देश दिया गया है कि वह मामले के तथ्यों पर न्यायिक विवेक का प्रयोग करते हुए एक “नया और सकारण आदेश” पारित करे।

READ ALSO  दिल्ली हाईकोर्ट ने न्यायपालिका को बदनाम करने और जजों पर पूर्व नियोजित आदेश पारित करने का आरोप लगाने वाले व्यक्ति को अवमानना का दोषी ठहराया

केस विवरण:

  • केस टाइटल: राजा उर्फ मोहम्मद आलम व अन्य बनाम उत्तर प्रदेश राज्य व अन्य
  • केस नंबर: क्रिमिनल अपील संख्या 8514/2024
  • पीठ: जस्टिस मदन पाल सिंह
  • दिनांक: 24 अप्रैल, 2026

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles