सरकारी ग्रांट के तहत आने वाली संपत्तियों पर दिल्ली किराया नियंत्रण अधिनियम लागू नहीं होगा: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सरकारी ग्रांट (Government Grant) के माध्यम से मिले पट्टे के तहत सरकार के कब्जे वाली संपत्तियां पूरी तरह से ग्रांट की शर्तों से संचालित होती हैं। कोर्ट ने कहा कि ऐसी संपत्तियों पर दिल्ली किराया नियंत्रण अधिनियम, 1958 (DRC Act) के प्रावधान लागू नहीं होते हैं।

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा की पीठ ने सर सोभा सिंह एंड संस प्राइवेट लिमिटेड के पक्ष में आए दिल्ली हाईकोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें सुजान सिंह पार्क, नई दिल्ली स्थित आवासीय फ्लैटों से केंद्र सरकार को बेदखल करने के आदेश की पुष्टि की गई थी।

कानूनी मुद्दा

इस मामले में मुख्य विवाद यह था कि क्या सुजान सिंह पार्क में केंद्र सरकार का कब्जा सरकारी ग्रांट अधिनियम, 1895 (GG Act) के तहत पट्टे की शर्तों से संचालित है, या यह एक सामान्य मकान मालिक-किरायेदार का रिश्ता है। प्रतिवादी (मकान मालिक) का तर्क था कि किराया न चुकाने के कारण सरकार को दिल्ली किराया नियंत्रण अधिनियम की धारा 14(1)(a) के तहत बेदखल किया जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि सरकारी ग्रांट से जुड़ी संपत्तियों पर किराया नियंत्रण कानून लागू नहीं होता है। इसके साथ ही कोर्ट ने बेदखली के आदेश को रद्द कर दिया और कहा कि प्रतिवादी केवल कानून के अनुसार किराया वसूली के लिए कार्रवाई कर सकता है।

मामले की पृष्ठभूमि

विवाद की जड़ 26 अप्रैल, 1945 को गवर्नर जनरल इन काउंसिल द्वारा सरदार बहादुर सर सोभा सिंह एंड संस प्राइवेट लिमिटेड के पक्ष में निष्पादित एक ‘परपेचुअल लीज डीड’ (Perpetual Lease Deed) है। यह लीज सुजान सिंह पार्क में 7.58 एकड़ भूमि पर आवासीय फ्लैटों के निर्माण के लिए दी गई थी। आजादी के बाद, केंद्र सरकार मूल पट्टादाता (Lessor) के स्थान पर आ गई।

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सरकार ने अधिकारियों के आवास के लिए कई फ्लैटों पर कब्जा किया हुआ था। प्रतिवादी का दावा था कि सरकार 2,400 रुपये प्रति फ्लैट की दर से किराया देने वाली एक किरायेदार है। 1989 से 1991 के बीच किराए के भुगतान में चूक का आरोप लगाते हुए प्रतिवादी ने बेदखली की याचिका दायर की थी। निचली अदालतों (ARC और RCT) ने इसे किरायेदारी का मामला मानते हुए बेदखली का आदेश दिया था, जिसे 2020 में हाईकोर्ट ने भी बरकरार रखा था।

पक्षों के तर्क

अपीलकर्ता (भारत सरकार): अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) श्री के.एम. नटराज ने तर्क दिया कि सरकारी ग्रांट अधिनियम की धारा 2 और 3 के अनुसार, ऐसी ग्रांट अपनी शर्तों (Tenor) के अनुसार ही प्रभावी होती हैं, चाहे कोई अन्य कानून इसके विपरीत कुछ भी कहता हो। उन्होंने यह भी कहा कि DRC अधिनियम की धारा 3 स्पष्ट रूप से सरकारी संपत्तियों को इसके दायरे से बाहर रखती है।

प्रतिवादी (सर सोभा सिंह एंड संस): वरिष्ठ अधिवक्ता श्री पी.एस. पटवालिया ने दलील दी कि सरकारी ग्रांट अधिनियम का उद्देश्य केवल संपत्ति हस्तांतरण अधिनियम (TP Act) से ग्रांट को बचाना था। उन्होंने कलेक्टर ऑफ बॉम्बे बनाम नुसरवानजी रतनजी मिस्त्री मामले का हवाला देते हुए सरकारी ग्रांट अधिनियम की धारा 3 की संकीर्ण व्याख्या पर जोर दिया और तर्क दिया कि सरकार द्वारा ‘वैध रूप से किराए पर ली गई’ संपत्तियों पर DRC अधिनियम लागू होना चाहिए।

कोर्ट का विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि निचली अदालतों ने इस व्यवस्था को सरकारी ग्रांट के बजाय एक सामान्य किरायेदारी मानकर कानूनी चूक की है।

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1. सरकारी ग्रांट अधिनियम (GG Act) का दायरा: कोर्ट ने अधिनियम की धारा 3 की संकीर्ण व्याख्या को खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा:

“सरकारी ग्रांट अधिनियम की धारा 3 एक स्पष्ट विधायी जनादेश देती है कि प्रत्येक सरकारी ग्रांट अपनी शर्तों (Tenor) के अनुसार प्रभावी होगी, भले ही इसके विपरीत कोई भी कानून, नियम या वैधानिक प्रावधान मौजूद हो। इस प्रावधान में प्रयुक्त शब्दावली अत्यंत व्यापक है और इसे सीमित नहीं किया जा सकता।”

2. DRC अधिनियम की अप्रासंगिकता: कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किराया नियंत्रण कानून सामान्य किरायेदारी के लिए है, न कि उन कब्जों के लिए जो सरकारी ग्रांट से संचालित होते हैं। प्रदीप ऑयल कॉरपोरेशन बनाम दिल्ली नगर निगम मामले का संदर्भ देते हुए कोर्ट ने कहा कि ग्रांट की शर्तें किसी भी अन्य कानून के प्रावधानों से ऊपर और सुरक्षित रहती हैं।

3. पूर्व फैसलों का संदर्भ: कोर्ट ने हाईकोर्ट द्वारा कलेक्टर ऑफ बॉम्बे मामले पर निर्भरता को गलत बताया क्योंकि वह मामला राजस्व मूल्यांकन से जुड़ा था। कोर्ट ने अज़ीम अहमद काज़मी बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और भारत सरकार बनाम दिनशॉ शापूरजी अंकलेसरी जैसे फैसलों का पालन किया, जो सरकारी ग्रांट के मामलों में सरकार को विशेष अधिकार देते हैं।

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4. क्षेत्राधिकार और बेदखली का अभाव: सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब DRC अधिनियम लागू ही नहीं था, तो रेंट कंट्रोलर के पास बेदखली का आदेश देने का क्षेत्राधिकार नहीं था। इसके अलावा, लीज डीड में किराया न देने पर बेदखली का कोई प्रावधान नहीं था:

“ग्रांट अपनी शर्तों के अनुसार संचालित होनी चाहिए और इसमें किसी शर्त की अनुपस्थिति को बेदखली का आधार नहीं बनाया जा सकता। प्रतिवादी का अधिकार केवल कानून के अनुसार किराया वसूलने तक सीमित है।”

फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए 8 जनवरी, 2020 के हाईकोर्ट के फैसले को रद्द कर दिया। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यह फैसला प्रतिवादी को किराए की वसूली के लिए उचित नागरिक उपचार (Civil Remedies) अपनाने से नहीं रोकेगा।

मामले का विवरण:

  • मामले का शीर्षक: यूनियन ऑफ इंडिया बनाम सर सोभा सिंह एंड संस प्राइवेट लिमिटेड
  • केस नंबर: सिविल अपील नंबर 4686 ऑफ 2026
  • पीठ: जस्टिस संजय करोल और जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा
  • दिनांक: 22 अप्रैल, 2026

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