सुप्रीम कोर्ट ने वर्ष 2008 के एक हत्याकांड में पिता-पुत्र, अदालत यादव और अनिरुद्ध यादव की दोषसिद्धि और आजीवन कारावास की सजा को बरकरार रखा है। न्यायालय ने यह स्पष्ट किया है कि दोषसिद्धि केवल एक ‘स्टर्लिंग’ (उत्कृष्ट) गवाह की गवाही पर आधारित हो सकती है और साक्ष्य में मामूली विरोधाभास या प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज करने में देरी अभियोजन के मामले को कमजोर नहीं करती है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 4 दिसंबर, 2008 को बिहार के बलिया में हुई एक घटना से संबंधित है, जहाँ राम शरण यादव की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। अभियोजन पक्ष के अनुसार, मृतक और उनका भाई सुनील कुमार यादव (PW-5) बेगूसराय कोर्ट से लौट रहे थे, तभी अपीलकर्ताओं और अन्य अभियुक्तों ने उन्हें घेर लिया। आरोप है कि अदालत यादव (A-1) ने मृतक के सिर में पिस्तौल से गोली मारी, जिससे उनकी मौके पर ही मृत्यु हो गई। यह हमला महेश पासवान हत्याकांड में मृतक द्वारा गवाही देने से इनकार न करने के प्रतिशोध में किया गया था। घटना के दौरान अनिरुद्ध यादव (A-2) ने भी गोली चलाई, जबकि अन्य अभियुक्तों की गोलीबारी में शिकायतकर्ता सुनील यादव के पैर में चोट आई।
ट्रायल कोर्ट ने 2011 में अपीलकर्ताओं को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302, 307, 149 और 120B के साथ-साथ शस्त्र अधिनियम की धारा 27 के तहत दोषी ठहराया था। बाद में हाईकोर्ट ने अन्य कथित चश्मदीदों (PW-1 से PW-4) की उपस्थिति पर संदेह जताते हुए मुख्य रूप से घायल शिकायतकर्ता (PW-5) की गवाही के आधार पर इस निर्णय की पुष्टि की।
पक्षों के तर्क
अपीलकर्ताओं के वरिष्ठ वकील ने निचली अदालतों के निष्कर्षों को निम्नलिखित आधारों पर चुनौती दी:
- FIR में देरी: घटना शाम 5:00 से 6:00 बजे के बीच हुई थी, जबकि FIR रात 10:30 बजे दर्ज की गई। बचाव पक्ष का दावा था कि यह देरी मूल घटनाक्रम को दबाने के लिए की गई थी।
- घटनास्थल का विवाद: FIR और जांच अधिकारी के बयानों में घटनास्थल की सटीक स्थिति और किराने की दुकान की मौजूदगी को लेकर विरोधाभास बताया गया।
- चिकित्सीय बनाम चश्मदीद साक्ष्य: बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट (PW-7) में प्रवेश और निकास द्वार की स्थिति PW-5 के उस बयान के विपरीत थी जिसमें उन्होंने कहा था कि मृतक को सामने से सिर में गोली मारी गई थी।
- स्वतंत्र गवाहों का अभाव: यह तर्क दिया गया कि सार्वजनिक स्थान पर घटना होने के बावजूद किसी भी स्वतंत्र ग्रामीण का बयान नहीं लिया गया।
दूसरी ओर, राज्य सरकार ने दलील दी कि एक घायल गवाह की गवाही का साक्ष्य मूल्य अधिक होता है और सभी गवाहों के बयान अपराध के सामान्य क्षेत्र की पुष्टि करते हैं।
न्यायालय का विश्लेषण
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमीकापम कोटिश्वर सिंह की पीठ ने इस बात की समीक्षा की कि क्या निष्कर्षों में कोई स्पष्ट त्रुटि थी।
1. एकल गवाह की विश्वसनीयता न्यायालय ने साक्ष्य अधिनियम की धारा 134 का हवाला देते हुए कहा कि साक्ष्य की गुणवत्ता संख्या से अधिक महत्वपूर्ण है। राय संदीप बनाम राज्य (NCT दिल्ली) (2012) मामले का संदर्भ देते हुए पीठ ने ‘स्टर्लिंग गवाह’ को परिभाषित किया और कहा:
“ऐसे गवाह के संस्करण पर विचार करने वाले न्यायालय को बिना किसी हिचकिचाहट के इसे इसके अंकित मूल्य पर स्वीकार करने की स्थिति में होना चाहिए… किसी भी परिस्थिति में घटना के तथ्य, शामिल व्यक्तियों और उसके क्रम के बारे में संदेह की गुंजाइश नहीं होनी चाहिए।”
2. FIR दर्ज करने में देरी हिमाचल प्रदेश राज्य बनाम ज्ञान चंद (2001) का उल्लेख करते हुए न्यायालय ने कहा कि FIR में देरी को मामले पर संदेह करने का कोई “कर्मकांडीय सूत्र” नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने कहा कि ग्रामीण परिवेश में अज्ञानता, परिवहन का अभाव या सदमे के बाद मानसिक शांति प्राप्त करने की आवश्यकता देरी के वाजिब कारण हो सकते हैं।
3. मेडिकल और चश्मदीद साक्ष्य में सामंजस्य पीठ ने पाया कि दोनों साक्ष्यों ने इस बात की पुष्टि की है कि मृतक के सिर में गोली लगी थी। न्यायालय ने कहा:
“यदि गवाहों की गवाही और चिकित्सा राय के बीच कुछ विरोधाभास होते भी, तो आम तौर पर लागू नियम यह है कि चश्मदीद गवाह की गवाही चिकित्सा राय से बेहतर मानी जाएगी, जो कि विशेषज्ञ गवाही की प्रकृति की होती है।”
4. स्वतंत्र गवाहों की कमी ग्रामीणों द्वारा गवाही न देने पर न्यायालय ने टिप्पणी की:
“इस मामले में विशेष रूप से न्यायालय सामाजिक वास्तविकताओं की अनदेखी नहीं कर सकता, जहाँ कथित तौर पर एक कुख्यात व्यक्ति के आदेश पर, उसके मुकदमे के गवाह की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। आम व्यक्ति के मन में हिचकिचाहट होना स्वाभाविक है, वह इस अप्रिय मामले में नहीं उलझना चाहता।”
न्यायालय का निर्णय
सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि घायल शिकायतकर्ता (PW-5) की गवाही ‘स्टर्लिंग क्वालिटी’ की और अटूट थी। न्यायालय ने माना कि दोनों अपीलकर्ताओं का उद्देश्य हत्या करना था। इसके परिणामस्वरूप, अपीलों को खारिज कर दिया गया और आजीवन कारावास की सजा बरकरार रखी गई।
मामले का विवरण:
- मामले का शीर्षक: अदालत यादव आदि बनाम बिहार राज्य
- केस नंबर: क्रिमिनल अपील नंबर 1788-1789/2019
- पीठ: जस्टिस संजय करोल, जस्टिस नोंगमीकापम कोटिश्वर सिंह
- दिनांक: 22 अप्रैल, 2026

