बेअंत सिंह हत्याकांड: राजोआणा की दया याचिका पर केंद्र को सुप्रीम कोर्ट की आखिरी मोहलत; कहा- ‘जवाब नहीं दिया तो आरोपों को सही मान लिया जाएगा’

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या के मामले में मौत की सजा पाए बलवंत सिंह राजोआणा की याचिका पर केंद्र सरकार को कड़ी फटकार लगाई। जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस विजय बिश्नोई की बेंच ने केंद्र द्वारा जवाब दाखिल करने में हो रही देरी पर गहरी नाराजगी जताई और हलफनामा पेश करने के लिए ‘दो हफ्ते’ का अंतिम समय दिया है।

राजोआणा पिछले 29 वर्षों से जेल में बंद हैं, जिनमें से 15 साल उन्होंने फांसी की सजा के इंतजार में बिताए हैं। उन्होंने अपनी दया याचिका पर फैसला लेने में हो रही अत्यधिक देरी के आधार पर मौत की सजा को उम्रकैद में बदलने की मांग की है।

सुनवाई के दौरान बेंच ने केंद्र सरकार की चुप्पी पर सवाल उठाए। जस्टिस विक्रम नाथ ने पूछा, “आपने अब तक अपना जवाबी हलफनामा दाखिल क्यों नहीं किया?” जब केंद्र के वकील ने कुछ दस्तावेजों को ‘सीलबंद लिफाफे’ में पेश करने की इच्छा जताई, तो कोर्ट ने इसे स्वीकार नहीं किया।

बेंच ने सख्त लहजे में कहा, “आप अपना जवाबी हलफनामा दाखिल करें, अन्यथा राजोआणा द्वारा लगाए गए आरोपों को निर्विरोध (uncontroverted) मान लिया जाएगा।” कोर्ट ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि इस मामले में आगे और समय नहीं दिया जाएगा।

राजोआणा की ओर से पेश वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने दलील दी कि शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (SGPC) द्वारा दायर दया याचिका मार्च 2012 से लंबित है। उन्होंने कोर्ट को याद दिलाया कि 3 मई 2023 को सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित अधिकारियों को इस पर निर्णय लेने को कहा था। इसके बावजूद, 24 सितंबर 2024 के आदेश में चेतावनी दिए जाने के बाद भी सरकार की ओर से कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है।

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राजोआणा ने अपनी नई याचिका में तर्क दिया है कि वह 28.8 साल जेल में बिता चुके हैं। उनके वकील के अनुसार, अनुच्छेद 72 के तहत इतनी लंबी देरी सजा को कम करने का पर्याप्त आधार है, जैसा कि सुप्रीम कोर्ट के पिछले कई फैसलों में कहा गया है।

यह मामला 31 अगस्त 1995 का है, जब चंडीगढ़ स्थित सचिवालय के बाहर एक भीषण बम धमाके में पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री बेअंत सिंह और 16 अन्य लोगों की मौत हो गई थी। जुलाई 2007 में एक विशेष अदालत ने राजोआणा को मौत की सजा सुनाई थी।

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हालांकि केंद्र सरकार पहले इस मामले की ‘संवेदनशीलता’ का हवाला देती रही है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के ताजा रुख से यह स्पष्ट है कि कार्यपालिका किसी कैदी की जीवन और स्वतंत्रता से जुड़े फैसले को अनिश्चित काल के लिए नहीं टाल सकती।

इस मामले की अगली सुनवाई अब दो सप्ताह बाद होगी, जिसमें केंद्र को यह बताना होगा कि सरकार की सुस्ती के आधार पर राजोआणा की मौत की सजा को उम्रकैद में क्यों न बदला जाए।

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