मिजोरम: आइजोल में विरासत वृक्षों की कटाई पर गौहाटी हाईकोर्ट की रोक, सरकार से मांगा जवाब

गौहाटी हाईकोर्ट की आइजोल खंडपीठ ने मिजोरम की राजधानी में पर्यावरण और ऐतिहासिक विरासत के संरक्षण के पक्ष में एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप किया है। कोर्ट ने लम्मुल (Lammual) क्षेत्र में पेड़ों की कटाई पर अंतरिम रोक लगा दी है। यह वही क्षेत्र है जिसे हाल ही में असम राइफल्स ने खाली किया था और वर्तमान में यह स्थान विकास परियोजनाओं और पर्यावरण संरक्षण के बीच विवाद का केंद्र बना हुआ है।

सोमवार को जस्टिस माइकल जोथंकुमा और जस्टिस कौशिक गोस्वामी की खंडपीठ ने आइजोल के लम्मुल क्षेत्र में लगभग 200 पेड़ों को काटने की राज्य सरकार की योजना को स्थगित कर दिया। एक जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई करते हुए, हाईकोर्ट ने गौर किया कि लक्षित किए गए कई पेड़ 100 साल से भी अधिक पुराने हैं और उस भूमि पर स्थित हैं जिसे ‘हेरिटेज’ (विरासत) घोषित किया गया है। कोर्ट ने राज्य सरकार से इस पर विस्तृत स्पष्टीकरण मांगा है कि शहरी विकास के लिए इन ऐतिहासिक पेड़ों को हटाना क्यों आवश्यक है।

यह विवाद पिछले महीने शहरी विकास और गरीबी उन्मूलन मंत्री के. सपडांगा द्वारा घोषित बुनियादी ढांचा योजनाओं के बाद शुरू हुआ। राज्य सरकार असम राइफल्स द्वारा खाली की गई इस प्रमुख भूमि का उपयोग आइजोल की पुरानी ट्रैफिक समस्या को हल करने के लिए करना चाहती थी। योजना के तहत ट्रेजरी स्क्वायर और बाजार बुंगकावन के बीच के लगभग 1 किलोमीटर लंबे व्यस्त रास्ते को चौड़ा किया जाना था।

हालांकि मुख्यमंत्री लालदुहोमा के नेतृत्व में एक सलाहकार समिति का गठन किया गया था, लेकिन पर्यावरण समूहों ने इस परियोजना के पारिस्थितिक प्रभाव पर चिंता जताई। सरकार की योजना क्वार्टर गार्ड और लोच हाउस जैसी ऐतिहासिक इमारतों को संरक्षित करने की थी, लेकिन अन्य संरचनाओं को गिराने और सड़क विस्तार के लिए हरियाली साफ करने का प्रस्ताव था।

यह जनहित याचिका ‘सेंटर फॉर एनवायरनमेंट एंड सोशल जस्टिस’ की ओर से पर्यावरण कार्यकर्ता सियाज़मपुई सैलो द्वारा दायर की गई थी। याचिकाकर्ता ने मीडिया रिपोर्ट्स का हवाला देते हुए बताया कि साइट पर मौजूद 400 पेड़ों में से 174 को काटने की तैयारी थी।

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने इस स्थल के इतिहास पर विशेष ध्यान दिया और कहा कि बैरक क्षेत्र की संरचनाएं 1897 की हैं। खंडपीठ ने इस बात पर जोर दिया कि राज्य को शहर के बीचों-बीच स्थित इन “सदी पुराने पेड़ों” को नष्ट करने का ठोस औचित्य पेश करना होगा।

राज्य की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता पी. भट्टाचार्य और याचिकाकर्ता की ओर से वकील टीजे महंता ने अपनी दलीलें पेश कीं। दोनों पक्षों को सुनने के बाद हाईकोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई तक पेड़ों की कटाई पर रोक लगा दी।

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यह अंतरिम रोक 18 मई को होने वाली अगली सुनवाई तक प्रभावी रहेगी। उम्मीद है कि तब तक राज्य सरकार अपना जवाब दाखिल करेगी, जिसमें उसे विकास की रूपरेखा और विरासत वृक्षों की कटाई की अनिवार्यता को स्पष्ट करना होगा।

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