तथ्यों को छिपाना और संबंधित पक्षों को शामिल न करना प्रोबेट रद्द करने का ‘उचित कारण’: सुप्रीम कोर्ट

भारत के सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया है जिसमें एक अपंजीकृत वसीयत (unregistered Will) के प्रोबेट को बहाल किया गया था। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि महत्वपूर्ण तथ्यों को छिपाना और मामले से जुड़े पक्षों—विशेष रूप से संपत्ति के बाद के खरीदारों और कानूनी वारिसों—को नोटिस न देना, भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम (ISA), 1925 की धारा 263 के तहत प्रोबेट को रद्द करने का “उचित कारण” (just cause) है।

जस्टिस उज्जल भुइयां और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की पीठ ने कहा कि हालांकि वसीयतनामा संबंधी क्षेत्राधिकार (testamentary jurisdiction) मुख्य रूप से वसीयत के निष्पादन की प्रामाणिकता से संबंधित है, लेकिन यदि प्रोबेट धोखाधड़ी या संपत्ति के मालिकाना हक से जुड़ी जानकारी छिपाकर प्राप्त किया गया है, तो उसे रद्द किया जा सकता है।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद 9 जनवरी 1976 की एक अपंजीकृत वसीयत से शुरू हुआ, जिसे कथित तौर पर ईस्वरमूर्ति गौंडर ने अपनी बेटी सरोजिनी (प्रतिवादी संख्या 1) के पक्ष में लिखा था। हालांकि, वसीयत के मात्र कुछ हफ्तों बाद ही, पिता ने वही संपत्तियां 21 फरवरी 1976 को पंजीकृत सेल डीड के माध्यम से अन्य व्यक्तियों को बेच दीं। अपीलकर्ताओं ने 1997 में इन संपत्तियों को खरीदा था।

पिता की मृत्यु के 26 साल बाद और वसीयत लिखे जाने के 33 साल बाद, 2009 में सरोजिनी ने प्रोबेट के लिए आवेदन किया। इस प्रक्रिया में उसने केवल अपनी दो बहनों को पक्षकार बनाया, जबकि अपने दो भाइयों और वर्तमान संपत्ति स्वामियों (अपीलकर्ताओं) को छोड़ दिया। इसी दौरान, उसने एक सिविल सूट भी दायर किया जहां उसने स्वीकार किया कि उसे पूर्व सेल डीड की जानकारी थी, लेकिन दावा किया कि उसके पिता के हस्ताक्षर जबरन लिए गए थे।

कोयंबटूर की जिला अदालत ने 2020 में प्रोबेट रद्द कर दिया था, लेकिन मद्रास हाईकोर्ट ने 2022 में इस आदेश को पलटते हुए कहा कि प्रोबेट कोर्ट का काम मालिकाना हक तय करना नहीं है।

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पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ताओं की दलीलें: अपीलकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता आनंद पद्मनाभन ने तर्क दिया कि प्रोबेट धोखाधड़ी और मिलीभगत से प्राप्त किया गया था। उन्होंने धारा 263 (ISA) का हवाला देते हुए कहा कि प्रक्रिया “तथ्यात्मक रूप से दोषपूर्ण” थी क्योंकि आवश्यक पक्षों को नोटिस (citation) जारी नहीं किया गया था। साथ ही, धारा 63 (ISA) के तहत वसीयत के गवाहों का भी परीक्षण नहीं किया गया।

प्रतिवादियों की दलीलें: प्रतिवादियों के वकील श्री एम. ए. चिन्नासामी ने तर्क दिया कि हाईकोर्ट का फैसला सही था। उनके अनुसार, प्रोबेट कार्यवाही का उद्देश्य केवल वसीयत की वैधता जांचना है, और मालिकाना हक के सवालों को अलग से सिविल कोर्ट में तय किया जाना चाहिए।

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कोर्ट का विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट ने अधिनियम की धारा 263 और धारा 283 के बीच के संबंध का विश्लेषण किया। कोर्ट ने पाया कि यदि कार्यवाही में कोई बुनियादी दोष है या यदि अदालत से कुछ महत्वपूर्ण छिपाकर प्रोबेट लिया गया है, तो “उचित कारण” मौजूद माना जाता है।

पीठ ने बसंती देवी बनाम रवि प्रकाश राम प्रसाद जायसवाल (2008) जैसे पिछले फैसलों का संदर्भ देते हुए दोहराया कि प्रोबेट एक ‘जजमेंट इन रेम’ (सर्वबंधी निर्णय) है जो पूरी दुनिया पर बाध्यकारी होता है। इसलिए, जिस व्यक्ति का संपत्ति में थोड़ा भी हित है, उसे नोटिस पाने का अधिकार है।

बनवारीलाल बनाम कुसुम बाई (1972) मामले का जिक्र करते हुए कोर्ट ने कहा:

“ऐसा व्यक्ति जिसने प्रोबेट कार्यवाही शुरू होने से पहले संपत्ति में हित अर्जित किया है, वह एक संबंधित पक्ष (interested party) है।”

कोर्ट ने इस बात पर हैरानी जताई कि सरोजिनी ने प्रोबेट याचिका के केवल आठ दिन बाद ही सिविल सूट दायर किया था जिसमें सेल डीड का जिक्र था, लेकिन प्रोबेट कोर्ट में इन तथ्यों को जानबूझकर छिपाया।

पीठ ने कहा:

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“यह कहा जा सकता है कि प्रतिवादी संख्या 1 ने महत्वपूर्ण तथ्यों को दबाकर अपने पक्ष में प्रोबेट का आदेश प्राप्त किया, और प्रोबेट दिए जाने से पहले भाइयों या वर्तमान अपीलकर्ताओं को कोई नोटिस जारी नहीं किया गया था।”

कोर्ट का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि जिला अदालत का प्रोबेट रद्द करने का फैसला पूरी तरह उचित था। पीठ ने कहा कि मद्रास हाईकोर्ट ने वैधानिक आवश्यकताओं की अनदेखी कर “गंभीर त्रुटि” की है।

अपील स्वीकार करते हुए हाईकोर्ट के 26 अप्रैल 2022 के आदेश को रद्द कर दिया गया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यद्यपि प्रोबेट रद्द कर दिया गया है, मालिकाना हक से जुड़े लंबित दीवानी मामलों का फैसला संबंधित सिविल कोर्ट कानून के अनुसार करेगा।

मामले का विवरण:

  • केस का शीर्षक: एस. लियोरेक्स सेबेस्टियन और अन्य बनाम सरोजिनी और अन्य
  • केस संख्या: सिविल अपील संख्या ___ ऑफ 2026 (एस.एल.पी. (सी) संख्या 20055/2022 से उत्पन्न)
  • पीठ: जस्टिस उज्जल भुइयां और जस्टिस विपुल एम. पंचोली
  • तारीख: 21 अप्रैल, 2026

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