दूसरी मैटरनिटी लीव के लिए दो साल का अंतर जरूरी नहीं: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फाइनेंशियल हैंडबुक के नियम को किया दरकिनार

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी महिला कर्मचारी को दूसरी मैटरनिटी लीव (प्रसूति अवकाश) देने से सिर्फ इसलिए इनकार नहीं किया जा सकता कि उसने पहली लीव के दो साल के भीतर ही इसके लिए आवेदन किया है। हाईकोर्ट ने कहा कि ‘मैटरनिटी बेनिफिट एक्ट, 1961’ के तहत मिलने वाले वैधानिक अधिकार, राज्य सरकार की फाइनेंशियल हैंडबुक या किसी भी कार्यकारी निर्देश से ऊपर हैं।

यह आदेश हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच के जस्टिस करुणेश सिंह पवार ने मनीषा यादव द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। याचिकाकर्ता ने 4 अप्रैल, 2026 के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसके तहत उनके दूसरी बार मैटरनिटी लीव के अनुरोध को खारिज कर दिया गया था।

याचिकाकर्ता मनीषा यादव ने साल 2021 में अपने पहले बच्चे को जन्म दिया था। इसके बाद, जब उन्होंने 2022 में दूसरी मैटरनिटी लीव के लिए आवेदन किया, तो अधिकारियों ने उसे नामंजूर कर दिया। सरकार की ओर से तर्क दिया गया कि फाइनेंशियल हैंडबुक के नियम 153(1) के अनुसार, दो मैटरनिटी लीव के बीच कम से कम दो साल का अंतराल होना अनिवार्य है।

मनीषा यादव के वकील ने दलील दी कि मैटरनिटी बेनिफिट एक्ट, 1961 एक ‘बेनिफिशियल लेजिस्लेशन’ (कल्याणकारी कानून) है, जिसे कामकाजी महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के लिए संसद द्वारा बनाया गया है। चूंकि इस कानून में दो साल के अंतराल की कोई शर्त नहीं है, इसलिए इसे राज्य सरकार के नियमों पर प्राथमिकता मिलनी चाहिए।

जस्टिस करुणेश सिंह पवार ने पिछले कानूनी उदाहरणों का हवाला देते हुए कहा कि मैटरनिटी बेनिफिट एक्ट एक केंद्रीय कानून है। उन्होंने स्पष्ट किया कि यह अधिनियम फाइनेंशियल हैंडबुक के किसी भी प्रावधान या सरकारी निर्देशों पर प्रभावी होगा।

हाईकोर्ट ने कहा, “मैटरनिटी बेनिफिट एक्ट, संसद द्वारा पारित कानून होने के नाते, फाइनेंशियल हैंडबुक के प्रावधानों या किसी भी कार्यकारी निर्देश से ऊपर रहेगा।” कोर्ट ने आगे जोर दिया कि यदि इन दोनों के बीच कोई विरोधाभास होता है, तो अधिनियम के प्रावधान ही मान्य होंगे।

अदालत ने याचिकाकर्ता की छुट्टी खारिज करने के आधार को ‘अतार्किक’ (untenable) करार दिया और कहा कि ऐसे कल्याणकारी कानूनों की व्याख्या उनके सामाजिक उद्देश्यों को पूरा करने के लिए की जानी चाहिए।

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अदालत ने 4 अप्रैल, 2026 के विवादित आदेश को रद्द करते हुए सक्षम प्राधिकारी को निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता को 6 अप्रैल, 2026 से 2 अक्टूबर, 2026 तक की अवधि के लिए मैटरनिटी लीव प्रदान की जाए। यह फैसला कामकाजी महिलाओं के लिए एक बड़ी राहत है, जो यह सुनिश्चित करता है कि राज्य के प्रशासनिक नियम केंद्रीय श्रम कानूनों द्वारा दिए गए लाभों को कम न कर सकें।

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