इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें एक नाबालिग आरोपी पर जघन्य अपराध के मामले में वयस्क के रूप में मुकदमा चलाने के आदेश को चुनौती दी गई थी। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किशोर न्याय (बच्चों की देखभाल और संरक्षण) अधिनियम, 2015 की धारा 15 के तहत प्रारंभिक मूल्यांकन (preliminary assessment) में होने वाली देरी, यदि वह न्यायिक हस्तक्षेप या लंबित मामलों के कारण है, तो वह कानूनी कार्यवाही को अमान्य नहीं बनाती है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 23 जनवरी 2018 को थाना कादर चौक, जनपद बदायूं में दर्ज एफआईआर (मुकदमा अपराध संख्या 15/2018) से जुड़ा है, जो धारा 376 आईपीसी और पॉक्सो एक्ट के तहत पुनरीक्षणकर्ता (revisionist) उरवेश उर्फ प्रवेश कुमार के खिलाफ दर्ज की गई थी। कथित घटना के समय पुनरीक्षणकर्ता की आयु 17 वर्ष, 11 महीने और 19 दिन थी।
इस मामले की कानूनी प्रक्रिया लंबी रही। शुरुआत में ट्रायल कोर्ट ने 2018 में आरोपी को किशोर मानने से इनकार कर दिया था। हालांकि, 2021 में हाईकोर्ट के निर्देश के बाद, किशोर न्याय बोर्ड (JJB) ने उसे किशोर घोषित किया और 12 दिसंबर 2022 को आदेश दिया कि उस पर किशोर के रूप में ही मुकदमा चलाया जाए। इस आदेश को पीड़िता ने अपील के माध्यम से चुनौती दी। 13 अक्टूबर 2023 को स्पेशल जज (पॉक्सो कोर्ट), बदायूं ने जेजेबी के फैसले को पलटते हुए आदेश दिया कि पुनरीक्षणकर्ता पर वयस्क के रूप में मुकदमा चलाया जाना चाहिए। इसी अपीलीय आदेश को वर्तमान पुनरीक्षण याचिका में चुनौती दी गई थी।
पक्षों के तर्क
पुनरीक्षणकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि 13 अक्टूबर 2023 का आदेश जेजे एक्ट की धारा 15 का उल्लंघन करता है। उन्होंने दलील दी कि कथित अपराध के चार साल बाद प्रारंभिक मूल्यांकन किया गया, जब आरोपी वयस्क हो चुका था। उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के ‘बरुण चंद्र ठाकुर बनाम मास्टर भोलू और अन्य’ मामले का हवाला देते हुए कहा कि देरी के कारणों को स्पष्ट किए बिना किया गया मूल्यांकन आरोपी के निष्पक्ष सुनवाई के अधिकार को प्रभावित करता है।
वहीं, पीड़िता के वकील ने तर्क दिया कि यह देरी आरोपी के स्वयं के कृत्यों और हाईकोर्ट में लंबित पूर्व की याचिकाओं के कारण हुई थी। उन्होंने कहा कि प्रारंभिक मूल्यांकन के लिए निर्धारित समय सीमा केवल निर्देशात्मक (directory) है, अनिवार्य (mandatory) नहीं।
हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां
न्यायमूर्ति अचल सचदेव ने जेजे एक्ट की धारा 14 और 15 के बीच के कानूनी तालमेल का विश्लेषण किया। कोर्ट ने इस महत्वपूर्ण प्रश्न पर विचार किया कि क्या मूल्यांकन के लिए तीन महीने की समय सीमा अनिवार्य है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले ‘चाइल्ड इन कॉन्फ्लिक्ट विद लॉ बनाम कर्नाटक राज्य (2024)’ का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने कहा:
“जेजे एक्ट की धारा 14(3) का प्रावधान, जो धारा 15 के तहत प्रारंभिक मूल्यांकन पूरा करने के लिए तीन महीने का समय देता है, अनिवार्य नहीं है और यह केवल निर्देशात्मक है।”
चार साल की देरी के संबंध में कोर्ट ने पाया कि जब मामला हाईकोर्ट में लंबित होने के कारण देरी होती है, तो इसे ‘कानूनी रूप से माफ’ (legally excused) किया जाता है। कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि यह मूल्यांकन अपराध के समय बच्चे की मानसिक क्षमता को समझने के लिए होता है, न कि उसकी वर्तमान क्षमता को।
कोर्ट ने देरी से होने वाले मनोवैज्ञानिक आकलन की चुनौतियों को स्वीकार करते हुए कहा:
“यदि कोई बच्चा अपराध के समय 17 वर्ष का था और अब 21 वर्ष का हो गया है, तो आज किया गया मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन अपराध के समय उसकी मानसिक और भावनात्मक परिपक्वता को सटीक रूप से नहीं दर्शाएगा।”
हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यद्यपि ऐसी देरी आरोपी के पक्ष को मजबूत करती है, लेकिन यह “प्रारंभिक मूल्यांकन को स्वतः अमान्य नहीं कर देती।” कोर्ट ने यह भी उल्लेख किया कि जेजे एक्ट की धारा 20 उन स्थितियों के लिए है जहाँ प्रक्रिया के दौरान बच्चा 21 वर्ष की आयु पूरी कर लेता है।
न्यायालय का निर्णय
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पाया कि स्पेशल जज, पॉक्सो कोर्ट, बदायूं द्वारा पारित अपीलीय आदेश में कोई कानूनी त्रुटि नहीं है। न्यायमूर्ति सचदेव ने टिप्पणी की कि यह पुनरीक्षण याचिका “मुकदमे में बाधा डालने के परोक्ष उद्देश्य” से दाखिल की गई प्रतीत होती है।
हाईकोर्ट ने पुनरीक्षणकर्ता पर वयस्क के रूप में मुकदमा चलाने के आदेश को बरकरार रखते हुए याचिका को मेरिट के आधार पर खारिज कर दिया।
केस विवरण:
- केस शीर्षक: उरवेश बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य
- केस संख्या: क्रिमिनल रिवीजन संख्या – 6123 वर्ष 2025
- पीठ: न्यायमूर्ति अचल सचदेव
- दिनांक: 17 अप्रैल, 2026

