सुप्रीम कोर्ट ने आत्महत्या के लिए उकसाने के एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि केवल ‘अवैध संबंधों’ के आरोप, बिना किसी ‘उकसावे के सकारात्मक कार्य’ (positive act of instigation) के, भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 306 के तहत अपराध नहीं माने जा सकते।
जस्टिस के.वी. विश्वनाथन और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि उकसाने के आरोप को सिद्ध करने के लिए अभियुक्त की ओर से स्पष्ट मंशा (mens rea) और घटना के साथ उसकी निकटता साबित होना आवश्यक है।
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला छत्तीसगढ़ के कोमल साहू की मृत्यु से जुड़ा है, जिसका शव अक्टूबर 2024 में एक पेड़ से लटका हुआ मिला था। पुलिस जांच के बाद दाखिल रिपोर्ट में अपीलकर्ता बालाजी जायसवाल को मुख्य अभियुक्त और मृतक की पत्नी रेवती बाई को दूसरी अभियुक्त बनाया गया। अभियोजन पक्ष का आरोप था कि अभियुक्त और मृतक की पत्नी के बीच अवैध संबंध थे और पत्नी अक्सर अभियुक्त की मौजूदगी में अपने पति का अपमान करती थी।
दिसंबर 2024 में ट्रायल कोर्ट ने अभियुक्त के खिलाफ IPC की धारा 306/34 के तहत आरोप तय किए थे। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 8 अप्रैल, 2025 को अपीलकर्ता की पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी थी, जिसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुँचा।
पक्षकारों की दलीलें
अपीलकर्ता की ओर से पेश वकील श्री आनंद पी. पांडे ने दलील दी कि यदि अभियोजन के सारे तथ्यों को मान भी लिया जाए, तो भी वे उकसाने (abetment) की श्रेणी में नहीं आते। उन्होंने बताया कि मृतक और अभियुक्त ने घटना से दो दिन पहले 5 मई, 2024 की रात साथ में शराब पी थी, जबकि आत्महत्या 7 मई को हुई। इस बीच अभियुक्त द्वारा उकसाने का कोई प्रत्यक्ष कार्य नहीं किया गया।
दूसरी ओर, राज्य सरकार की ओर से पेश वकील सुश्री अंकिता शर्मा ने विरोध करते हुए कहा कि अभियुक्त और मृतक की पत्नी के संबंधों और पति के अपमान ने कोमल साहू को आत्महत्या के लिए मजबूर किया। उन्होंने कहा कि परिवार और पड़ोसियों के बयान ट्रायल चलाने के लिए पर्याप्त हैं।
अदालत का विश्लेषण और टिप्पणियाँ
सुप्रीम कोर्ट ने IPC की धारा 306 और धारा 107 (उकसाना) के तत्वों का विश्लेषण किया। प्रकाश बनाम महाराष्ट्र राज्य (2024) के फैसले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि उकसाने के लिए मानसिक प्रक्रिया और जानबूझकर सहायता करना अनिवार्य है।
‘उकसाने’ की कानूनी आवश्यकता पर: कोर्ट ने रमेश कुमार बनाम छत्तीसगढ़ राज्य (2001) के फैसले को उद्धृत करते हुए कहा:
“उकसाने का अर्थ है किसी कार्य को करने के लिए प्रेरित करना, उकसाना या प्रोत्साहित करना… परिणाम को भड़काने के लिए एक उचित निश्चितता का होना स्पष्ट होना चाहिए।”
खंडपीठ ने पाया कि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री केवल यह दर्शाती है कि मृतक शराब का आदी था और अवैध संबंधों के सामान्य आरोप थे। कोर्ट के अनुसार, आत्महत्या की घटना के समय अभियुक्त द्वारा किसी “प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष कार्य” के सबूत नहीं मिले।
मंशा और निकटता का अभाव: कोर्ट ने नोट किया कि अभियुक्त और मृतक के बीच आखिरी मुलाकात 5 मई की रात हुई थी, जबकि आत्महत्या 7 मई को हुई। कोर्ट ने कहा:
“अपीलकर्ता और मृतक की मुलाकात और उसके द्वारा आत्महत्या किए जाने के बीच किसी निकटता के संबंध में कोई सामग्री उपलब्ध नहीं है… कोमल को आत्महत्या के लिए उकसाने वाली स्पष्ट मंशा (mens rea) का अभाव है।”
कोर्ट ने यह भी जोर दिया कि धारा 306 के मामलों में अदालतों को “अत्यधिक सावधान” रहना चाहिए क्योंकि मुख्य व्यक्ति (मृतक) जिरह के लिए उपलब्ध नहीं होता। मदन मोहन सिंह बनाम गुजरात राज्य (2010) का जिक्र करते हुए बेंच ने कहा:
“जब तक विशिष्ट आरोप और निश्चित प्रकृति की सामग्री (काल्पनिक या अनुमानित नहीं) मौजूद न हो, अभियुक्त को मुकदमे का सामना करने के लिए कहना खतरनाक होगा।”
अदालत का फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री की जांच करने में चूक की है। अदालत ने हाईकोर्ट के 8 अप्रैल, 2025 के आदेश को रद्द करते हुए बालाजी जायसवाल के खिलाफ दर्ज आपराधिक कार्यवाही को समाप्त कर दिया।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह फैसला केवल अपीलकर्ता (अभियुक्त नंबर 1) के लिए है और दूसरी अभियुक्त (पत्नी) के खिलाफ ट्रायल इन टिप्पणियों से प्रभावित हुए बिना जारी रहेगा।
केस विवरण
केस शीर्षक: बालाजी जायसवाल बनाम छत्तीसगढ़ राज्य और अन्य
केस संख्या: क्रिमिनल अपील संख्या 2026 (SLP (Crl.) No. 14640/2025 से उत्पन्न)
पीठ: जस्टिस के.वी. विश्वनाथन और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर
दिनांक: 16 अप्रैल, 2026

