मध्यस्थता की ‘सीट’ क्षेत्राधिकार निर्धारित करती है, ‘वेन्यू’ नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने धारा 34 की याचिका वापस करने वाले आदेश को रद्द किया

सुप्रीम कोर्ट ने मध्यस्थता (Arbitration) में “सीट” (Seat) और “वेन्यू” (Venue) के बीच स्थापित अंतर को दोहराते हुए कहा है कि एक बार जब पक्षकारों द्वारा “सीट” का स्पष्ट रूप से चयन कर लिया जाता है, तो यह एक विशेष क्षेत्राधिकार खंड (Exclusive Jurisdiction Clause) के रूप में कार्य करता है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी अन्य “वेन्यू” पर कार्यवाही आयोजित करने या वहां अवार्ड (Award) पारित होने मात्र से पर्यवेक्षी क्षेत्राधिकार (Supervisory Jurisdiction) उस स्थान की अदालतों के पास नहीं चला जाता।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद जम्मू-कश्मीर में चार बुनियादी ढांचा सड़क परियोजनाओं से उत्पन्न हुआ था। अपीलकर्ता, जम्मू-कश्मीर इकोनॉमिक रिकंस्ट्रक्शन एजेंसी (JKERA) ने शाहदरा-कमलकोट रोड प्रोजेक्ट सहित अन्य कार्यों के लिए प्रतिवादी, रश बिल्डर्स इंडिया प्राइवेट लिमिटेड को नियुक्त किया था। विवाद होने पर एक एकल मध्यस्थ की नियुक्ति की गई थी।

26 मार्च, 2016 के एक आदेश के माध्यम से, मध्यस्थ न्यायाधिकरण ने दोनों पक्षों की सहमति से यह रिकॉर्ड किया था कि “मध्यस्थता की सीट श्रीनगर होगी और वेन्यू नई दिल्ली होगा।” 15 जनवरी, 2024 को नई दिल्ली में मध्यस्थता अवार्ड दिए जाने के बाद, JKERA ने जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट के श्रीनगर बेंच में धारा 34 के तहत अवार्ड को चुनौती देने वाली याचिका दायर की।

हालांकि, 8 जुलाई, 2024 को हाईकोर्ट ने इस याचिका को यह कहते हुए वापस कर दिया कि चूंकि कार्यवाही नई दिल्ली में आयोजित की गई थी और अवार्ड भी वहीं दिया गया था, इसलिए केवल नई दिल्ली की अदालतों के पास ही इस पर सुनवाई का क्षेत्राधिकार है।

पक्षकारों की दलीलें

अपीलकर्ता ने तर्क दिया कि मध्यस्थ ने पक्षों की सहमति से श्रीनगर को ‘सीट’ के रूप में तय किया था। मध्यस्थता कानून के तहत, ‘सीट’ ही पर्यवेक्षी क्षेत्राधिकार निर्धारित करती है और यह चयन तब तक अपरिवर्तनीय रहता है जब तक कि आपसी समझौते से इसे बदला न जाए। अतः, धारा 34 की चुनौती सुनने का अधिकार केवल श्रीनगर की अदालतों को है।

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दूसरी ओर, प्रतिवादी ने दलील दी कि मध्यस्थता अवार्ड में नई दिल्ली को सभी उद्देश्यों के लिए मध्यस्थता के स्थान के रूप में दर्ज किया गया था। उनका यह भी कहना था कि पक्षकार आपसी सहमति से सीट बदल सकते हैं और अपीलकर्ता ने पहले ही इसी तरह की राहत के लिए दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

कोर्ट का विश्लेषण और कानूनी सिद्धांत

जस्टिस पमिघंतम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने कहा कि सीट और वेन्यू के बीच का अंतर मध्यस्थता न्यायशास्त्र में गहराई से समाया हुआ है, लेकिन फिर भी यह क्षेत्राधिकार संबंधी त्रुटियों को जन्म देता रहता है।

भारत एल्युमीनियम कंपनी बनाम कैसर एल्युमीनियम टेक्निकल सर्विसेज इंक. और BGS SGS SOMA JV बनाम NHPC लिमिटेड जैसे पिछले फैसलों का हवाला देते हुए कोर्ट ने निम्नलिखित मुख्य सिद्धांतों को संक्षेप में प्रस्तुत किया:

  1. कानूनी घर (Juridical Home): मध्यस्थता की ‘सीट’ इसका “कानूनी घर” है, जो लागू होने वाले कानून और पर्यवेक्षी नियंत्रण रखने वाली अदालत की पहचान करती है।
  2. अनन्य क्षेत्राधिकार (Exclusive Jurisdiction): “एक बार जब पक्षकारों के समझौते द्वारा सीट निर्धारित कर दी जाती है, तो उस स्थान की अदालतों के पास मध्यस्थता से उत्पन्न होने वाली सभी कार्यवाहियों, जिसमें अवार्ड को चुनौती देना भी शामिल है, पर विचार करने का अनन्य क्षेत्राधिकार होता है।”
  3. वेन्यू बनाम सीट: वेन्यू केवल सुनवाई आयोजित करने की सुविधा के लिए चुना गया एक “भौगोलिक स्थान” है और यह क्षेत्राधिकार प्रदान नहीं करता है। कोर्ट ने कहा, “केवल इस तथ्य से कि मध्यस्थता कार्यवाही आयोजित की गई या अवार्ड किसी विशेष स्थान पर दिया गया, उस स्थान की अदालतों को क्षेत्राधिकार नहीं मिलता यदि वह निर्धारित सीट से अलग है।”
  4. अपरिवर्तनीयता (Immutability): सीट तब तक निश्चित रहती है जब तक कि पक्षकारों के समझौते द्वारा इसे स्पष्ट रूप से बदला न जाए। यह अवार्ड में लिखे गए किसी “छिटपुट उल्लेख” (stray recital) से तय नहीं होती।
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तथ्यों पर गौर करते हुए, कोर्ट ने पाया कि श्रीनगर को सचेत रूप से ‘सीट’ के रूप में नामित किया गया था। अनुबंध का जम्मू-कश्मीर में निष्पादन और कार्यों का वहां होना भी इसी निष्कर्ष को पुख्ता करता है। कोर्ट ने हाईकोर्ट के दृष्टिकोण की आलोचना करते हुए कहा कि यदि इसे स्वीकार किया गया तो यह ‘सीट’ की अवधारणा को निरर्थक (Otiose) बना देगा।

कोर्ट का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने 8 जुलाई, 2024 के हाईकोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया और जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट में धारा 34 की कार्यवाही को बहाल कर दिया। कोर्ट ने हाईकोर्ट को निर्देश दिया कि वह गुण-दोष के आधार पर इस मामले पर शीघ्रता से विचार करे और निर्णय ले। पीठ ने निष्कर्ष निकाला कि श्रीनगर की अदालत, जो मध्यस्थता की सीट की अदालत है, “अकेले मध्यस्थता अवार्ड की चुनौती पर विचार करने और निर्णय लेने का क्षेत्राधिकार रखती है।”

मामले का विवरण:

  • केस टाइटल: J&K इकोनॉमिक रिकंस्ट्रक्शन एजेंसी बनाम रश बिल्डर्स इंडिया प्राइवेट लिमिटेड
  • केस नंबर: सिविल अपील नंबर __ ऑफ 2026 (SLP (C) No. __ of 2026 @ डायरी नंबर 44792 ऑफ 2025 से उत्पन्न)
  • पीठ: जस्टिस पमिघंतम श्री नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे
  • फैसले की तारीख: 15 अप्रैल, 2026

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