‘पब्लिक परसेप्शन पर चल रहा है SRB’: प्रियदर्शिनी मट्टू मामले के दोषी को दिल्ली हाईकोर्ट ने दिया निष्पक्ष व्यवहार का आश्वासन

दिल्ली हाईकोर्ट ने गुरुवार को टिप्पणी की कि सजा समीक्षा बोर्ड (SRB) हाई-प्रोफाइल दोषियों की समय पूर्व रिहाई का फैसला करते समय “जनता की धारणा” (Public Perception) और “आंखों पर पट्टी” बांधकर काम कर रहा है। 1996 के चर्चित प्रियदर्शिनी मट्टू बलात्कार और हत्या मामले में उम्रकैद की सजा काट रहे संतोष कुमार सिंह की याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस अनूप जे. भंभानी ने आश्वासन दिया कि उनके मामले में सामाजिक अलोकप्रियता के बजाय कानूनी तथ्यों के आधार पर “वस्तुनिष्ठ और निष्पक्ष” व्यवहार किया जाएगा।

हाईकोर्ट ने कहा कि इसमें कोई संदेह नहीं है कि अपराध जघन्य था और मृतक के परिवार ने एक अपूरणीय क्षति झेली है, लेकिन SRB द्वारा समय पूर्व रिहाई की याचिकाओं को बार-बार खारिज करना सुधार के सिद्धांतों की अनदेखी जैसा प्रतीत होता है।

जस्टिस भंभानी ने मौखिक रूप से कहा, “ऐसा लगता है कि SRB जनता की धारणा के आधार पर आगे बढ़ रहा है। आप एक बेहद अलोकप्रिय व्यक्ति हैं… SRB चीजों को ‘लेडी जस्टिस’ की तरह देख रहा है जैसा कि वह मूल रूप से आंखों पर पट्टी बांधे हुए थी। आपका नाम अच्छा नहीं लग रहा है, इसलिए मैं इसे खारिज कर रहा हूँ—बोर्ड का रवैया कुछ ऐसा ही दिखता है।”

जज ने आगे कहा कि यह कोई अकेला मामला नहीं है। हाईकोर्ट के पास ऐसे कई मामले लंबित हैं जहाँ SRB ने दोषियों द्वारा 30 या 40 साल की सजा काटने और रिहाई की सिफारिशें मिलने के बावजूद उनकी याचिकाओं को केवल अपराध की गंभीरता का हवाला देकर खारिज कर दिया है।

एक पूर्व आईपीएस अधिकारी के बेटे संतोष कुमार सिंह ने जनवरी 1996 में दिल्ली यूनिवर्सिटी की कानून की छात्रा, 25 वर्षीय प्रियदर्शिनी मट्टू के साथ बलात्कार कर उसकी हत्या कर दी थी। निचली अदालत ने 1999 में उसे बरी कर दिया था, लेकिन दिल्ली हाईकोर्ट ने 2006 में इस फैसले को पलटते हुए उसे दोषी ठहराया और मौत की सजा सुनाई। बाद में 2010 में सुप्रीम कोर्ट ने दोषसिद्धि को बरकरार रखा, लेकिन सजा को उम्रकैद में बदल दिया।

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सिंह की ओर से पेश सीनियर एडवोकेट मोहित माथुर ने तर्क दिया कि उनका मुवक्किल 31 साल से हिरासत में है। उन्होंने बताया कि जुलाई 2025 में हाईकोर्ट ने SRB के पुराने फैसले को रद्द करते हुए सिंह में “सुधार के तत्वों” का जिक्र किया था, इसके बावजूद बोर्ड ने 27 नवंबर 2025 को फिर से उसी आधार पर रिहाई की अर्जी खारिज कर दी। एडवोकेट माथुर ने यह भी कहा कि सिंह पिछले कई वर्षों से ओपन जेल में हैं और दिन के समय ट्रायल कोर्ट में वकालत का अभ्यास करते हैं, जिससे स्पष्ट है कि वे समाज के लिए खतरा नहीं हैं।

मट्टू के भाई के वकील ने सुनवाई की तारीख पहले करने की अर्जी का विरोध किया और अपराध की गंभीरता को दोहराया। हालांकि, जस्टिस भंभानी ने सवाल किया कि क्या जघन्य अपराध के नाम पर किसी को अनिश्चित काल के लिए जेल में रखा जा सकता है, जबकि न्याय व्यवस्था सुधार पर भी जोर देती है।

कोर्ट ने कहा, “मैं आपकी भावनाओं को समझता हूँ। उन्होंने जो किया वह अस्वीकार्य था और व्यवस्था ने उन्हें सजा दी है। अपराध जघन्य था, लेकिन हम क्या करें? क्या हम ऐसे ही एक आदमी को कैद करके रखें?”

बेंच ने 1995 के ‘तंदूर’ कांड का उदाहरण देते हुए कहा कि दोषी सुशील कुमार को 23 साल बाद रिहा कर दिया गया था। साथ ही जेसिका लाल हत्याकांड के दोषी की रिहाई का भी जिक्र किया गया। कोर्ट ने जोर देकर कहा, “सुधार (Reformation) नाम की भी कोई चीज होती है। 30 साल की हिरासत का भी महत्व है।”

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अदालत सिंह की उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी जिसमें 18 मई की तारीख को पहले करने की मांग की गई थी। इस मुद्दे की व्यापकता को देखते हुए, हाईकोर्ट ने सिंह की याचिका को इसी तरह के अन्य मामलों के साथ 20 अप्रैल के लिए सूचीबद्ध कर दिया है।

जस्टिस भंभानी ने याचिकाकर्ता को भरोसा दिलाते हुए कहा, “आपके साथ वस्तुनिष्ठ व्यवहार किया जाएगा। मैं कानूनी तथ्यों के आधार पर फैसला लूंगा।”

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