भोजशाला विवाद: हिंदू पक्ष ने कोर्ट में रखा 11वीं सदी के ग्रंथ ‘समरांगण सूत्रधार’ का हवाला; मंदिर होने का किया दावा

धार स्थित विवादित भोजशाला परिसर को लेकर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में चल रही कानूनी लड़ाई में बुधवार को एक नया मोड़ आया। याचिकाकर्ता ने तर्क दिया कि इस संरचना का निर्माण पूरी तरह से 11वीं सदी के राजा भोज द्वारा रचित वास्तुशिल्प ग्रंथ ‘समरांगण सूत्रधार’ के मानकों के अनुरूप है। याचिकाकर्ता का कहना है कि यह साक्ष्य, ऐतिहासिक दस्तावेजों के साथ मिलकर यह सिद्ध करता है कि यह स्थान मूल रूप से एक सरस्वती मंदिर और संस्कृत अध्ययन केंद्र था, इसलिए यहां केवल हिंदुओं को पूजा का अधिकार मिलना चाहिए।

इस मामले की सुनवाई हाईकोर्ट की इंदौर बेंच के जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की पीठ कर रही है। यह सुनवाई उन याचिकाओं के समूह का हिस्सा है जो इस संरक्षित स्मारक की धार्मिक प्रकृति को चुनौती देती हैं।

याचिकाकर्ता कुलदीप तिवारी की ओर से पेश वकील मनीष गुप्ता ने अपनी दलीलों का मुख्य आधार राजा भोज के ग्रंथ ‘समरांगण सूत्रधार’ को बनाया। यह ग्रंथ परमार काल के दौरान मंदिरों, महलों और नगरों के निर्माण की विशिष्ट वास्तुकला पर आधारित है।

गुप्ता ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की हालिया वैज्ञानिक सर्वेक्षण रिपोर्ट का हवाला देते हुए दावा किया कि परिसर के भीतर मिले साक्ष्य इस ग्रंथ के मानकों से मेल खाते हैं। उन्होंने बताया कि नींव के पत्थर और परिसर के केंद्र में स्थित ‘हवनकुंड’ की ईंटें एक ही भट्टी में बनी हैं, जो यह संकेत देती हैं कि ये संरचनाएं शुरुआत से ही वहां मौजूद थीं।

वकील ने अदालत में कहा, “हवनकुंड का निर्माण राजा भोज द्वारा निर्धारित मानकों के अनुसार किया गया था। इसी तरह, परिसर का प्रवेश द्वार और गर्भगृह भी 11वीं सदी के इन्हीं वास्तु नियमों का पालन करते हैं।”

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याचिकाकर्ता ने ऐतिहासिक ग्रंथों के हवाले से इस परिसर को ‘सरस्वती कंठाभरण’ या ‘शारदा सदन’ के रूप में संबोधित किया। उन्होंने 1908 के सरकारी गजट का उल्लेख करते हुए कहा कि यह स्थान प्राचीन काल से ही संस्कृत शिक्षा और विद्वानों के आदान-प्रदान का प्रमुख केंद्र रहा है।

कानूनी पक्ष रखते हुए उन्होंने तर्क दिया कि एक बार जहां मंदिर स्थापित हो जाता है, वह स्थान सदैव मंदिर ही रहता है। अपनी दलीलों को मजबूती देने के लिए उन्होंने राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का उदाहरण दिया, जिसमें ऐतिहासिक साहित्य और दस्तावेजों को कानूनी मान्यता दी गई थी।

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हिंदू पक्ष ने मुस्लिम पक्ष के दावों को खारिज करते हुए कहा कि इसे ‘कमल मौला मस्जिद’ कहना गलत है। याचिकाकर्ता के अनुसार, इस्लामिक शिक्षाओं के मुताबिक किसी स्थान पर जबरन कब्जा करके मस्जिद का निर्माण नहीं किया जा सकता। इसी आधार पर याचिकाकर्ता ने मांग की है कि भोजशाला में पूजा-अर्चना का पूर्ण अधिकार केवल हिंदू समुदाय को दिया जाए।

हाईकोर्ट में 6 अप्रैल से इन याचिकाओं पर नियमित सुनवाई हो रही है। फिलहाल हिंदू पक्ष की दलीलें सुनी जा रही हैं, जिसके बाद मुस्लिम पक्ष अपना प्रतिवाद पेश करेगा।

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