बॉम्बे हाईकोर्ट ने जेल नियमों में हाल के उन संशोधनों पर गंभीर संवैधानिक चिंता जताई है, जो मकोका (MCOCA) और पॉक्सो (POCSO) जैसे विशेष कानूनों के तहत सजा काट रहे कैदियों को फर्लो (furlough) देने पर पूर्ण प्रतिबंध लगाते हैं। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि इस तरह के प्रतिबंध कैदियों के मौलिक अधिकारों का हनन कर सकते हैं और न्याय प्रणाली के सुधारात्मक दृष्टिकोण को कमजोर करते हैं। मामले की गंभीरता को देखते हुए, हाईकोर्ट ने इस कानूनी सवाल को एक बड़ी बेंच (larger bench) के पास भेज दिया है।
यह आदेश 10 अप्रैल को नागपुर बेंच के जस्टिस अनिल पानसरे और जस्टिस निवेदिता मेहता ने रोहित तंगप्पा जोसेफ की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। जोसेफ, जो गैंगस्टर छोटा राजन का सहयोगी है, वरिष्ठ पत्रकार जे डे की 2011 में हुई हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा काट रहा है।
यह कानूनी विवाद तब शुरू हुआ जब अमरावती जेल अधिकारियों ने जोसेफ के 28 दिनों के फर्लो आवेदन को खारिज कर दिया। अधिकारियों ने महाराष्ट्र जेल (फर्लो और पैरोल) नियम में दिसंबर 2024 में हुए संशोधन का हवाला दिया। इस संशोधन के तहत मकोका, पॉक्सो और अन्य गंभीर अपराधों में दोषी ठहराए गए कैदियों को फर्लो देने पर पूरी तरह से रोक लगा दी गई है। जोसेफ ने इस निर्णय को मनमाना बताते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने उन कारणों पर सवाल उठाए जिनके आधार पर विशेष कानूनों के दोषियों को सामान्य सुधारात्मक प्रक्रिया से अलग रखा गया है। हाईकोर्ट ने कहा कि हालांकि फर्लो एक सशर्त विशेषाधिकार है, लेकिन केवल अपराध की प्रकृति के आधार पर पूर्ण प्रतिबंध लगाना तर्कसंगत नहीं है।
हाईकोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा, “फर्लो का उद्देश्य कैदियों को अपने परिवार के संपर्क में रहने और पारिवारिक मामलों को सुलझाने में मदद करना है। यह जेल की निरंतर कैद के हानिकारक प्रभाव से राहत देता है और कैदियों को अपने भविष्य के प्रति आशावादी बनाए रखने में मदद करता है।”
अदालत ने संगठित अपराध के मामलों में सूक्ष्म अंतर की आवश्यकता पर भी जोर दिया। हाईकोर्ट ने कहा कि एक सिंडिकेट में अलग-अलग सदस्य अलग-अलग भूमिकाएं निभाते हैं। “फर्लो की पात्रता तय करने के लिए उन सभी के साथ एक जैसा व्यवहार करना ‘असमानों के साथ समान व्यवहार’ करने जैसा होगा। यह व्यक्तियों के एक वर्ग के भीतर एक नया वर्ग बनाने जैसा है।”
हाईकोर्ट ने उस धारणा पर भी असंतोष जताया जिसके तहत यह मान लिया जाता है कि कुछ विशेष श्रेणियों के कैदियों को पारिवारिक संपर्क या कैद से राहत की आवश्यकता नहीं है। हाईकोर्ट ने कहा, “हमें ऐसा कोई तर्क नहीं दिखता कि क्यों किसी विशेष कानून के तहत दोषी होने मात्र से किसी कैदी को अपने परिवार के संपर्क में रहने या जीवन और भविष्य के प्रति आशावादी रहने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।”
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि किसी कैदी के जेल में व्यवहार या समाज की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए फर्लो रोका जाता है, तो वह उचित हो सकता है। लेकिन केवल इसलिए प्रतिबंध लगाना कि उसे किसी विशेष अधिनियम के तहत दोषी ठहराया गया है, फर्लो के मूल उद्देश्य को ही खत्म कर देता है।
इस मुद्दे पर पिछले विरोधाभासी फैसलों को देखते हुए, हाईकोर्ट ने मुख्य न्यायाधीश से इस मामले को एक बड़ी बेंच के समक्ष रखने का निर्देश दिया है ताकि यह तय किया जा सके कि क्या राज्य सरकार इस तरह से फर्लो देने से इनकार कर सकती है।
याचिकाकर्ता रोहित जोसेफ को पत्रकार जे डे की हत्या के मामले में छोटा राजन और सात अन्य के साथ दोषी पाया गया था। जे डे की 11 जून, 2011 को मुंबई के पवई इलाके में उनके घर के पास गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। अभियोजन पक्ष के अनुसार, छोटा राजन जे डे द्वारा लिखे गए लेखों से नाराज था और उसी के निर्देश पर इस हत्या को अंजाम दिया गया था।

