वकील फीस न मिलने पर अदालती कार्यवाही को नहीं रोक सकते; हाईकोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए वकीलों पर लगाया 50,000 रुपये का जुर्माना

केरल हाईकोर्ट ने दो वकीलों द्वारा दायर उस रिट याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें उन्होंने अपने पूर्व मुवक्किलों से फीस मिलने तक भूमि अधिग्रहण मुआवजे की कार्यवाही (Execution Proceedings) को रोकने की मांग की थी। हाईकोर्ट ने वकीलों के इस आचरण को ‘विनाशकारी’ (Pernicious) करार देते हुए स्पष्ट किया कि वकील का केस की फाइलों या कार्यवाही पर कोई ‘ग्रहणाधिकार’ (Lien) नहीं होता। कोर्ट ने यह भी कहा कि वकील अपनी फीस की मांग को लेकर कार्यवाही में बाधा डालकर मुवक्किलों को ब्लैकमेल नहीं कर सकते।

न्यायमूर्ति बेचु कुरियन थॉमस ने याचिका खारिज करते हुए याचिकाकर्ता वकीलों पर 50,000 रुपये का जुर्माना लगाया। कोर्ट ने टिप्पणी की कि वकालत एक नेक पेशा है और इसके सदस्यों को अपने पूर्व मुवक्किलों के हितों के खिलाफ काम करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

मामले की पृष्ठभूमि

याचिकाकर्ता, मैरी हेल्प जॉन डेविड जे. और के.वी. कृष्णकुमार, पेशेवर वकील हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि वे साल 2004 से भूमि अधिग्रहण के एक मामले (LAR No. 302/1988) में मुवक्किलों (प्रतिवादी 4 और 5) का पक्ष रख रहे थे। याचिकाकर्ताओं के अनुसार, कोर्ट द्वारा मुआवजा तय किए जाने के बाद इसकी वसूली के लिए याचिका (E.P. No. 140/2013) दायर की गई थी।

विवाद तब शुरू हुआ जब सरकार ने मुआवजे की पहली किस्त जमा की। वकीलों का दावा है कि मुवक्किलों ने उनसे तैयार किए गए चेक आवेदन पत्र तो ले लिए, लेकिन बाद में बिना ‘अनापत्ति प्रमाण पत्र’ (NOC) लिए नए वकीलों (प्रतिवादी 1 और 2) के माध्यम से उन्हें कोर्ट में जमा कर दिया। याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट से मांग की थी कि नए वकीलों की नियुक्ति को अवैध घोषित किया जाए और फीस का फैसला होने तक कार्यवाही पर यथास्थिति (Status Quo) बनाए रखी जाए।

पक्षों की दलीलें

याचिकाकर्ता वकीलों ने तर्क दिया कि नए वकीलों ने बिना NOC के वकालतनामा दाखिल करके ‘धोखाधड़ी’ की है। उन्होंने कहा कि उन्हें फीस वसूली के लिए सिविल कोर्ट जाने को मजबूर करना ‘अनैतिक’ है और यह उनकी दो दशकों की मेहनत को ‘लूटने’ जैसा है।

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नए वकीलों (प्रतिवादी 1 और 2) ने अपने हलफनामे में कहा कि मुवक्किलों का याचिकाकर्ताओं से भरोसा उठ गया था। उन्होंने दलील दी कि एक मुवक्किल के पास अपना वकील बदलने का पूर्ण अधिकार है और फीस से जुड़े विवादों को अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट में नहीं लाया जा सकता।

मुवक्किलों (प्रतिवादी 4 और 5) ने दावा किया कि वे पहले ही पहले याचिकाकर्ता को 25,00,000 रुपये से अधिक की फीस दे चुके हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि वकील ने बाद में एक करोड़ रुपये की अतिरिक्त अवैध मांग शुरू कर दी और पैसे न देने पर केस की कार्यवाही रोकने की धमकी देकर उन्हें प्रताड़ित किया, जिसके कारण उन्हें नए वकील करने पड़े।

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हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियां

हाईकोर्ट ने अवलोकन किया कि हालांकि वकील अपनी मेहनत के लिए उचित पारिश्रमिक का हकदार है, लेकिन किसी निजी मुवक्किल के साथ फीस का विवाद अनुच्छेद 226 के तहत विचारणीय नहीं है। इसके लिए वकील को सक्षम सिविल कोर्ट का दरवाजा खटखटाना चाहिए।

न्यायमूर्ति बेचु कुरियन थॉमस ने पेशेवर नैतिकता पर महत्वपूर्ण टिप्पणियां कीं:

  • कार्यवाही रोकने पर: “किसी वकील को अपनी फीस के निपटारे तक कानूनी कार्यवाही को रोकने का कोई अधिकार नहीं है… वकील का केस की फाइलों या कार्यवाही पर कोई ग्रहणाधिकार (Lien) नहीं होता।”
  • पेशेवर आचरण पर: “ऐसी स्थिति कभी पैदा नहीं होनी चाहिए जहां मुवक्किल को मजबूर किया जाए या वकील द्वारा मांगी गई फीस का भुगतान करने के लिए उसे ब्लैकमेल किया जाए।”
  • फिडुशियरी ड्यूटी (विश्वास आधारित कर्तव्य) पर: कोर्ट ने कहा कि वकील और मुवक्किल का रिश्ता ‘अत्यंत विश्वास’ पर आधारित होता है। कोर्ट के अनुसार, “वकालतनामा खत्म होने के बाद भी वकील को अपने पूर्व मुवक्किल के हितों के विरुद्ध कार्य करने की अनुमति नहीं दी जा सकती।”

कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के आर.डी. सक्सेना बनाम बलराम प्रसाद शर्मा [(2000) 7 SCC 264] मामले का हवाला देते हुए जोर दिया कि यदि मुवक्किल को लगता है कि वकील का आचरण उसके हितों के खिलाफ है, तो उसे वकील बदलने की पूरी आजादी है।

बिना NOC के वकील बदलने के मुद्दे पर कोर्ट ने केरल सिविल रूल्स ऑफ प्रैक्टिस के नियम 28 का उल्लेख किया, जिसके तहत यदि पुराना वकील सहमति देने से इनकार करता है, तो मुवक्किल कोर्ट की विशेष अनुमति से नया वकील नियुक्त कर सकता है।

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कोर्ट का निर्णय

हाईकोर्ट ने याचिका को योग्यताहीन पाया और इस बात पर गहरी चिंता व्यक्त की कि कानून के पेशे से जुड़े दो सदस्यों ने लगभग दस महीनों तक हकदार मुवक्किलों के मुआवजे के वितरण को रोके रखा।

कोर्ट ने रिट याचिका को 50,000 रुपये के जुर्माने के साथ खारिज कर दिया। याचिकाकर्ताओं को यह राशि छह सप्ताह के भीतर केरल राज्य कानूनी सेवा प्राधिकरण (KEA) में जमा करने का आदेश दिया गया है।

केस का विवरण

  • केस टाइटल: मैरी हेल्प जॉन डेविड जे. एवं अन्य बनाम जे.वी. अनूप एवं अन्य
  • केस नंबर: डब्ल्यू.पी.(सी) नंबर 28533/2025
  • बेंच: न्यायमूर्ति बेचु कुरियन थॉमस
  • तारीख: 08 अप्रैल, 2026

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