तेजाब हमले की साजिश पर इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त; याचिका खारिज, यूपी के डीजीपी को दी चेतावनी

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने संपत्ति विवाद को लेकर तेजाब हमले (ऐसिड अटैक) की “कायराना साजिश” से जुड़ी एक एफआईआर (FIR) को रद्द करने की याचिका खारिज कर दी है। मामले की गंभीरता को देखते हुए कोर्ट ने जांच में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। इसके साथ ही, मेडिकल रिपोर्ट पेश करने में पुलिस की ओर से होने वाली देरी पर कोर्ट ने उत्तर प्रदेश पुलिस विभाग के प्रति अपनी “अत्यधिक नाराजगी” जाहिर की है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि व्यवस्था में तुरंत सुधार नहीं हुआ, तो राज्य के पुलिस महानिदेशक (DGP) को तलब किया जा सकता है।

यह आदेश जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस विनय कुमार द्विवेदी की खंडपीठ ने ७ अप्रैल को अरुण शुक्ला द्वारा दायर एक आपराधिक रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया।

यह पूरा मामला प्रयागराज में ६ दिसंबर २०२५ को दर्ज हुई एक एफआईआर से संबंधित है। याचिकाकर्ता अरुण शुक्ला और दो अन्य पर तेजाब हमले की योजना बनाने का आरोप है। अभियोजन पक्ष के अनुसार, इस हमले की साजिश के पीछे की मुख्य वजह एक पुराना संपत्ति विवाद था। शुक्ला ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाकर इस एफआईआर को रद्द करने और अपने खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही पर रोक लगाने की मांग की थी।

एफआईआर का अवलोकन करने के बाद हाईकोर्ट ने आरोपों की प्रकृति को बेहद गंभीर माना। कोर्ट ने कहा कि दस्तावेजों से स्पष्ट है कि तेजाब को हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की एक सोची-समझी और “कायराना साजिश” रची गई थी।

तेजाब हमलों से होने वाले घातक परिणामों का उल्लेख करते हुए बेंच ने कहा:

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“तेजाब को अपराध के हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की अत्यधिक गंभीरता को देखते हुए, इस मामले में गहन जांच की आवश्यकता है।”

कोर्ट ने माना कि तेजाब हमले अपूरणीय क्षति पहुंचाते हैं, इसलिए इस स्तर पर एफआईआर को रद्द करने के लिए अपने असाधारण अधिकार क्षेत्र का उपयोग करना उचित नहीं होगा।

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पुलिस विभाग की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए। कोर्ट इस बात से नाराज था कि पुलिस समय पर इंजरी रिपोर्ट (चोट की रिपोर्ट) उपलब्ध नहीं करा रही है, जिसके कारण छोटी-छोटी कागजी औपचारिकताओं के लिए बार-बार इंस्पेक्टरों और कप्तानों को बुलाना पड़ता है।

कोर्ट ने सख्त लहजे में कहा:

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“हम केवल इंजरी रिपोर्ट की समय पर आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए विभिन्न जिलों के इंस्पेक्टरों और पुलिस अधीक्षकों को बुलाना जारी नहीं रख सकते।”

हाईकोर्ट ने चेतावनी दी कि यदि इस स्थिति में तुरंत सुधार नहीं हुआ, तो वे पुलिस महानिदेशक (DGP), उत्तर प्रदेश या अपर मुख्य सचिव (गृह) को व्यक्तिगत रूप से अदालत में पेश होने के लिए मजबूर होंगे।

कोर्ट ने माना कि आरोपों की गंभीरता को देखते हुए पुलिस जांच अनिवार्य है। इसी आधार पर याचिका को खारिज कर दिया गया और पुलिस को अपनी जांच जारी रखने की अनुमति दी गई।

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