दहेज हत्या के मामले में देवर को मिली जमानत; इलाहाबाद हाईकोर्ट ने ‘ओवर-इम्प्लीकेशन’ और अलग निवास के दावों पर गौर किया

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दहेज हत्या के एक मामले में आरोपी देवर को जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया है। कोर्ट ने मामले की सुनवाई के दौरान पाया कि एफआईआर में मृतक व्यक्ति समेत 17 लोगों को नामजद करना ‘ओवर-इम्प्लीकेशन’ (बढ़ा-चढ़ाकर फंसाना) का संकेत देता है। इसके साथ ही कोर्ट ने आरोपी के अलग रहने के दावों को भी प्रथम दृष्टया विचारणीय माना।

जस्टिस समीर जैन ने मोसिम उर्फ मोहसिन की जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया। आरोपी के खिलाफ अलीगढ़ के थाना हरदुआगंज में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 85, 80(2), 115(2), 351(2) और दहेज निषेध अधिनियम की धारा 3/4 के तहत मामला दर्ज है।

मामले का विवरण

केस क्राइम नंबर 312/2025 के अनुसार, आवेदक की भाभी की शादी के दो साल के भीतर ही ससुराल में गला घोंटने से मृत्यु हो गई थी। आरोप था कि 2 लाख रुपये और बुलेट मोटरसाइकिल की मांग को लेकर उसे प्रताड़ित किया जा रहा था। इस मामले में आवेदक, जो मृतका का देवर है, 19 सितंबर 2025 से जेल में बंद था।

पक्षों की दलीलें

आवेदक की वकील सुश्री शबिस्ता परवीन ने तर्क दिया कि आवेदक को केवल सामान्य आरोपों के आधार पर आरोपी बनाया गया है। उन्होंने कोर्ट को बताया कि हालांकि मृत्यु ससुराल में हुई, लेकिन आवेदक अपने परिवार से अलग रहता था। साक्ष्य के रूप में एक रेंट एग्रीमेंट पेश किया गया, जिसमें दर्शाया गया कि वह इमरान नामक व्यक्ति के घर में किराए पर रहता था।

बचाव पक्ष ने विशेष रूप से ध्यान दिलाया कि एफआईआर में कुल 17 लोगों को नामजद किया गया था। इनमें आवेदक के पिता अलाउद्दीन का नाम भी शामिल था, जिनकी मृत्यु एफआईआर दर्ज होने से काफी पहले 22 जुलाई 2025 को ही हो चुकी थी। वकील ने कहा कि एक मृत व्यक्ति को नामजद करना यह दर्शाता है कि एफआईआर झूठे आरोपों पर आधारित है। यह भी बताया गया कि जांच के बाद केवल दो लोगों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई है।

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राज्य की ओर से एजीए और वादी के वरिष्ठ अधिवक्ता ने जमानत का विरोध किया। उन्होंने दलील दी कि यह गला घोंटकर की गई हत्या का मामला है। उन्होंने रेंट एग्रीमेंट की विश्वसनीयता पर सवाल उठाते हुए कहा कि इसे बाद में तैयार किया गया है और आवेदक वास्तव में मृतका के साथ ही रहता था। हालांकि, उन्होंने इस तथ्य को स्वीकार किया कि एफआईआर में एक मृत व्यक्ति को भी आरोपी बनाया गया है।

कोर्ट का विश्लेषण

कोर्ट ने अपने आदेश में उल्लेख किया कि हालांकि यह शादी के दो साल के भीतर संदिग्ध परिस्थितियों में हुई मौत का मामला है, लेकिन आवेदक देवर है और उसके खिलाफ कोई विशिष्ट आरोप नहीं हैं।

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अलग रहने के दावे पर कोर्ट ने टिप्पणी की:

“इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि आवेदक अलग रहता था, आवेदक के वकील द्वारा दी गई इस दलील को खारिज नहीं किया जा सकता कि उसका मृतका के पारिवारिक मामलों से कोई लेना-देना नहीं था।”

एफआईआर में 17 लोगों को नामजद करने और मृत व्यक्ति को शामिल करने पर कोर्ट ने कहा:

“ऐसा प्रतीत होता है कि यह ‘ओवर-इम्प्लीकेशन’ (जरूरत से ज्यादा लोगों को फंसाना) का मामला हो सकता है, जिससे इस स्तर पर इनकार नहीं किया जा सकता।”

कोर्ट ने कानूनी सिद्धांत को दोहराते हुए कहा:

“कानून यह स्थापित है कि जब तक दोष सिद्ध न हो जाए, तब तक अभियुक्त को निर्दोष माना जाता है और जमानत याचिका को दंडात्मक या निवारक उद्देश्य के लिए खारिज नहीं किया जाना चाहिए।”

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कोर्ट का निर्णय

मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर विचार करने के बाद, जस्टिस समीर जैन ने आवेदक को जमानत पर रिहा करने का आदेश दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ये टिप्पणियां केवल जमानत के निपटारे तक सीमित हैं और ट्रायल के दौरान केस के मेरिट पर इनका कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। आवेदक को व्यक्तिगत बांड और दो प्रतिभूतियों के साथ इस शर्त पर रिहा किया गया कि वह साक्ष्यों के साथ छेड़छाड़ नहीं करेगा और ट्रायल कोर्ट में नियमित रूप से उपस्थित रहेगा।

केस विवरण

केस का शीर्षक: मोसिम उर्फ मोहसिन बनाम उत्तर प्रदेश राज्य

केस संख्या: क्रिमिनल मिसलेनियस बेल एप्लीकेशन संख्या 3426 ऑफ 2026

पीठ: जस्टिस समीर जैन

दिनांक: 7 अप्रैल, 2026

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