ऋण वसूली के लिए मुकदमे की शुरुआत पर भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 214 की कोई रोक नहीं: आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट

आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 की धारा 214 कानूनी वारिसों द्वारा ऋण वसूली के लिए मुकदमा दायर करने या उसके ट्रायल पर रोक नहीं लगाती है। कोर्ट ने कहा कि यह धारा केवल उत्तराधिकार प्रमाणपत्र (Succession Certificate) के बिना डिक्री पारित करने पर रोक लगाती है। जस्टिस रवि नाथ तिलहरी ने एक सिविल रिवीज़न पिटीशन को खारिज करते हुए यह भी स्पष्ट किया कि लिमिटेशन एक्ट के अनुच्छेद 62 के तहत बंधक (Mortgage) मुकदमों के लिए 12 साल की समय-सीमा उस तारीख से शुरू होती है जब पैसा “देय” (due) हो जाता है, न कि अनिवार्य रूप से विलेख के निष्पादन की तारीख से।

मामले की पृष्ठभूमि

यह मामला मुत्ता लक्ष्मी नरसम्मा और तीन अन्य (प्रतिवादी/वादी) द्वारा जी. छाया पद्मिनी (याचिकाकर्ता/प्रतिवादी) के खिलाफ दायर एक मुकदमे (O.S. No. 1225 of 2017) से जुड़ा है। वादी, स्वर्गीय मुत्ता पादिराजू के कानूनी वारिस के रूप में, 26 फरवरी, 2004 के एक बंधक विलेख (Mortgage Deed) के आधार पर धन के भुगतान के लिए डिक्री की मांग कर रहे थे।

याचिकाकर्ता ने सीपीसी के आदेश VII नियम 11 (a) और (d) के तहत वाद पत्र (Plaint) को खारिज करने के लिए एक आवेदन (I.A. No. 565 of 2022) दायर किया था। उनका तर्क था कि भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 214 के तहत यह मुकदमा वर्जित है क्योंकि वादियों ने उत्तराधिकार प्रमाणपत्र प्राप्त नहीं किया था। इसके अतिरिक्त, उन्होंने तर्क दिया कि मुकदमा 2017 में दायर किया गया था, जो कि 2004 में निष्पादित बंधक विलेख के 12 साल बाद होने के कारण समय-बाधित (barred by limitation) था। ट्रायल कोर्ट ने 15 जुलाई, 2025 को इस आवेदन को खारिज कर दिया, जिसके बाद यह रिवीज़न याचिका हाईकोर्ट में आई।

पक्षों के तर्क

याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि मृतक के पक्ष में निष्पादित बंधक विलेख के आधार पर वसूली का मुकदमा शुरू करने के लिए उत्तराधिकार प्रमाणपत्र एक अनिवार्य शर्त थी। लिमिटेशन के मुद्दे पर वकील ने तर्क दिया कि चूंकि विलेख 2004 में लिखा गया था और मुकदमा 2017 में दायर हुआ, इसलिए यह स्पष्ट रूप से समय-बाधित है।

प्रतिवादियों (वादियों) ने तर्क दिया कि हालांकि विलेख 2004 में निष्पादित किया गया था, लेकिन इसमें भुगतान के लिए दो साल की अवधि दी गई थी। इस प्रकार, पैसा केवल 25 फरवरी, 2006 को “देय” हुआ, जिससे अक्टूबर 2017 में दायर किया गया मुकदमा 12 साल की सीमा के भीतर आता है। उन्होंने यह भी कहा कि मुकदमा दायर करने के लिए उत्तराधिकार प्रमाणपत्र की कोई पूर्व-आवश्यकता नहीं है।

READ ALSO  क्या पूर्ण न्यायालय के प्रस्ताव के रूप में कार्यकारी निर्देश अनुच्छेद 234/309 के तहत बनाए गए वैधानिक नियमों को रद्द कर सकते हैं? सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया 

हाईकोर्ट का विश्लेषण और टिप्पणियाँ

भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 214 पर

हाईकोर्ट ने धारा 214 की वैधानिक भाषा की जांच की और कहा:

“भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 214 का अवलोकन स्पष्ट करता है कि इसके तहत रोक मुकदमे की शुरुआत (institution) पर नहीं है, बल्कि (a) डिक्री पारित करने और (b) डिक्री के निष्पादन पर है। इसलिए धारा 214 कानूनी वारिसों या प्रतिनिधियों द्वारा देनदार के खिलाफ मुकदमा दायर करने से नहीं रोकती है।”

READ ALSO  मणिपुर हिंसा: सुप्रीम कोर्ट ने महिला वकील को दी गई गिरफ्तारी से छूट की अवधि 4 सप्ताह और बढ़ा दी

हाईकोर्ट ने जोर देकर कहा कि उत्तराधिकार प्रमाणपत्र प्रस्तुत करना मुकदमे को बनाए रखने या उसके ट्रायल के लिए कोई पूर्व शर्त नहीं है। यह केवल अदालत को “डिक्री पारित करने” से रोकता है। बॉम्बे हाईकोर्ट के वीरभद्रप्पा शिलवंत शॉप बनाम शेकाबाई मामले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि डिक्री पारित होने से पहले किसी भी समय प्रमाणपत्र पेश किया जा सकता है।

इसके अलावा, कोर्ट ने नोट किया कि याचिकाकर्ता (प्रतिवादी) ने स्वयं अपने लिखित बयान में स्वीकार किया था कि वादी ही मृतक के कानूनी वारिस हैं।

“ऐसे स्वीकृत तथ्यों पर, उत्तराधिकार प्रमाणपत्र के रूप में किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं थी। इसलिए इस आधार पर भी वाद पत्र आदेश VII नियम 11 सीपीसी के तहत खारिज किए जाने योग्य नहीं था।”

लिमिटेशन और अनुच्छेद 62 पर

लिमिटेशन के बिंदु पर जस्टिस तिलहरी ने लिमिटेशन एक्ट के अनुच्छेद 62 का विश्लेषण किया, जो 12 साल की अवधि निर्धारित करता है जो “जब दावा किया गया पैसा देय हो जाता है” से शुरू होती है।

READ ALSO  सुप्रीम कोर्ट ने जेलों में भेदभाव विरोधी उपायों पर रिपोर्ट देने के लिए राज्यों को दो सप्ताह की समय सीमा तय की

हाईकोर्ट ने पाया कि बंधक विलेख में स्पष्ट रूप से देनदारियों के निपटान के लिए दो साल की अवधि दी गई थी।

“वह दो साल की अवधि 25.02.2006 को समाप्त हुई। इसके बाद 12 साल की लिमिटेशन अवधि उस तारीख से शुरू हुई। मुकदमा 11.10.2017 को दायर किया गया था, जो 25.02.2018 तक उपलब्ध लिमिटेशन की अवधि के भीतर है।”

कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट की फुल बेंच के मोहम्मद हुसैन बनाम अनवर दास (1934) और प्रेम चंद बनाम मोहम्मद सईद (1981) के फैसलों का उल्लेख करते हुए पुष्टि की कि लिमिटेशन केवल विलेख में निर्धारित अवधि की समाप्ति के बाद ही शुरू होती है।

निर्णय

हाईकोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि मुकदमा न तो भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 214 के तहत और न ही लिमिटेशन के कानून के तहत वर्जित है। ट्रायल कोर्ट के आदेश में कोई अवैधता न पाते हुए, हाईकोर्ट ने सिविल रिवीज़न पिटीशन को खारिज कर दिया।

मामले का विवरण:

  • केस टाइटल: जी. छाया पद्मिनी बनाम मुत्ता लक्ष्मी नरसम्मा और 3 अन्य
  • केस नंबर: सिविल रिवीज़न पिटीशन नंबर 2425/2025
  • पीठ: जस्टिस रवि नाथ तिलहरी
  • दिनांक: 10 अप्रैल, 2026

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles