को-ऑपरेटिव बाय-लॉज में चुनाव हेतु भागीदारी-आधारित पात्रता मानदंड वैध; सार्वजनिक कर्तव्य के अभाव में समितियों के विरुद्ध रिट याचिका विचारणीय नहीं: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया है कि जिला दुग्ध उत्पादक सहकारी संघ (District Milk Producers’ Co-operative Unions) संविधान के अनुच्छेद 12 के तहत ‘राज्य’ या उसकी इकाइयों की परिभाषा में नहीं आते हैं। जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने कहा कि ऐसी समितियों के आंतरिक चुनावी बाय-लॉज को चुनौती देने वाली रिट याचिकाएं अनुच्छेद 226 के तहत सुनवाई योग्य नहीं हैं, विशेष रूप से तब जब राजस्थान सहकारी समिति अधिनियम, 2001 के तहत विवाद समाधान के लिए एक पूर्ण वैधानिक तंत्र मौजूद हो।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद राजस्थान हाईकोर्ट के 2015 के एक फैसले से उत्पन्न हुआ था, जिसमें विभिन्न जिला दुग्ध उत्पादक सहकारी संघों द्वारा बनाए गए बाय-लॉज 20.1(2), 20.1(4), 20.2(7), और 20.2(9) को रद्द कर दिया गया था। इन नियमों के माध्यम से जिला संघों के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स के चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों के लिए कुछ पात्रता शर्तें अनिवार्य की गई थीं।

इन शर्तों के अनुसार, उम्मीदवार द्वारा प्रतिनिधित्व की जाने वाली प्राथमिक समिति पिछले एक वर्ष में 90 दिनों से अधिक बंद नहीं होनी चाहिए थी, उसने कम से कम 270 दिनों तक दूध की आपूर्ति की हो और दूध की आपूर्ति की न्यूनतम मात्रा भी निर्धारित की गई थी। हाईकोर्ट के सिंगल जज और बाद में डिवीजन बेंच ने इन प्रावधानों को मूल अधिनियम के बाहर माना था और इन्हें ‘अतिरिक्त अयोग्यता’ करार दिया था। इसके विरुद्ध संघों के अध्यक्षों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने तर्क दिया कि जिला दुग्ध संघ स्वायत्त निजी निकाय हैं और अनुच्छेद 12 के तहत ‘राज्य’ नहीं हैं। उन्होंने दलील दी कि हाईकोर्ट ने रिट याचिकाओं पर सुनवाई करके गलती की है क्योंकि इसमें कोई “सार्वजनिक कानून तत्व” (public law element) शामिल नहीं था और अधिनियम के तहत रजिस्ट्रार के पास वैकल्पिक उपाय मौजूद थे। मेरिट पर उन्होंने “वोट देने के अधिकार” और “चुनाव लड़ने के अधिकार” के बीच अंतर स्पष्ट करते हुए कहा कि चुनाव लड़ना एक वैधानिक अधिकार है जिसे सक्रिय भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए पात्रता शर्तों के अधीन रखा जा सकता है।

राजस्थान राज्य ने भी अपीलकर्ताओं का समर्थन किया और कहा कि बाय-लॉज अधिनियम की धारा 8 और अनुसूची B के तहत मिली शक्तियों के प्रयोग में बनाए गए थे। राज्य का तर्क था कि प्रबंधन में केवल उन्हीं समितियों का प्रतिनिधित्व होना चाहिए जो वास्तव में सक्रिय हैं और निरंतर दूध की आपूर्ति कर रही हैं।

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कोर्ट का विश्लेषण

सुप्रीम कोर्ट ने सबसे पहले रिट याचिकाओं की विचारणीयता (maintainability) पर ध्यान केंद्रित किया और पाया कि हाईकोर्ट ने अधिकार क्षेत्र के मूलभूत प्रश्नों को नजरअंदाज किया।

1. रिट क्षेत्राधिकार की स्वीकार्यता: कोर्ट ने अजय हासिया और थलाप्पलम सर्विस को-ऑपरेटिव बैंक लिमिटेड बनाम केरल राज्य के मामलों का संदर्भ देते हुए कहा कि सहकारी समितियां राज्य की साधन मात्र नहीं हैं। पीठ ने टिप्पणी की:

“सहकारी समितियों पर कानून के तहत केवल पर्यवेक्षी या सामान्य विनियमन होने मात्र से उनकी गतिविधियां राज्य के नियंत्रण के अधीन नहीं हो जातीं, जिससे उन्हें अनुच्छेद 12 के तहत ‘राज्य’ माना जा सके।”

2. वोट देने का अधिकार बनाम चुनाव लड़ने का अधिकार: पीठ ने हाईकोर्ट द्वारा इन दोनों अधिकारों को एक समान मानने को “स्पष्ट त्रुटि” कहा। ज्योति बसु बनाम देबी घोषाल का जिक्र करते हुए कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इनमें से कोई भी मौलिक अधिकार नहीं है।

“हाईकोर्ट ने चुनाव लड़ने की पात्रता को वोट देने के अधिकार पर प्रतिबंध के रूप में देखकर दो अलग-अलग वैधानिक अधिकारों को आपस में मिला दिया और जांच का गलत मानक लागू किया।”

3. पात्रता बनाम अयोग्यता: कोर्ट ने ‘अयोग्यता’ (धारा 28 के तहत वैधानिक बाधाएं) और ‘पात्रता’ (भागीदारी की न्यूनतम शर्तें) के बीच अंतर बताया। कोर्ट ने माना कि दूध की आपूर्ति और निरंतर संचालन की शर्तें सकारात्मक और प्रदर्शन-आधारित मानदंड हैं जो जवाबदेह शासन सुनिश्चित करते हैं।

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“पात्रता के अभाव का कोई दंडात्मक परिणाम नहीं होता; यह केवल तब तक चुनाव लड़ने के अधिकार को टाल देता है जब तक निर्धारित शर्तें पूरी नहीं हो जातीं।”

कोर्ट का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेशों को कानूनन अस्थिर मानते हुए उन्हें रद्द कर दिया। पीठ ने यह भी कहा कि हाईकोर्ट ने उन समितियों को सुने बिना, जो मूल मामले में पक्षकार नहीं थीं, बाय-लॉज को पूरी तरह रद्द करके प्रक्रियात्मक गलती की है।

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“उक्त बाय-लॉज न तो किसी मौलिक या वैधानिक अधिकार को कम करते हैं और न ही अधिनियम से इतर कोई नई अयोग्यता पेश करते हैं।”

कोर्ट ने अपील स्वीकार की और भागीदारी-आधारित पात्रता मानदंडों की वैधता को बरकरार रखा।

केस विवरण:

  • केस टाइटल: राम चंद्र चौधरी एवं अन्य बनाम रूप नगर दुग्ध उत्पादक सहकारी समिति लिमिटेड एवं अन्य
  • केस नंबर: सिविल अपील संख्या 4352, 2026
  • पीठ: जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन
  • दिनांक: 10 अप्रैल, 2026

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