सेकंड अपील में तथ्यों की दोबारा समीक्षा नहीं; सुप्रीम कोर्ट ने मुकदमे के दौरान हुए भूमि हस्तांतरण को ‘शून्य’ करार दिया

सुप्रीम कोर्ट ने ‘रुसी फिशरीज प्रा. लि. बनाम भावना सेठ’ (सिविल अपील संख्या 109/2010) के मामले में विक्रेता की अपील को खारिज करते हुए 1988 के ‘एग्रीमेंट टू सेल’ के पक्ष में डिक्री को बरकरार रखा है। जस्टिस पंकज मिथल और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने स्पष्ट किया कि यदि प्रथम अपीलीय न्यायालय द्वारा दर्ज किए गए तथ्य तर्कसंगत हैं, तो सेकंड अपील में हाईकोर्ट उनमें हस्तक्षेप नहीं कर सकता।

मामले की पृष्ठभूमि

यह विवाद 18 जुलाई, 1988 को हुए एक अपंजीकृत बिक्री समझौते से शुरू हुआ था। अनिल किशोर सेठ (अब उनके वारिस) ने रुसी फिशरीज प्रा. लि. से ₹15,41,000/- में कृषि भूमि खरीदने का समझौता किया था। शर्तों के अनुसार, सेल डीड 15 दिसंबर 1988 तक निष्पादित होनी थी, जिसकी अवधि बाद में 30 जून 1989 तक बढ़ा दी गई। क्रेता का दावा था कि उन्होंने ₹2,75,000/- चेक से और ₹5,00,000/- नकद (कंपनी के प्रबंध निदेशक के बेटे को) दिए थे।

ट्रायल कोर्ट ने 10 दिसंबर 1999 को यह कहते हुए मुकदमा खारिज कर दिया था कि क्रेता अपनी तत्परता (Readiness and Willingness) साबित नहीं कर सका। हालांकि, प्रथम अपीलीय न्यायालय ने 23 अप्रैल 2003 को इस फैसले को उलट दिया और माना कि क्रेता ने ₹7,75,000/- का भुगतान किया था और वह सौदा पूरा करने के लिए तैयार था। इस निर्णय को बाद में हाईकोर्ट ने सेकंड अपील में भी सही ठहराया।

पक्षों की दलीलें

अपीलकर्ता (विक्रेता) के लिए: वरिष्ठ वकील श्री के. परमेश्वर ने तर्क दिया कि 15 साल बाद ‘स्पेसिफिक परफॉरमेंस’ की राहत देना अनुचित है क्योंकि जमीन की कीमतें अत्यधिक बढ़ चुकी हैं। उन्होंने अन्य दलीलें भी दीं:

  • मूल वादी (क्रेता) ने जीवित रहते हुए खुद गवाही नहीं दी।
  • प्रबंध निदेशक के बेटे को दिए गए नकद भुगतान के लिए कंपनी उत्तरदायी नहीं है क्योंकि उसके पास पैसे लेने का अधिकार नहीं था।
  • इस बात का कोई सबूत नहीं है कि क्रेता तय तारीख पर रजिस्ट्रार कार्यालय पहुंचा था।
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प्रतिवादी (क्रेता) के लिए: वरिष्ठ वकील श्री पवनजीत सिंह बिंद्रा ने दलील दी कि समझौते पर दोनों पक्षों के हस्ताक्षर हैं और नकद भुगतान की रसीदें हैंडराइटिंग एक्सपर्ट द्वारा सिद्ध की जा चुकी हैं। उन्होंने कहा:

  • क्रेता ने जून 1989 में दो नोटिस भेजे थे और रजिस्ट्रार कार्यालय में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई थी।
  • वादी की व्यक्तिगत गवाही की अनुपस्थिति घातक नहीं है क्योंकि उनके मैनेजर (PW-4) ने, जिन्हें पूरी जानकारी थी, गवाही दी है।
  • प्रथम अपीलीय न्यायालय की डिक्री के आधार पर 8 जनवरी 2010 को पहले ही सेल डीड निष्पादित की जा चुकी है।

न्यायालय का विश्लेषण और टिप्पणियां

सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में प्रमुख कानूनी पहलुओं पर गौर किया:

1. सेकंड अपील का दायरा (सीपीसी की धारा 100): कोर्ट ने दोहराया कि प्रथम अपीलीय न्यायालय द्वारा दर्ज तथ्यों की निष्कर्षों को सेकंड अपील में तब तक नहीं बदला जा सकता जब तक कि वे पूरी तरह से गलत (Perverse) न हों। भोलाराम बनाम अमीरचंद (1981) का हवाला देते हुए पीठ ने कहा:

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“यह कानूनन स्थापित है कि तथ्यों के निष्कर्ष, चाहे वे कितने भी त्रुटिपूर्ण क्यों न हों, उन्हें सेकंड अपील में तब तक नहीं छेड़ा जा सकता जब तक कि कोई ठोस कानूनी प्रश्न (Substantial Question of Law) उत्पन्न न हो।”

2. वादी की गवाही न होना: अपीलकर्ता की इस दलील पर कि वादी खुद गवाह के रूप में पेश नहीं हुआ, कोर्ट ने विद्याधर बनाम माणिकराव (1999) का उल्लेख किया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वादी की अनुपस्थिति में प्रतिकूल धारणा (Adverse Inference) बनाई जा सकती है, लेकिन इसे अन्य सबूतों से काटा जा सकता है। राजेश कुमार बनाम आनंद कुमार (2024) का संदर्भ देते हुए कोर्ट ने कहा:

“एक पावर ऑफ अटॉर्नी धारक या मैनेजर उन कृत्यों के बारे में गवाही दे सकता है जो उसकी व्यक्तिगत जानकारी में हैं… मैनेजर (PW-4) की गवाही को खारिज नहीं किया जा सकता क्योंकि उसे पूरे लेनदेन की व्यक्तिगत जानकारी थी।”

3. लिस पेंडेंस का सिद्धांत (टीपी एक्ट की धारा 52): विक्रेताओं ने मुकदमे के लंबित रहने के दौरान 2009 और 2025 में जमीन के कुछ हिस्से तीसरे पक्षों को बेच दिए थे। कोर्ट ने थॉमसन प्रेस (इंडिया) लि. बनाम नानक बिल्डर्स (2013) का हवाला देते हुए कहा कि मुकदमे के दौरान किए गए ऐसे हस्तांतरण न्यायालय के अंतिम फैसले के अधीन होते हैं।

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न्यायालय का निर्णय

सुप्रीम कोर्ट ने अपील में कोई दम नहीं पाया। अदालत ने कहा कि चूंकि 2010 में डिक्री के आधार पर क्रेता के पक्ष में सेल डीड पहले ही हो चुकी है, इसलिए उन्हें इस लाभ से वंचित करना अनुचित होगा।

कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला:

“प्रतिवादियों (विक्रेताओं) द्वारा 12.02.2009 और 27.02.2025 को निष्पादित की गई सेल डीड को ‘शून्य’ (Non est) माना जाता है और प्रथम अपीलीय न्यायालय की डिक्री को बरकरार रखा जाता है।”

अपील को बिना किसी खर्च के आदेश के साथ खारिज कर दिया गया।

मामले का विवरण

  • केस का शीर्षक: रुसी फिशरीज प्रा. लि. और अन्य बनाम भावना सेठ और अन्य
  • सिविल अपील संख्या: 109 / 2010
  • पीठ: जस्टिस पंकज मिथल और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले
  • दिनांक: 09 अप्रैल, 2026

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