सुप्रीम कोर्ट: मल्टी-स्टेट को-ऑपरेटिव सोसाइटी की निवेश शक्तियों पर अहम फैसला; ‘समान व्यवसाय’ की व्याख्या की

सुप्रीम कोर्ट ने मल्टी-स्टेट को-ऑपरेटिव सोसाइटीज (MSCS) द्वारा धन के निवेश को लेकर एक महत्वपूर्ण कानूनी स्थिति स्पष्ट की है। कोर्ट ने मल्टी-स्टेट को-ऑपरेटिव सोसाइटीज एक्ट, 2002 की धारा 64(d) के तहत प्रयुक्त वाक्यांश “समान व्यवसाय की कोई अन्य संस्था” (any other institution in the same line of business) की व्याख्या करते हुए कड़े मानक निर्धारित किए हैं।

जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने स्पष्ट किया कि किसी अन्य संस्था में निवेश करने के लिए सोसाइटी के उप-नियमों (bye-laws) के अनुसार व्यावसायिक गतिविधियों में “व्यापक या प्रमुख समानता” होनी चाहिए। हालांकि, कोर्ट ने अपीलकर्ता ‘मैसर्स निर्मल उज्ज्वल क्रेडिट को-ऑपरेटिव सोसाइटी लिमिटेड’ को अपनी अपील वापस लेने की अनुमति दे दी, लेकिन मुद्दे की गंभीरता को देखते हुए कानून की स्थिति को स्पष्ट करना आवश्यक समझा।

मामले की पृष्ठभूमि

अपीलकर्ता एक मल्टी-स्टेट को-ऑपरेटिव सोसाइटी है जो “निर्मल टेक्सटाइल” के नाम से एक टेक्सटाइल यूनिट भी चलाती है। यह विवाद ‘मोरारजी टेक्सटाइल्स लिमिटेड’ (कॉर्पोरेट देनदार) की दिवाला प्रक्रिया (CIRP) के दौरान शुरू हुआ। अपीलकर्ता ने कॉर्पोरेट देनदार को खरीदने के लिए 169 करोड़ रुपये की समाधान योजना (resolution plan) पेश की थी।

रिज़ॉल्यूशन प्रोफेशनल (RP) ने अपीलकर्ता को धारा 30(2)(e) के तहत अयोग्य घोषित कर दिया। तर्क यह था कि यह निवेश 2002 के अधिनियम की धारा 64(d) का उल्लंघन करेगा क्योंकि अपीलकर्ता के उप-नियम इसकी अनुमति नहीं देते थे और अपीलकर्ता कॉर्पोरेट देनदार के “समान व्यवसाय” में नहीं था। NCLT और बाद में NCLAT ने भी इस अयोग्यता को बरकरार रखा। NCLAT ने टिप्पणी की कि अपीलकर्ता का उद्देश्य “कृषि-उत्पादों” (agro-products) से जुड़ा था, जो कॉर्पोरेट देनदार के मानव निर्मित फाइबर और विस्कोस व्यवसाय से अलग था।

पक्षों के तर्क

अपीलकर्ता की ओर से: वरिष्ठ अधिवक्ता श्री मुकुल रोहतगी और श्री राजीव शकधर ने तर्क दिया कि सोसाइटी के उप-नियमों में “कृषि-उत्पादों” के प्रसंस्करण की अनुमति है, जिसमें टेक्सटाइल व्यवसाय भी शामिल है। उन्होंने उप-नियमों के क्लॉज 52 में किए गए संशोधन का हवाला दिया, जिसे 2023 के कानूनी संशोधन के अनुरूप बनाया गया था ताकि “समान व्यवसाय” वाली संस्थाओं में निवेश किया जा सके।

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उत्तरदाताओं की ओर से: RP और सफल समाधान आवेदक ने तर्क दिया कि कॉर्पोरेट देनदार न तो अपीलकर्ता की सहायक संस्था है और न ही समान व्यवसाय में है। उन्होंने जोर दिया कि अपीलकर्ता मुख्य रूप से वित्तीय सेवाएं देने वाली क्रेडिट सोसाइटी है, जबकि कॉर्पोरेट देनदार सिंथेटिक फाइबर के औद्योगिक निर्माण में लगा है। इसके लिए उन्होंने NIC कोड का भी सहारा लिया।

धारा 64(d) पर सुप्रीम कोर्ट का विश्लेषण

कोर्ट ने अपना विश्लेषण 2023 के संशोधन पर केंद्रित किया, जो निवेश को केवल सहायक संस्थानों या “समान व्यवसाय” वाली संस्थाओं तक सीमित करता है।

15 मार्च, 2023 की संयुक्त संसदीय समिति (JPC) की रिपोर्ट का उल्लेख करते हुए कोर्ट ने कहा:

“वाक्यांश ‘समान व्यवसाय में’ को शामिल करने का उद्देश्य… पिछली खुली व्यवस्था (open-ended provision) को ठीक करना था, जिसका उपयोग कुछ सोसायटियों द्वारा संदिग्ध निवेश करने के लिए किया जा रहा था… और धन को असंबंधित निवेशों में जाने से रोकना था।”

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कोर्ट ने यह सिद्धांत तय किया कि “व्यवसाय की रेखा” (line of business) का निर्धारण केवल सोसाइटी के उप-नियमों के “उद्देश्य और कार्य” (objects and functions) क्लॉज के आधार पर किया जाना चाहिए। ‘समान व्यवसाय’ की व्याख्या पर कोर्ट ने कहा:

“इस अभिव्यक्ति के लिए मुख्य व्यावसायिक गतिविधियों में व्यापक, प्रमुख या निकटता से जुड़ी समानता की आवश्यकता है, न कि कोई दूरगामी या आकस्मिक संबंध।”

वर्तमान मामले में निष्कर्ष

अपीलकर्ता के उप-नियमों की जांच करने पर कोर्ट ने पाया कि क्लॉज 5(a) से 5(r) मुख्य रूप से सोसाइटी को एक वित्तीय सेवा प्रदाता के रूप में वर्गीकृत करते हैं। क्लॉज 5(s) “कृषि-उत्पादों” के प्रसंस्करण की अनुमति देता है, जिसे कोर्ट ने कॉर्पोरेट देनदार के व्यवसाय से पूरी तरह अलग माना।

कोर्ट ने कहा:

“कॉर्पोरेट देनदार मानव निर्मित फाइबर/विस्कोस आधारित टेक्सटाइल के व्यवसाय में है, जिसमें सिंथेटिक कच्चे माल का उपयोग होता है। यह कृषि-आधारित प्रसंस्करण से अलग है… हालांकि दोनों व्यापक रूप से टेक्सटाइल क्षेत्र में आ सकते हैं, लेकिन उनकी गतिविधियों की वास्तविक प्रकृति भिन्न है।”

पीठ ने निवेश क्लॉज (क्लॉज 52) में संशोधन के आधार पर दी गई दलीलों को भी खारिज कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल कानूनी भाषा को अपनाने से सोसाइटी के वास्तविक “उद्देश्यों और कार्यों” का दायरा तब तक नहीं बढ़ता जब तक कि मूल उद्देश्य क्लॉज में बदलाव न किया जाए।

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कोर्ट का फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने अपीलकर्ता को याचिका वापस लेने की अनुमति दी, लेकिन यह कानूनी मानक स्पष्ट कर दिया कि को-ऑपरेटिव सोसायटियों द्वारा किए गए अवैध निवेशों को तब तक वैध नहीं माना जा सकता जब तक कि वे “समान व्यवसाय” के कड़े मानदंड को पूरा न करते हों।

कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला:

“धारा 64(d) के तहत पात्रता के निर्धारण के लिए MSCS के उप-नियमों में निहित उद्देश्यों और कार्यों की जांच करना और उनकी तुलना लक्ष्य संस्था (target institution) की व्यावसायिक गतिविधियों से करना अनिवार्य है, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि दोनों के बीच प्रमुख या व्यापक समानता मौजूद है।”

अपील वापस लेने के कारण खारिज कर दी गई और कोर्ट ने निर्देश दिया कि कॉर्पोरेट देनदार की दिवाला प्रक्रिया IBC के प्रावधानों के अनुसार जारी रहेगी।

मामले का विवरण:

  • केस टाइटल: मैसर्स निर्मल उज्ज्वल क्रेडिट को-ऑपरेटिव सोसाइटी लिमिटेड बनाम रवि सेठिया और अन्य
  • सिविल अपील संख्या: 11193/2025
  • पीठ: जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन
  • दिनांक: 9 अप्रैल, 2026

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