‘नागरिक समझ विकसित करें’: बॉम्बे हाईकोर्ट ने यातायात नियमों के उल्लंघन पर जताई नाराजगी, मृतक के परिजनों का मुआवजा बढ़ाया

बॉम्बे हाईकोर्ट ने भारतीय नागरिकों से “नागरिक समझ (civic sense) विकसित करने” और यातायात नियमों का कड़ाई से पालन करने का आह्वान किया है। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि कई नागरिक विदेश यात्रा के दौरान तो नियमों का पालन करते हैं, लेकिन स्वदेश लौटते ही उन्हें भूल जाते हैं। यह टिप्पणी जस्टिस जितेंद्र जैन की एकल पीठ ने एक बस दुर्घटना में मारे गए व्यक्ति के परिवार को दिए जाने वाले मुआवजे की राशि बढ़ाने की याचिका पर सुनवाई के दौरान की।

हाईकोर्ट ने जोर देकर कहा कि सड़क सुरक्षा की जिम्मेदारी केवल प्रशासन की नहीं, बल्कि हर नागरिक की है। जस्टिस जैन ने नोट किया कि बड़े-बुजुर्ग और माता-पिता अक्सर सिग्नलों और नियमों की अनदेखी कर युवा पीढ़ी के सामने गलत उदाहरण पेश करते हैं।

बुधवार को दिए गए अपने विस्तृत आदेश में, हाईकोर्ट ने भारतीयों के व्यवहार में देश और विदेश के बीच दिखने वाले विरोधाभास पर चिंता व्यक्त की।

हाईकोर्ट ने कहा, “जब भारतीय विदेश यात्रा करते हैं, तो वे सभी यातायात नियमों और विनियमों का पालन करते हैं। मुझे ऐसा कोई कारण नहीं दिखता कि भारत लौटने पर हमें अपने देश के नियमों का पालन क्यों नहीं करना चाहिए। इनका पालन न करने का कोई औचित्य नहीं हो सकता।”

जस्टिस जैन ने आगे कहा कि बच्चे वही जल्दी सीखते हैं जो वे देखते हैं। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की, “इसलिए, वाहन चलाते और सड़क पार करते समय नियमों का पालन करना बड़ों और माता-पिता का नैतिक कर्तव्य है, ताकि बच्चे नियमों के उल्लंघन के बजाय अपने माता-पिता से नागरिक समझ का यह बुनियादी गुण सीख सकें।”

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हाईकोर्ट ने पैदल यात्रियों द्वारा सिग्नल की अनदेखी करने की सामान्य प्रवृत्ति की ओर भी इशारा किया, जिसके कारण अक्सर जानलेवा दुर्घटनाएं होती हैं। यातायात पुलिस के काम की सराहना करते हुए जस्टिस जैन ने सुझाव दिया कि सिग्नल तोड़ने वाले दोपहिया वाहन चालकों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए।

हाईकोर्ट ने कहा, “एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में यह उचित समय है कि हम सड़क पार करते समय और सिग्नलों का पालन करते समय नियमों का ध्यान रखें।”

यह आदेश अप्रैल 2016 में मोटर दुर्घटना दावा न्यायाधिकरण (MACT) के एक फैसले के खिलाफ दायर अपील पर आया है। नवंबर 2012 में ठाणे म्यूनिसिपल ट्रांसपोर्ट (TMT) की बस की चपेट में आने से एक व्यक्ति की मौत हो गई थी, जिसके परिवार ने ₹13 लाख के मुआवजे को बढ़ाने की मांग की थी।

मृतक पार्किंसंस रोग से पीड़ित था और आंशिक रूप से लकवाग्रस्त था। नवंबर 2012 में सड़क पार करते समय वह दुर्घटना का शिकार हुआ और मार्च 2013 में उसकी मृत्यु हो गई।

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हाईकोर्ट ने मुआवजे की राशि को बढ़ाकर ₹15 लाख कर दिया, हालांकि कोर्ट ने “अंशदायी लापरवाही” (contributory negligence) का भी उल्लेख किया। पीठ ने कहा कि चूंकि मृतक आंशिक रूप से लकवाग्रस्त था, इसलिए व्यस्त सड़क पार करते समय उसे किसी के साथ होना चाहिए था या किसी की मदद लेनी चाहिए थी।

हाईकोर्ट ने कहा, “एक पैदल यात्री को सिग्नल के नियमों का पालन करते हुए केवल सिग्नल पर ही सड़क पार करने की कोशिश करनी चाहिए।” हालांकि, कोर्ट ने बस ड्राइवर को भी दोषी पाया और कहा कि लंगड़ाकर सड़क पार कर रहे व्यक्ति को देखकर उसे बस की गति धीमी कर देनी चाहिए थी।

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