चिकित्सा की दृष्टि से उचित प्रक्रिया और वैध सहमति पत्र होने पर कोई आपराधिक लापरवाही नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने डॉक्टर के खिलाफ कार्यवाही रद्द की

सुप्रीम कोर्ट ने एक पीडियाट्रिक सर्जन, डॉ. एस. बालगोपाल के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही को यह कहते हुए रद्द कर दिया है कि उनके द्वारा की गई सर्जिकल प्रक्रिया चिकित्सकीय रूप से उचित थी। कोर्ट ने पाया कि सहमति पत्र (Consent Form) में हेरफेर के आरोप न तो मेडिकल बोर्ड की राय और न ही किसी फोरेंसिक साक्ष्य से सिद्ध हुए हैं।

जस्टिस पामिदिगंतम श्री नरसिम्हा और जस्टिस मनोज मिश्रा की पीठ ने मद्रास हाईकोर्ट के उस आदेश को खारिज कर दिया, जिसमें आरोपी डॉक्टर के खिलाफ मामला रद्द करने से इनकार कर दिया गया था। शीर्ष अदालत ने कहा कि इस मामले में अभियोजन जारी रखना “अदालत की प्रक्रिया का दुरुपयोग” होगा।

मामले की पृष्ठभूमि

विवाद 2005 में शुरू हुआ जब दूसरे प्रतिवादी (R-2) ने अपने डेढ़ साल के बेटे को ‘अनडिसेंडेड टेस्टिकल’ (undescended testicle) की सर्जरी के लिए श्री रामचंद्र मेडिकल सेंटर में भर्ती कराया था।

शिकायतकर्ता के अनुसार, उन्होंने केवल ‘ऑर्किडोपेक्सी’ (Orchidopexy – अंडकोष को सही स्थान पर लाना) के लिए सहमति दी थी, लेकिन डॉक्टर ने ‘ऑर्किडेक्टोमी’ (Orchidectomy – अंडकोष को हटाना) कर दी। शिकायतकर्ता का आरोप था कि डॉक्टर ने खुद को बचाने के लिए सहमति पत्र में “ऑर्किडेक्टोमी” शब्द बाद में जोड़ा, जो जालसाजी की श्रेणी में आता है। इसी आधार पर 2006 में आईपीसी की धारा 465 (जालसाजी) और 471 (फर्जी दस्तावेज का उपयोग) सहित अन्य धाराओं के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई थी।

मेडिकल बोर्ड के निष्कर्ष

हाईकोर्ट के निर्देश पर गठित मेडिकल बोर्ड, जिसमें सरकारी स्टेनली मेडिकल कॉलेज अस्पताल के विशेषज्ञ शामिल थे, ने 29 जुलाई 2010 को अपनी रिपोर्ट में स्पष्ट किया:

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“बच्चे की की गई लेफ्ट ऑर्किडेक्टोमी सर्जरी… चिकित्सा नैतिकता के अनुसार एक उचित सर्जिकल प्रक्रिया है और इसे माता-पिता की सहमति से किया जाना चाहिए था।”

बोर्ड ने पाया कि बायां अंडकोष बहुत छोटा और अविकसित था। ऐसी स्थिति में ‘ऑर्किडेक्टोमी’ को ‘ऑर्किडोपेक्सी’ से बेहतर माना जाता है क्योंकि भविष्य में इससे कैंसर (malignancy) होने का खतरा अधिक होता है और वह ऊतक (tissue) शरीर के लिए उपयोगी नहीं रह जाता।

पक्षकारों की दलीलें

अपीलकर्ता (डॉ. एस. बालगोपाल) की ओर से दलील दी गई कि मेडिकल बोर्ड और जांच अधिकारी की रिपोर्ट में लापरवाही का कोई आरोप नहीं लगाया गया है। यह तर्क दिया गया कि सहमति पत्र में ‘ऑर्किडोपेक्सी’ और ‘ऑर्किडेक्टोमी’ दोनों के बीच स्लैश (/) का चिन्ह था, और फोरेंसिक जांच में लिखाई या स्याही अलग होने का कोई प्रमाण नहीं मिला है।

तमिलनाडु राज्य का पक्ष था कि भले ही चिकित्सा में लापरवाही न हुई हो, लेकिन डॉक्टर को सर्जरी से पहले विशिष्ट सहमति लेनी चाहिए थी। राज्य के अनुसार, सहमति पत्र में हेरफेर हुआ है या नहीं, इसका निर्णय केवल ट्रायल (मुकदमे) के दौरान ही हो सकता है।

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शिकायतकर्ता (R-2) ने व्यक्तिगत रूप से पेश होकर दावा किया कि उन्होंने सर्जरी के दौरान फोन पर अंडकोष हटाने से मना कर दिया था, फिर भी डॉक्टर ने प्रक्रिया पूरी की और बाद में दस्तावेजों के साथ छेड़छाड़ की।

अदालत का विश्लेषण और टिप्पणियां

सुप्रीम कोर्ट ने रेखांकित किया कि आपराधिक कानून में चिकित्सा पेशेवरों को सामान्य नागरिकों से अलग स्तर पर रखा गया है। कोर्ट ने जैकब मैथ्यू बनाम पंजाब राज्य (2005) मामले में तय किए गए आपराधिक लापरवाही के मानकों का उल्लेख किया।

दस्तावेजों में हेरफेर के आरोपों पर अदालत ने कहा कि यद्यपि यह ट्रायल का विषय है, लेकिन धारा 482 Cr.P.C. के तहत हाईकोर्ट के पास न्याय सुनिश्चित करने और अदालत की प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने के लिए तथ्यों पर विचार करने की शक्ति है। सहमति पत्र का अवलोकन करते हुए पीठ ने कहा:

“सहमति पत्र के कॉलम में जहाँ प्रस्तावित सर्जरी की प्रकृति का उल्लेख किया जाना था, वहाँ ‘ऑर्किडोपेक्सी’ और ‘ऑर्किडेक्टोमी’ दोनों के बीच स्लैश (/) लगाया गया था, जिसका अर्थ है कि ऑर्किडेक्टोमी उपलब्ध विकल्पों में से एक था।”

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पीठ ने यह भी ध्यान दिया कि स्वास्थ्य सेवाओं के निदेशक को सहमति पत्र में कुछ भी संदिग्ध नहीं मिला और ऐसी कोई सामग्री रिकॉर्ड पर नहीं है जिससे पता चले कि बाद में किसी अलग स्याही या लिखावट से कुछ जोड़ा गया है।

निष्कर्ष और निर्णय

अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि चूंकि अपनाई गई प्रक्रिया एक मान्यता प्राप्त चिकित्सा विकल्प थी और डॉक्टर के खिलाफ कोई द्वेष साबित नहीं हुआ, इसलिए ट्रायल जारी रखने का कोई आधार नहीं है।

“तथ्यों और परिस्थितियों के अवलोकन के बाद… हमारा विचार है कि अपीलकर्ता के खिलाफ आपराधिक कार्यवाही जारी रखना अदालत की प्रक्रिया के दुरुपयोग के अलावा और कुछ नहीं होगा।”

सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए मद्रास हाईकोर्ट का फैसला रद्द कर दिया और न्यायिक मजिस्ट्रेट नं. 1, पूनमल्ली के पास लंबित कार्यवाही को समाप्त (quash) कर दिया।

मामले का विवरण

  • केस टाइटल: डॉ. एस. बालगोपाल बनाम तमिलनाडु राज्य एवं अन्य।
  • केस नंबर: क्रिमिनल अपील (SLP (Crl) No. 14803/2023 से उत्पन्न)
  • पीठ: जस्टिस पामिदिगंतम श्री नरसिम्हा और जस्टिस मनोज मिश्रा
  • दिनांक: 06 अप्रैल, 2026

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