दिल्ली हाईकोर्ट ने तीन दशक से अधिक पुराने भ्रष्टाचार के एक मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए दो पूर्व सरकारी इंजीनियरों को सभी आरोपों से मुक्त कर दिया है। साल 1991 के इस मामले में हाईकोर्ट ने 2002 के ट्रायल कोर्ट के फैसले को पलट दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि रिश्वतखोरी के मामले में सजा के लिए ‘अवैध पारितोषिक की मांग’ को साबित करना सबसे महत्वपूर्ण है, जिसे अभियोजन पक्ष साबित करने में विफल रहा।
2 अप्रैल, 2026 को सुनाए गए अपने फैसले में, न्यायमूर्ति चंद्रशेखरन सुधा ने सहायक अभियंता (AE) वी.के. दत्ता और कनिष्ठ अभियंता (JE) दिनेश गर्ग की सजा को रद्द कर दिया। दिल्ली सरकार के बाढ़ नियंत्रण विभाग में तैनात इन दोनों अधिकारियों पर 34 साल पहले एक ठेकेदार के बिल पास करने के बदले ₹1,800 (प्रत्येक से ₹900) की रिश्वत मांगने का आरोप लगा था। हाईकोर्ट ने केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) द्वारा पेश किए गए सबूतों को “असंतोषजनक” पाया और कहा कि संदेह से परे दोष साबित नहीं हो सका है।
इस मामले की शुरुआत 20 सितंबर, 1991 को हुई थी, जब CBI ने एक ठेकेदार की शिकायत पर FIR दर्ज की थी। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि इंजीनियरों ने भुगतान जारी करने के लिए पैसों की मांग की है। इसके बाद एक “ट्रैप” ऑपरेशन चलाया गया और दोनों अधिकारियों को गिरफ्तार कर लिया गया। लगभग 11 साल बाद, सितंबर 2002 में, एक ट्रायल कोर्ट ने उन्हें दोषी करार देते हुए दो साल के कारावास की सजा सुनाई थी। इंजीनियरों ने इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी और खुद को निर्दोष बताते हुए इसे झूठा मामला बताया था।
अपीलकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सुनील दलाल और अधिवक्ता समीर चंद्रा ने तर्क दिया कि अभियोजन पक्ष की पूरी कहानी बुनियादी रूप से त्रुटिपूर्ण थी। उन्होंने निम्नलिखित बिंदुओं पर जोर दिया:
- घटनास्थल पर मौजूदगी: आधिकारिक मस्टर रोल से यह स्पष्ट था कि जिस समय कथित तौर पर रिश्वत की मांग की गई थी, उस समय इंजीनियर निरीक्षण स्थल पर थे, न कि कार्यालय में।
- कोई बकाया नहीं: विभागीय गवाहों की गवाही से पता चला कि उस समय ठेकेदार का कोई भी भुगतान लंबित नहीं था, इसलिए रिश्वत मांगने का कोई तार्किक कारण या मकसद नहीं था।
- प्रक्रियात्मक खामियां: बचाव पक्ष ने बताया कि FIR संदिग्ध रूप से बहुत जल्दी दर्ज की गई थी—कथित तौर पर शिकायतकर्ता द्वारा CBI कार्यालय में पूरी शिकायत सौंपने से पहले ही।
CBI की ओर से विशेष लोक अभियोजक अतुल गुलरिया ने तर्क दिया कि ट्रायल कोर्ट का फैसला सही था और पैसों की बरामदगी सहित सभी साक्ष्यों के उचित मूल्यांकन पर आधारित था।
हाईकोर्ट के 48 पन्नों के फैसले में इस बात पर जोर दिया गया कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (Prevention of Corruption Act) के तहत केवल करेंसी नोटों की बरामदगी सजा के लिए पर्याप्त नहीं है। कोर्ट ने कहा:
“अभियोजन पक्ष द्वारा महत्वपूर्ण गवाहों की जांच करने में विफलता और सामग्री में सामने आई विसंगतियां, कोर्ट के मन में संदेह पैदा करती हैं।”
न्यायमूर्ति सुधा ने गौर किया कि अभियोजन पक्ष ने उस ठेकेदार की जांच नहीं की जो सीधे तौर पर वित्तीय लेनदेन में शामिल था और घटनाओं के समय को लेकर भी गंभीर विरोधाभास थे। कोर्ट ने एक स्थापित कानूनी सिद्धांत को दोहराया: “संदेह चाहे कितना भी गहरा क्यों न हो, वह संदेह से परे सबूत का स्थान नहीं ले सकता।”
24 साल पुराने सजा के आदेश को रद्द करते हुए, हाईकोर्ट ने वी.के. दत्ता और दिनेश गर्ग दोनों को “संदेह का लाभ” (Benefit of Doubt) दिया। कोर्ट ने उन्हें तुरंत रिहा करने का निर्देश दिया, जिससे उनके लगभग पूरे पेशेवर जीवन और सेवानिवृत्ति के बाद तक चली इस लंबी कानूनी जंग का अंत हो गया।

