न्यायिक नैतिकता: जस्टिस के.वी. विश्वनाथन ने ‘अलकेमिस्ट एसेट’ मामले से खुद को अलग किया, फैसला सुरक्षित होने के बाद लिया निर्णय

न्यायिक शुचिता और निष्पक्षता की परंपरा को कायम रखते हुए, सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस के.वी. विश्वनाथन ने ‘अलकेमिस्ट एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी प्राइवेट लिमिटेड’ से जुड़े एक मामले की सुनवाई से खुद को अलग (Recuse) कर लिया है। विशेष बात यह है कि इस मामले में पीठ ने पिछले महीने ही अपनी सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रख लिया था।

जस्टिस विश्वनाथन ने यह कदम तब उठाया जब उन्हें ज्ञात हुआ कि जज बनने से पहले, वकील के तौर पर वह इसी मामले में अपीलकर्ता की पैरवी कर चुके थे।

इस मामले का मुख्य कानूनी पहलू ‘हितों के टकराव’ (Conflict of Interest) से जुड़ा है। न्यायिक सिद्धांतों के अनुसार, कोई भी जज उस मामले की सुनवाई नहीं कर सकता जिसमें उन्होंने पहले किसी भी पक्ष के वकील के तौर पर काम किया हो। जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की पीठ ने इस तथ्य के सामने आने के बाद अपना पुराना आदेश वापस ले लिया है, ताकि न्याय की निष्पक्षता पर कोई सवाल न उठे।

यह मामला अलकेमिस्ट एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी प्राइवेट लिमिटेड द्वारा शीर्ष अदालत में दायर किया गया था। जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की खंडपीठ ने 1 अप्रैल को इस पर सुनवाई की थी।

जस्टिस विश्वनाथन के करियर की बात करें तो उन्हें 19 मई, 2023 को बार (वकील) से सीधे सुप्रीम कोर्ट के जज के रूप में पदोन्नत किया गया था। इससे पहले, अप्रैल 2009 में सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें सीनियर एडवोकेट नामित किया था। अपने लंबे कानूनी करियर के दौरान उन्होंने कई महत्वपूर्ण कॉर्पोरेट और दिवाला (Insolvency) मामलों में बड़े क्लाइंट्स का प्रतिनिधित्व किया है।

READ ALSO  बिहार सरकार ने आरक्षण वृद्धि को वापस लेने के मामले में सुप्रीम कोर्ट में अपील की

खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि हितों के टकराव की यह जानकारी अंतिम बहस पूरी होने के बाद संज्ञान में आई। कोर्ट ने इस संबंध में औपचारिक बयान जारी करते हुए कहा:

“इस मामले की अंतिम सुनवाई पूरी हो चुकी थी और फैसला सुरक्षित रखा गया था। फैसला सुरक्षित होने के बाद, जस्टिस के.वी. विश्वनाथन के संज्ञान में यह बात आई है कि उन्होंने मुख्य कर्जदार (कॉर्पोरेट देनदार) के खिलाफ चल रही ‘कॉर्पोरेट इन्सॉल्वेंसी रेजोल्यूशन प्रोसेस’ (CIRP) के दौरान अपीलकर्ता के वकील के रूप में अपनी सेवाएं दी थीं।”

READ ALSO  बिना पेनेट्रेशन के IPC की धारा 376 या पॉक्सो की धारा 6 के तहत अपराध नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने दोषसिद्धि को संशोधित किया

उल्लेखनीय है कि इस मामले में 17 मार्च को ही फैसला सुरक्षित कर लिया गया था। हालांकि, वकील के रूप में जज की पुरानी भूमिका का पता चलने के बाद अब फैसला सुनाने की प्रक्रिया पर रोक लगा दी गई है।

हालात को देखते हुए, पीठ ने 17 मार्च के अपने आदेश को वापस ले लिया है। अदालत ने निर्देश दिया कि इस मामले को अब इस पीठ की सूची से हटाकर किसी दूसरी बेंच के सामने पेश किया जाए।

READ ALSO  पति के बार-बार देर से घर आने पर पत्नी का संदेह करना क्रूरता नहीं: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट

कोर्ट ने कहा, “इन घटनाक्रमों को देखते हुए, बेंच अपने 17 मार्च के आदेश को वापस लेती है और निर्देश देती है कि इस मामले को भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) के निर्देशानुसार किसी अन्य बेंच के समक्ष सूचीबद्ध किया जाए।” अब इस मामले की अगली सुनवाई के लिए बेंच का निर्धारण मुख्य न्यायाधीश करेंगे।

Law Trend
Law Trendhttps://lawtrend.in/
Legal News Website Providing Latest Judgments of Supreme Court and High Court

Related Articles

Latest Articles