इलाहाबाद हाईकोर्ट: एफआईआर में केंद्रीय मंत्री के नाम के आगे ‘माननीय’ न लगाने पर गृह सचिव से मांगा स्पष्टीकरण

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश के अपर मुख्य सचिव (गृह) को एक हलफनामा दाखिल कर यह स्पष्ट करने का निर्देश दिया है कि एक प्रथम सूचना रिपोर्ट (एफआईआर) में केंद्रीय मंत्री के नाम के पहले ‘माननीय’ (Hon’ble) शब्द का प्रयोग क्यों नहीं किया गया। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि भले ही शिकायतकर्ता शिष्टाचार संबंधी शीर्षक का उपयोग करने में विफल रहे, लेकिन दस्तावेज़ दर्ज करते समय आधिकारिक प्रोटोकॉल का पालन करना पुलिस का कर्तव्य है।

जस्टिस जे.जे. मुनीर और जस्टिस तरुण सक्सेना की खंडपीठ ने हर्षित शर्मा और दो अन्य द्वारा दायर एक याचिका पर सुनवाई करते हुए 31 मार्च को यह आदेश पारित किया। याचिकाकर्ताओं ने मथुरा में अपने खिलाफ दर्ज एक एफआईआर को रद्द करने की मांग करते हुए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।

सुनवाई के दौरान, खंडपीठ ने पुलिस दस्तावेज में एक केंद्रीय मंत्री को संदर्भित करने के तरीके पर कड़ा रुख अपनाया। हाईकोर्ट ने इस बात को रेखांकित किया कि मंत्री के नाम के साथ न केवल ‘माननीय’ जैसे मानक सम्मानजनक शब्द का प्रयोग नहीं किया गया, बल्कि एक स्थान पर तो उनके नाम के आगे ‘मिस्टर’ तक नहीं लगाया गया।

हाईकोर्ट ने जोर देकर कहा कि पुलिस विभाग की यह जिम्मेदारी है कि वह अपने रिकॉर्ड में उच्च पदों की गरिमा बनाए रखे, चाहे प्रथम सूचना देने वाले ने अपनी लिखित शिकायत में किसी भी भाषा का उपयोग किया हो।

खंडपीठ ने कहा, “भले ही लिखित रिपोर्ट में प्रथम सूचना देने वाले ने मंत्री का अनुचित तरीके से वर्णन किया हो, लेकिन एफआईआर लिखते समय पुलिस का यह कर्तव्य था कि वह प्रोटोकॉल का पालन करते हुए सम्मानजनक शब्द का उपयोग करती, चाहे वह ब्रैकेट में ही क्यों न हो।”

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हाईकोर्ट ने प्रोटोकॉल में हुई इस चूक को समझने के लिए राज्य के शीर्ष गृह विभाग के अधिकारी से जवाब तलब किया है।

हाईकोर्ट ने कहा, “उत्तर प्रदेश सरकार के अपर मुख्य सचिव (गृह) अपने हलफनामे में स्पष्ट करेंगे कि एफआईआर में आने वाले माननीय केंद्रीय मंत्री के नाम के साथ ‘माननीय’ के सामान्य सम्मानजनक शब्द का उपयोग क्यों नहीं किया गया है।”

आदेश का त्वरित अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए, रजिस्ट्रार (अनुपालन) को निर्देश दिया गया है कि वह 48 घंटों के भीतर इस आदेश की जानकारी अपर मुख्य सचिव और मथुरा के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) को दें।

मामले की अगली सुनवाई 6 अप्रैल को निर्धारित की गई है, तब तक अदालत में आवश्यक स्पष्टीकरण प्रस्तुत करना होगा।

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