उत्तराखंड हाईकोर्ट ने लोकायुक्त की नियुक्ति में देरी पर सवाल उठाए

उत्तराखंड हाईकोर्ट ने मंगलवार को राज्य सरकार से लोकायुक्त की नियुक्ति में हो रही देरी के बारे में स्पष्टीकरण मांगा, जबकि भ्रष्टाचार निरोधक संस्था चालू है और उसे सालाना 2 से 3 करोड़ रुपये का वित्त पोषण मिलता है।

एक जनहित याचिका (पीआईएल) की सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश गुहानाथन नरेंद्र और न्यायमूर्ति आशीष नैथानी की खंडपीठ ने मुख्य सचिव को निर्देश दिया कि वे देरी के कारणों का विवरण देते हुए हलफनामा प्रस्तुत करें। न्यायालय का यह निर्देश मुख्य स्थायी अधिवक्ता चंद्रशेखर रावत द्वारा नियुक्ति को अंतिम रूप देने के लिए अतिरिक्त समय के अनुरोध के बाद आया, जिसमें उल्लेख किया गया था कि इस उद्देश्य के लिए मुख्यमंत्री के नेतृत्व में एक समिति पहले से ही गठित है।

गोलापार निवासी रविशंकर जोशी द्वारा दायर जनहित याचिका में सरकार द्वारा लोकायुक्त की नियुक्ति में विफलता को उजागर किया गया है, जिसके कारण भ्रष्टाचार निरोधक गतिविधियों के बिना ही काफी खर्च हो गया है। जोशी की याचिका में यह भी कहा गया है कि कर्नाटक और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में उनके संबंधित लोकायुक्तों द्वारा भ्रष्टाचार के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई की गई है, जो उत्तराखंड की स्थिति से बिल्कुल अलग है।

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पीआईएल के अनुसार, उत्तराखंड में लोकायुक्त की अनुपस्थिति ने न केवल भ्रष्टाचार के मुद्दों को बढ़ाया है, बल्कि हाईकोर्ट पर बोझ भी बढ़ाया है, क्योंकि भ्रष्टाचार से संबंधित हर छोटा-मोटा मामला न्यायिक कार्यवाही में समाप्त हो जाता है। इससे न्यायपालिका में पहले से लंबित मामलों में और वृद्धि होती है।

इसके अलावा, याचिका में सभी राज्य जांच एजेंसियों पर नियंत्रण और राजनीतिक प्रभाव की आलोचना की गई है, जिसमें कहा गया है कि वर्तमान में किसी भी एजेंसी के पास राजपत्रित अधिकारियों के खिलाफ स्वतंत्र रूप से मामले दर्ज करने का अधिकार नहीं है। इसमें यह भी उल्लेख किया गया है कि सतर्कता विभाग भी राज्य पुलिस का हिस्सा है, जो मुख्यमंत्री कार्यालय के सीधे नियंत्रण में आता है।

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याचिकाकर्ता के वकील ने इस बात पर जोर दिया कि हाईकोर्ट ने पहले लोकायुक्त की नियुक्ति के संबंध में राज्य सरकार से रिपोर्ट मांगी थी। इसके बावजूद, तथा न्यायालय के पूर्व निर्देशों का पालन न करने के लिए मुख्य सचिव के खिलाफ अवमानना ​​याचिका दायर करने के बावजूद, आज तक कोई रिपोर्ट प्रस्तुत नहीं की गई है।

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