आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि संविधान के अनुच्छेद 22(2) के तहत गिरफ्तार व्यक्ति को 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने की समयसीमा की गणना करते समय गिरफ्तारी स्थल से अदालत तक की यात्रा में लगा आवश्यक समय बाहर रखा जाएगा। यह प्रावधान प्रत्येक गिरफ्तार व्यक्ति पर लागू होता है, चाहे उसकी स्वास्थ्य स्थिति कुछ भी हो। कोर्ट ने उस दलील को खारिज कर दिया कि यात्रा के समय की छूट केवल शारीरिक रूप से असमर्थ आरोपियों को मिलती है।
जस्टिस रवि नाथ तिलहरी और जस्टिस अलापति गिरिधर की डिवीजन बेंच ने यूट्यूबर बाचलाकुरी जोसेफ उर्फ रावण की रिहाई के लिए दाखिल बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका (Habeas Corpus Petition) खारिज कर दी। जोसेफ को भारतीय न्याय संहिता (BNS) और गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) के तहत दर्ज मामले में गिरफ्तार किया गया था।
सुनवाई के दौरान कोर्ट ने ऐसी लिखित दलीलों पर भी चिंता जताई जो AI से तैयार की गई प्रतीत होती हैं। बेंच ने निर्देश दिया कि अदालत के आदेश के बिना दाखिल लिखित दलीलें या न्यायिक फैसलों के संकलन हाईकोर्ट रजिस्ट्री स्वीकार नहीं करेगी।
क्या था मामला?
यह याचिका क्रिश्चियन जॉइंट एक्शन कमेटी और भानु मूर्ति मेकला ने दाखिल की थी। इसमें कृष्णा जिले के गन्नावरम पुलिस स्टेशन में दर्ज FIR संख्या 188/2026 के संबंध में 5 जुलाई 2026 को बारहवें अतिरिक्त जूनियर प्रथम श्रेणी मजिस्ट्रेट, गन्नावरम द्वारा पारित रिमांड आदेश को चुनौती दी गई थी।
याचिकाकर्ताओं के अनुसार, हिरासत में लिया गया व्यक्ति ‘PRASHNA’ नाम से यूट्यूब चैनल चलाता है। उसे 4 जुलाई 2026 को शाम करीब 7 बजे अनकापल्ली जिले के वेम्पाडु टोल प्लाजा के पास पकड़ा गया था।
इसके बाद उसे 5 जुलाई 2026 को शाम 7:30 बजे से 8 बजे के बीच मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया।
याचिकाकर्ताओं की दलीलें
याचिकाकर्ताओं की ओर से एडवोकेट राणा संदीप बुस्सा ने दलील दी कि आरोपी को गिरफ्तारी के 24 घंटे बाद मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया, जो संविधान के अनुच्छेद 22(2) और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 57 और 58 का उल्लंघन है।
उन्होंने तर्क दिया कि यात्रा में लगे समय को 24 घंटे की गणना से बाहर रखने का प्रावधान केवल ऐसे आरोपियों के लिए लागू होता है जो शारीरिक रूप से असमर्थ हों या जिन्हें यात्रा के दौरान चिकित्सकीय सहायता की आवश्यकता हो। उनका कहना था कि इस मामले में आरोपी पूरी तरह स्वस्थ था।
याचिकाकर्ताओं ने मजिस्ट्रेट के क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र, गिरफ्तारी के लिखित आधार उपलब्ध नहीं कराने और एक ही भाषण को लेकर कई FIR दर्ज किए जाने का मुद्दा भी उठाया। इसके समर्थन में टी.टी. एंटनी बनाम केरल राज्य के फैसले का हवाला दिया गया।
राज्य सरकार ने गिरफ्तारी और रिमांड को सही बताया
प्रतिवादियों की ओर से सीनियर एडवोकेट सिद्धार्थ लूथरा पेश हुए। उनकी सहायता स्पेशल गवर्नमेंट प्लीडर टी. विष्णु तेजा ने की।
उन्होंने कहा कि न्यायिक रिमांड आदेश के खिलाफ बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका सुनवाई योग्य नहीं है। इसके समर्थन में सीरियस फ्रॉड इन्वेस्टिगेशन ऑफिस बनाम राहुल मोदी और वी. सेंथिल बालाजी बनाम राज्य के फैसलों का हवाला दिया गया।
राज्य सरकार की ओर से बताया गया कि गिरफ्तारी स्थल से मजिस्ट्रेट की अदालत तक लगभग 250 किलोमीटर की यात्रा में 4 से साढ़े 4 घंटे लगते हैं। इस समय को 24 घंटे की गणना से बाहर करने पर आरोपी को निर्धारित समयसीमा के भीतर पेश किया गया था।
यह भी कहा गया कि संबंधित FIR आरोपी के यूट्यूब चैनल पर प्रतिबंधित आतंकवादी संगठन CPI (माओवादी) का महिमामंडन करने वाली सामग्री से संबंधित थी और पहले दर्ज FIR से अलग थी।
यात्रा का समय बाहर रखने का नियम सभी गिरफ्तार व्यक्तियों पर लागू
हाईकोर्ट ने सबसे पहले कहा कि चूंकि याचिका में रिमांड आदेश को ही चुनौती दी गई है, इसलिए बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका सुनवाई योग्य है।
इसके बाद बेंच ने अनुच्छेद 22(2) के तहत 24 घंटे की समयसीमा पर विचार किया।
कोर्ट ने कहा कि संविधान के इस प्रावधान की भाषा स्पष्ट है और इसमें किसी तरह का अपवाद नहीं है।
बेंच ने कहा,
“गिरफ्तारी के स्थान से मजिस्ट्रेट की अदालत तक यात्रा के लिए आवश्यक समय, जिसे गणना से बाहर रखा जाना है, प्रत्येक गिरफ्तार और हिरासत में रखे गए व्यक्ति पर लागू होगा, चाहे उसका स्वास्थ्य या कोई अन्य परिस्थिति अथवा स्थिति कुछ भी हो।”
याचिकाकर्ताओं की व्याख्या को अस्वीकार करते हुए कोर्ट ने कहा कि इसे स्वीकार करना,
“भारत के संविधान के अनुच्छेद 22(2) की स्पष्ट भाषा के विपरीत होगा और उसमें ऐसी बात जोड़ने के समान होगा, जो उसमें मौजूद ही नहीं है।”
हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ताओं द्वारा प्रस्तुत गूगल मैप्स के अनुमान पर भी विचार किया, जिसके अनुसार यात्रा में 4 घंटे 43 मिनट लगते थे।
इस समय को बाहर रखने के बाद कोर्ट ने पाया कि आरोपी को 24 घंटे की निर्धारित समयसीमा के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया था।
मजिस्ट्रेट के अधिकार क्षेत्र और गिरफ्तारी के आधार पर फैसला
क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र के सवाल पर हाईकोर्ट ने कहा कि FIR गन्नावरम पुलिस स्टेशन में दर्ज हुई थी। इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि संबंधित मजिस्ट्रेट के पास रिमांड देने का अधिकार नहीं था।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि FIR उस पुलिस स्टेशन में दर्ज की जा सकती थी या नहीं, इसका निर्णय बंदी प्रत्यक्षीकरण की कार्यवाही में नहीं किया जा सकता।
बेंच ने यह भी कहा कि आरोपी को रिमांड के लिए ऐसे मजिस्ट्रेट के सामने भी पेश किया जा सकता है, जिसके पास संबंधित मामले का क्षेत्रीय अधिकार क्षेत्र न हो।
गिरफ्तारी के लिखित आधार उपलब्ध नहीं कराने की दलील पर कोर्ट ने पाया कि यह मुद्दा पहली बार लिखित दलीलों में उठाया गया था। मूल रिट याचिका में इस संबंध में कोई कथन नहीं किया गया था।
रिमांड रिपोर्ट में दर्ज था कि BNSS की धारा 48(2) के तहत गिरफ्तारी से संबंधित विवरण आरोपी की पत्नी को बता दिए गए थे। इस तथ्य पर कोई विवाद नहीं किया गया।
एक ही भाषण को लेकर लगातार कई FIR दर्ज किए जाने के मुद्दे पर कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को उचित कानूनी कार्यवाही करने की स्वतंत्रता दी।
हाईकोर्ट ने यह भी पाया कि मजिस्ट्रेट ने रिमांड आदेश बिना विचार किए यांत्रिक तरीके से पारित नहीं किया था।
AI से तैयार लिखित दलीलों पर हाईकोर्ट ने जताई चिंता
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड किया कि वकालतनामे पर मौजूद एडवोकेट डोंडापति प्रसाद कुमार के माध्यम से दाखिल लिखित दलीलें उन्होंने स्वयं तैयार नहीं की थीं और उन्हें उनकी सामग्री की जानकारी भी नहीं थी।
इसके बाद एडवोकेट राणा संदीप बुस्सा ने उन लिखित दलीलों को वापस ले लिया।
बेंच ने इस तरह की बढ़ती प्रवृत्ति पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा,
“लिखित दलीलें मौखिक दलीलों का विकल्प नहीं हैं।”
कोर्ट ने आगे टिप्पणी की,
“कई बार हमें ऐसा प्रतीत होता है कि लिखित दलीलें या यहां तक कि रिट याचिका का मसौदा भी AI से तैयार किया गया है।”
हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि भविष्य में अदालत के आदेश के बिना दाखिल की गई लिखित दलीलें या न्यायिक फैसलों के संकलन रजिस्ट्री द्वारा स्वीकार नहीं किए जाएंगे।
बेंच ने मौखिक बहस के दौरान नहीं उठाए गए मुद्दों को लिखित दलीलों के माध्यम से पेश करने की प्रथा पर भी नाराजगी जताई।
कोर्ट ने कहा,
“हम ऐसी प्रथा को स्वीकार नहीं करते। इससे न्यायिक व्यवस्था और न्याय प्रदान करने की प्रक्रिया में वादकारी का विश्वास और भरोसा डगमगा सकता है।”
बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका खारिज
आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका खारिज कर दी।
बेंच ने याचिकाकर्ताओं पर कोई खर्च नहीं लगाया। साथ ही उन्हें अन्य आधारों पर उचित कानूनी मंच के समक्ष रिमांड आदेश को चुनौती देने की स्वतंत्रता दी।
केस डिटेल्स
केस टाइटल: क्रिश्चियन जॉइंट एक्शन कमेटी (CJAC) एवं अन्य बनाम आंध्र प्रदेश राज्य एवं अन्य
केस नंबर: रिट याचिका संख्या 19332/2026
बेंच: जस्टिस रवि नाथ तिलहरी और जस्टिस अलापति गिरिधर
फैसले की तारीख: 16 अक्टूबर 2026
