दिल्ली शराब नीति मामला: ट्रायल कोर्ट की टिप्पणियों को हटाने की याचिका पर केजरीवाल और सिसोदिया को हाईकोर्ट का ‘अंतिम अवसर’

दिल्ली हाईकोर्ट ने गुरुवार को पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया और अन्य आरोपियों को प्रवर्तन निदेशालय (ED) की उस याचिका पर जवाब दाखिल करने का ‘अंतिम अवसर’ दिया है, जिसमें निचली अदालत द्वारा एजेंसी के खिलाफ की गई “अनुचित” टिप्पणियों को हटाने की मांग की गई है।

जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा ने मामले की सुनवाई करते हुए इस बात पर गौर किया कि पिछली सुनवाई (19 मार्च) को समय दिए जाने के बावजूद, एक प्रतिवादी को छोड़कर किसी ने भी अपना जवाब दाखिल नहीं किया है।

अदालत ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा, “जवाब दाखिल करने का यह आखिरी मौका दिया जा रहा है, ऐसा न करने पर जवाब दाखिल करने का अधिकार बंद कर दिया जाएगा। अगली सुनवाई पर दलीलें सुनी जाएंगी। अब मामला 22 अप्रैल के लिए सूचीबद्ध किया जाता है।”

जांच एजेंसी ED की यह चुनौती ट्रायल कोर्ट के 27 फरवरी के उस आदेश से जुड़ी है, जिसमें आम आदमी पार्टी (AAP) के नेताओं को शराब नीति मामले में आरोपमुक्त (discharge) कर दिया गया था। हालांकि यह मूल मामला सीबीआई (CBI) द्वारा जांचा जा रहा था, लेकिन ट्रायल कोर्ट ने अपने आदेश में धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) के तहत ED द्वारा की गई स्वतंत्र जांच को लेकर भी कई टिप्पणियां की थीं।

एजेंसी की ओर से पेश हुए एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ASG) एस.वी. राजू ने कोर्ट को बताया कि विनोद चौहान के अलावा किसी भी अन्य प्रतिवादी ने अब तक याचिका पर अपना पक्ष नहीं रखा है।

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ED का तर्क है कि ट्रायल कोर्ट की टिप्पणियां सीबीआई मामले से पूरी तरह “असंगत” थीं। एजेंसी ने दलील दी कि वह उस विशेष कार्यवाही में पक्षकार नहीं थी और न ही उसे टिप्पणियां पारित करने से पहले अपना पक्ष रखने का मौका दिया गया था। याचिका में कहा गया कि यदि ऐसी “व्यापक और निराधार” टिप्पणियों को रहने दिया गया, तो इससे सार्वजनिक हित और याचिकाकर्ता को अपूरणीय क्षति होगी। एजेंसी ने इसे “न्यायिक अतिक्रमण” (judicial overreach) का स्पष्ट मामला बताया है।

27 फरवरी को ट्रायल कोर्ट ने केजरीवाल, सिसोदिया और अन्य को आरोपमुक्त करते हुए कहा था कि सीबीआई का मामला “न्यायिक जांच के सामने टिकने में पूरी तरह असमर्थ” है। अदालत ने कथित साजिश को “अटकलों और अनुमानों पर आधारित” बताया था और कहा था कि दावों के समर्थन में कोई कानूनी रूप से स्वीकार्य साक्ष्य मौजूद नहीं है।

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ट्रायल कोर्ट ने विशेष रूप से PMLA के व्यापक प्रभाव पर चिंता जताई थी। अदालत ने रेखांकित किया था कि बिना परखे गए आरोपों के आधार पर लंबे समय तक या अनिश्चित काल तक कारावास की प्रक्रिया “दंडात्मक प्रक्रिया” में बदलने का जोखिम रखती है।

अदालत ने अपने आदेश में यह भी कहा था कि हालांकि PMLA का उद्देश्य वैध और अनिवार्य है, लेकिन “वैधानिक शक्ति, चाहे वह कितनी भी व्यापक क्यों न हो, संवैधानिक सुरक्षा उपायों को धूमिल नहीं कर सकती।” अदालत ने एक “परेशान करने वाली विसंगति” की ओर इशारा करते हुए कहा था कि अक्सर यह देखा गया है कि मुख्य अपराध (predicate offence) के आधारहीन होने के बावजूद मनी लॉन्ड्रिंग का मामला स्वतंत्र रूप से चलता रहता है।

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ED के वकील ने पहले तर्क दिया था कि चूंकि उनकी चुनौती केवल ट्रायल कोर्ट की टिप्पणियों को हटाने तक सीमित है और इससे आरोपियों को मिली राहत (discharge) पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा, इसलिए शायद प्रतिवादियों को जवाब देने की आवश्यकता भी नहीं है। हालांकि, हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि 22 अप्रैल को अंतिम दलीलें सुनने से पहले सभी पक्षों का औपचारिक जवाब रिकॉर्ड पर होना चाहिए।

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