बंगाल में न्यायिक अधिकारियों को बंधक बनाने की घटना पर सुप्रीम कोर्ट सख्त; पश्चिम बंगाल सरकार को लगाई फटकार

पश्चिम बंगाल के मालदा जिले में एक उग्र भीड़ द्वारा सात न्यायिक अधिकारियों को नौ घंटे से अधिक समय तक बंधक बनाए जाने की घटना पर सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को स्वत: संज्ञान लिया। चीफ जस्टिस सूर्या कांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने इस घटना को “बेहद निंदनीय” बताते हुए कहा कि यह मतदाता सूची के विशेष गहन संशोधन (SIR) की प्रक्रिया को बाधित करने का एक “सुनियोजित प्रयास” था। कोर्ट ने इस सुरक्षा चूक की जांच CBI या किसी स्वतंत्र एजेंसी से कराने के संकेत दिए हैं।

क्या है पूरा मामला?

यह संकट बुधवार (1 अप्रैल, 2026) दोपहर को मालदा के कालियाचक इलाके में शुरू हुआ। सात न्यायिक अधिकारी, जिनमें तीन महिलाएं भी शामिल थीं, SIR प्रक्रिया से जुड़ी अपनी ड्यूटी कर रहे थे। इसी दौरान एक भीड़ ने उन्हें “घेराव” कर बंधक बना लिया। यह गतिरोध गुरुवार रात करीब 1 बजे तक चला, जिसके बाद पुलिस और अर्धसैनिक बलों की एक टुकड़ी ने मौके पर पहुंचकर अधिकारियों को सुरक्षित निकाला। रिपोर्टों के अनुसार, भीड़ में वे लोग शामिल थे जिनके नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए थे।

सरकार की निष्क्रियता पर नाराजगी

2 अप्रैल को हुई सुनवाई के दौरान, चीफ जस्टिस सूर्या कांत ने स्थिति को बिगड़ने से रोकने में राज्य सरकार की विफलता पर गहरी चिंता व्यक्त की। चीफ जस्टिस ने बताया कि वह खुद रात 2 बजे तक जागकर स्थिति की निगरानी कर रहे थे और आवश्यक निर्देश दे रहे थे।

चीफ जस्टिस ने टिप्पणी की, “राज्य सरकार की ओर से बरती गई निष्क्रियता अत्यंत निंदनीय है।” उन्होंने आगे कहा कि उन्होंने पश्चिम बंगाल में जैसा “राजनीतिक ध्रुवीकरण” देखा है, वैसा पहले कभी नहीं देखा।

भारतीय चुनाव आयोग (ECI) ने भी स्थिति की कड़ी आलोचना की। आयोग ने इसे “जंगल राज” की संज्ञा देते हुए कहा कि किसी ने कल्पना भी नहीं की थी कि चुनावी प्रक्रिया के दौरान न्यायिक अधिकारियों को इस तरह फिरौती के लिए बंधक बना लिया जाएगा।

कोर्ट के निर्देश और कारण बताओ नोटिस

सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक तंत्र की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कई महत्वपूर्ण निर्देश दिए हैं:

  • कारण बताओ नोटिस: प्रशासन और पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों को नोटिस जारी कर पूछा गया है कि अधिकारियों की सुरक्षा करने में विफल रहने के लिए उनके खिलाफ कार्रवाई क्यों न की जाए।
  • केंद्रीय बलों की तैनाती: कोर्ट ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया है कि वह केंद्रीय बलों की मांग करे और उन्हें उन न्यायिक अधिकारियों और सरकारी कार्यालयों की सुरक्षा में तैनात करे जो SIR प्रक्रिया में शामिल हैं।
  • परिजनों की सुरक्षा: बेंच ने स्पष्ट किया कि सुरक्षा का यह घेरा प्रभावित न्यायिक अधिकारियों के परिवार के सदस्यों तक भी विस्तारित होना चाहिए।
  • स्वतंत्र जांच: कोर्ट ने कहा कि वह इस घटना की जांच CBI या किसी अन्य स्वतंत्र एजेंसी से कराने के पक्ष में है। इस संबंध में औपचारिक आदेश आज ही पारित किया जाएगा।
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राज्य सरकार का पक्ष

पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने बेंच को सूचित किया कि संबंधित क्षेत्र के स्थानीय अधिकारियों का तबादला कर दिया गया है। सिब्बल ने कोर्ट से यह भी अनुरोध किया कि वह अपने आदेश से “संवैधानिक मशीनरी का पूरी तरह से ठप होना” (complete breakdown of constitutional machinery) जैसे शब्दों को हटा दें।

SIR प्रक्रिया आगामी चुनावों के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है। कोर्ट के इस कड़े रुख ने यह स्पष्ट कर दिया है कि न्यायिक अधिकारियों को डरा-धमकाकर चुनावी प्रक्रिया की अखंडता से समझौता बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

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